एक ऐसी भी कहानी इश्क़ की - Love Story - Love Stories

संजीव दिल्ली में ही रह कर अपनी पढ़ाई कर रहा था, उसे किसी से कोई मतलब नहीं था, उसने अपना एक अलग ही दुनिया बना कर रखा था, एक कमरे का फ्लैट था, जिसमे किचन और बाथरूम अटैच्ड था, एक छोटी सी बालकनी भी थी,लेकिन वो बालकनी में ना के बराबर जाता था, उसका रूम किताबो से भरा हुआ था ,यूँ कह लीजिये की संजीव पूरा किताबी कीड़ा था,उसे बाहरी दुनिया से कोई मतलब नहीं था,जब देखो तब किताबो में घुसा हुआ रहता था, घर से इंस्टिट्यूट और इंस्टिट्यूट से घर,बस यही दुनिया थी उसकी. एक दिन शाम में अचानक लाइट चली गयी और अँधेरा हो गया, गर्मी भी बहुत थी, इसलिए वो बालकनी में निकल गया,तो देखा सामने के बालकनी में एक लड़की खड़ी है, लाल रंग की हाफ पेंट और ब्लू रंग की हाफ टी-शर्ट पहने वो खड़ी थी, दोनों की आपस में नजर मिली, फिर लड़की उधर देखने लगी और संजीव भी दूसरी तरफ देखने लगा, संजीव ने एक बार फिर तिरछी नजर से उस लड़की की तरफ से देखा, लड़की देखने में चिंकी लगी, दिल्ली में चिंकी उसे कहते हैं, जो लड़की नार्थ-ईस्ट इंडियन होते हैं, और नार्थ ईस्ट के लड़के को चिंका बोला जाता है. तो चिंकी को वो बार-बार देख रहा था,शायद वो चिंकी संजीव को पसंद आ गयी थी, चिंकी की भी नजारे संजीव से टकरा जाया करती थी, अब तो बार-बार नजरे मिलने लगी,नजरे मिलती और दोनों एक दूसरे से नजरे चुरा लेते और फिर तिरछी निगाहों से एक दूसरे को देखने लगते, तभी लाइट आ गयी और चिंकी वापस अपने कमरे में चली गयी, संजीव भी वापस अपने कमरे में चला आया, लेकिन उसका दिल अब पढ़ने में नहीं लग रहा था, उसकी निगाहें चिंकी को ढूंढने में लगी हुई थी, तभी एक बार फिर लाइट चली गयी और संजीव खुश हो गया और बालकनी में जा कर खड़ा हो गया, लड़की भी सामने खड़ी थी,दोनों एक दूसरे को देख रहे थे,फिर से लाइट आ गयी और दोनों अपने कमरे में वापस आ गए. एक समय था,जब लाइट जाती थी तो संजीव चिढ जाया करता था,और आज एक समय है जब लाइट जाने पर वो खुश हो जाया करता था, वो मना ही रहा था की एक बार फिर लाइट चली जाये और उसे चिंकी का दीदार हो जाये,लेकिन लाइट नहीं गयी,ना ही वो पढ़ पाया, अब तो हालात ये थे की संजीव को किताबो में भी चिंकी का ही चेहरा नजर आता था, संजीव ने किताब बंद कर दी और सोने की कोशिश करने लगा, सुबह वो उठ कर बालकनी में आया तो पाया,चिंकी मुँह धो रही थी, काफी सुन्दर लग रही थी वो, उसे देख कर संजीव को लगा की उसका दिन अच्छा गुजरेगा और हुआ भी वही,अब शाम को वो बालकनी में उसका इंतजार करने लगा लेकिन वो नहीं आयी, शायद लाइट थी इसलिए वो नजर नहीं आयी, उसने उस लड़की से बात करना चाही लेकिन कैसे बात करता उसकी समझ में नहीं आ रहा था, वो उसका नाम भी नहीं जानता था,और उससे उसको प्यार हो गया, अब संजीव का दिल पढ़ाई में नहीं लग रहा था, उसका दिल कह रहा था की कैसे भी उसका दीदार हो जाये वो उससे बात कर पाए लेकिन चार दिन बीत गए,और लड़की का दीदार नहीं हो पाया,तभी पांचवे दिन सुबह संजीव अपने घर से निकल कर बाहर जा ही रहा था की अचानक से वो लड़की नजर आयी वो भी घर से बाहर जा रही थी, संजीव उसका पीछा करने लगा, लड़की बस स्टॉप पर गयी,संजीव भी उसके पीछे बस स्टॉप पर चला गया,फिर लड़की ने बस स्टैंड,आई एस बी टी का बस पकड़ा, संजीव को लगा की वो कहीं शहर से बाहर तो नहीं जा रही है,इसलिए उसने सोचा की बस से उतर कर आखिरी बार ही सही उससे बात जरूर कर लूंगा, वो उसके पीछे बस पर चढ़ गया,लड़की बस स्टैंड पर उतर गयी और पैदल आगे बढ़ गयी, संजीव भी उसके पीछे ऐसा ही किया, लड़की सड़क पार करके मार्किट के अंदर चली गयी वो तिब्बती मार्किट था,संजीव आज तक सुना था इस मार्किट के बारे में कभी आया नहीं था, आज उस लड़की की वजह से उसने ये मार्किट देख लिया, कुछ देर के बाद लड़की एक दुकान के अंदर चली गयी, और कपडे सही करने लगी,संजीव को लगा या तो ये दुकान उसका है या वो इस दुकान में काम करती है, जब दिन चढ़ा तब तक संजीव बस स्टैंड पर भी इधर उधर घूमता रहा,फिर दिन चढ़ने के बाद वो उसी दुकान में चला गया और कपडे देखने लगा,लड़की उसे देखि और मुस्कुराने लगी, फिर दोनों के बिच बात भी हुई, संजीव बहुत खुश हुआ उससे बात करके, लड़की का नाम सेरेपा था, संजीव सोच में डूब गया की ये कैसा नाम है? लेकिन नाम तो नाम है,सेरेपा ने संजीव को बहुत सरे कपडे दिखाए और खरीदने को बोली,संजीव भी एक शर्ट खरीद कर चला गया, और शाम को वही शर्ट पहन कर बालकनी में खड़ा हो कर लड़की का इंतजार करने लगा, लड़की बालकनी में आई और शर्ट पहने संजीव को देख कर बोली अच्छे लग रहे हो,संजीव बहुत खुश हुआ,अब तो संजीव कुछ ही दिनों के बाद दुकान पहुंच जाता और शर्ट खरीद कर उसे पहन कर बालकनी में खड़ा हो जाता,और लड़की का इंतजार करता, लड़की भी देख कर खुश होती और संजीव को बोलती अच्छा लग रहे हो, इस तरह संजीव के पास बहुत सारे शर्ट हो गए,कल तक जिस रूम में सिर्फ किताबे होती थी आज उसकी जगह शर्ट ने ले ली थी, सिर्फ शर्ट और टी-शर्ट नजर आ रहे थे, एक दिन संजीव ने सेरेपा को “आई लव यू” बोल दिया,जिसे सुन कर सेरेपा चौंक गयी. उसकी समझ में नहीं आ रहा था की वो क्या बोले? कुछ देर तक सोचने के बाद सेरेपा ने बोला की वो भी उसे पसंद करती है,लेकिन उसने कभी उसे प्यार की नजर से नहीं देखा,सिर्फ दोस्त समझा,अब तो संजीव का दिल टूट गया, उसकी समझ में नहीं आ रहा था की वो क्या करे? प्यार के चक्कर में उसने ना जाने कितने शर्ट और टी-शर्ट खरीद लिए और सिर्फ दोस्त सुनने को मिला, अब तो उसका दिल रोने का कर रहा था, उसके लिए वो कितनी ही बार उसके दुकान के चक्कर काटे,जिसकी वजह से वो इंस्टिट्यूट नहीं जा पाया, साथ ही साथ वो कितना समय पढ़ाई के बदले बालकनी में खड़े हो कर बिता दिए,संजीव कहीं का नहीं रहा, अब तो उसका दिल कर रहा था की वो जोर-जोर से रोये, क्योंकि प्यार की चक्कर में वो बर्बाद हो चूका था,वो किसी से बिना कुछ बोले,वापस घर चला आया और कुछ दिन घर में बिता कर सेरेपा को भूलने की कोशिश करने लगा और वापस दिल्ली जाने के बाद उसने अपना घर बदल लिया और एक बार फिर अपनी पढ़ाई में जुट गया, ये कसम कहते हुए की अब किसी से प्यार नहीं करेगा……….. मैं आशा करता हूँ की आपको ये “Hp Video Status Ki Kahani” आपको अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

    stories in hindi

एक के बाद एक - Sad Story - Sad Stories

दिन के एक बज रहे थे. आकाश में बैठा हुआ सूर्य का गोला अपने पूरे योवन के साथ तमतमा रहा था. मार्च का महीना था और गर्मी के दिन शुरू हो गये थे. मगर अभी से भविष्य में जमकर पड़ने वाली गर्मी ने अपना असली रूप दिखाना आरम्भ कर दिया था. जूही ने रिक्शेवाले को अपना पर्स खोलकर पैसे दिए और चुपचाप जैसे गिरती-पड़ती सी दरवाज़ा खोलकर अपने घर में आ गई. मारे दर्द के उसका तो जैसे सर फटा जाता था. आते ही उसने पर्स को एक तरफ बिस्तर पर पटक दिया और फिर किचिन में जाकर नल से ही एक गिलास पानी भरा, फिर अपने पर्स को बिस्तर पर से उठाया और उसे खोलकर उसके अंदर से एक पुड़िया निकाली और उसे खोलकर उसका सारा पाउडर गिलास के पानी में भर दिया. ये चूहे मारने वाली दवाई थी. इसको उसने आज ही अपने कार्यालय से आते समय बाज़ार से खरीदा था. यही सोचकर कि इसे पीकर वह आज ही अपने अस्तित्व को सदा के लिए समाप्त कर लेगी. उसे अब जीने से लाभ भी क्या होनेवाला है? सब कुछ तो उसका छीना जा चुका है. फिर दवाई को पानी में मिलाकर जैसे ही उसने अपने मुंह से गिलास को लगाना चाहा कि अचानक ही सामने की मेज पर रखी हुई जीजस की तस्वीर को देख कर उसका हाथ जहां का तहां ही थम गया. जीजस की आँखों में उसके प्रति जैसे नफरत और क्रोध के अंगारे दहक रहे थे. जीजस का ऐसा बदला हुआ रूप देख कर वह दंग रह गई. शान्ति के राजकुमार कहे जाने वाले, करुणा और दया के सागर की आँखों में उसके प्रति क्रोध की भावनाएं. . .? सोचते ही जूही को अजीब सा लगने लगा. अजीब इसलिए क्योंकि उसका विश्वास था कि सारी मानव जाति के पापियों से प्यार करने वाला जीजस आज उसको ही घूरे क्यों जा रहा है? उसने सोचा कि क्या यह वही जीजस है जो एक दिन अपने परम मित्र लाजरस की कब्र के सामने जाकर रो पड़ा था? क्या यह वही यहूदिया के मैदानों में घूमने वाला मनुष्य है जिसे परमेश्वरीय पुत्र भी कहा जाता है, जो एक दिन भारी भीड़ को भूख और प्यासा देख कर परेशान और चिन्तित हो गया था? क्या यह वही सहनशील और दयालु इंसान है जो एक दिन सलीब पर अपने हाथ और पैरों में कीलें ठोकें जाने के समय भी किसी को बुरा-भला नहीं कह सका था? जूही जानती थी कि आज की हुई उसके जीवन की घटना ने उसके जीने के सारे रास्ते बंद कर दिए थे. वे उम्मीदों और आसरों के पहिये कि जिनको सहारा बनाकर इंसान अपने लिए रास्ते बनाता है और अपने जीवन का सफर तय करता है, अब सदा के लिए टूट चुके हैं. आज वह जिस भी जगह पर खड़ी है वहां से कोई भी मार्ग ना तो उसके अपने घर तक जाता है और ना ही किसी अन्य मंजिल की तरफ बढ़ने की सलाह देता है. आज उसने फिर एक बार कुल्हाड़ी अपने ही पैरों पर मार ली थी. ज़िन्दगी की एक और बाज़ी वह फिर एक बार बुरी तरह से हार चुकी थी. . . . सोचते-सोचते जूही की यादों के खंडर फिर एक बार एकत्रित होने लगे तो उसकी आँखों के पर्दों पर उसके अतीत के जिए हुए दिन किन्हीं बे-जान परिंदों के समान पंख फैलाए दिखने लगे. उसके जीवन की वे कड़वी और कसैली यादें कि जिनमें उसके कटु अनुभवों की अबाबीलें उसके दिल के घर को सूना और तन्हा पाकर स्वत: ही चिपकने लगी थीं. उसे अचानक ही याद आया कि एक दिन सब्जी मंडी में दैनिक खरीदारी करते समय वह वहां की कीचड़ में फिसल कर गिर पड़ी थी और उसके मुख से सहसा ही निकल पड़ा था कि, 'अरे, मैं गिर गई.' 'जब उठाने वाला नज़दीक ही खड़ा हो तो फिसलने वाले को डरना नहीं चाहिए.' उपरोक्त शब्दों के आदान-प्रदान के साथ ही तो जूही के फूलों के प्यार की कहानी अमलतास की छाँव के आस-पास आरम्भ हो गई थी. बरसात के दिन थे. सारा शहर तो क्या लगता था कि समस्त सूबे को बारिश ने अपने प्रकोप में ले रखा था. यूँ भी जुलाई के महीने में बारिश का मौसम होता ही है, मगर न जाने क्यों पिछले कई बर्षों से प्रकृति का नियम भी जैसे टूट चुका था. सो ठीक जून के महीने की कड़ी गर्मी के दिनों में भी जब सारे लोग गर्मी के कारण हताश और परेशान होने लगे थे तब कहीं जाकर ये बारिश होना आरम्भ हुई थी. फिर जब आरम्भ में पानी बरसना शुरू हुआ तो सब ही चेहरों पर जैसे एक चैन और सकून नज़र आने लगा था. लेकिन कोई क्या जानता था कि पहले जमकर गर्मी फिर बारिश भी हुई तो उसने थमने का नाम ही नहीं लिया था. लगता था कि आसमान में बैठा सबका विधाता भी जैसे सारे संसार में आये दिन होते पापों को देख-देखकर तंग आ चुका था. शायद इसीलिये वह समय-समय पर अपना रौद्र रूप प्रकृति के बिगड़ते हुए स्वभाव के साथ दिखा देता था. एक सप्ताह लगातार जब बारिश ने बंद होने का नाम ही नहीं लिया तो हार मानकर जूही को बाज़ार जाना ही पड़ गया था. घर में कुछ बचा ही नहीं था. साथ में चार साल की छोटी बच्ची रक्षा की भी तो उसे रक्षा करनी ही थी. वह चाहे एक बार को तो भूखी रह सकती थी लेकिन अपने कलेजे के हिस्से को किस प्रकार भूखा सुला सकती थी. इसीलिये वह न चाहते हुए भी बाज़ार गई थी. रक्षा को वह बरसात की हर समय होती हुई रिमझिम के कारण अपने पड़ोस में छोड़ गई थी. जरूरत का सारा सामान खरीदने के पश्चात वह सब्जी मंडी में चली गई थी. चाहा था कि जब वह बाज़ार ही आई है तो कुछेक सब्जी आदि भी लेती जाए. फिर जब सब्जी मंडी में गई तो वहां का दृश्य देखते ही उसका मन हुआ कि वह तुरंत ही वापस हो ले.सारी सब्जी मंडी में इतना अधिक कीचड़ भरा हुआ था कि कहीं भी पैर रखने की जगह तक नहीं थी. लेकिन फिर भी साहस करके उसने कुछेक सब्जियां खरीद लेनी चाही थीं. मग आर बहुत सम्भालकर चलते हुए भी उसका पैर अचानक से फिसला था और वह वहीं गिर पड़ी थी. गिरने के कारण सहसा ही उसके मुख से एक डरावनी सी चीख निकल पड़ी थी. 'अरे, मैं गिर गई .' मग आर वह क्या जानती थी कि उसकी चीख के साथ ही एक सभ्य जैसे दिखनेवाले पुरुष ने जब उसे सहारा देकर उठाना चाहा और उपरोक्त शब्द कहे तो न जाने कैसे जूही ने अपना हाथ उस अंज आन पुरुष की तरफ बढ़ा दिया था. तब उसके पश्चात उस पुरुष ने न केवल उसे उठाया ही था बल्कि पास ही की एक दूकान से उसे नई साड़ी भी खरीदकर दे दी थी. जूही की पहनी हुई साड़ी तो कीचड़ के पानी में सनकर बुरी तरह से खराब हो चुकी थी. इसके साथ ही उस पुरुष ने जूही को अपनी कार से उसके घर तक छोड़ भी दिया था. वह अनायास उसकी सहायता करने वाला और उसके साथ बे-हद हमदर्दी जतानेवाला सभ्य सा युवक कौन था? क्या करता था? ये सब जूही को बाद में कुछेक ही दिनों में पता चलते देर भी नहीं लगी थी. एक दिन अमलतास ने उसको अपने बारे में सब कुछ विस्तार से बता दिया था. अमलतास एक भरे-पूरे तथा धनाड्य परिवार से था और उसके परिवार में पुश्तों से व्यापार के द्वारा ही रोजी-रोटी कमाने का काम चलता आया था. शहर के सदर बाजार में अमलतास के पिता की कार के पुर्जे बनाने की फेक्ट्री चला करती थी. अपनी इसी कम्पनी में अमलतास मैनेजर, और निदेशक दोनों ही पदों का कार्य सम्भाला करता था. बातो-बातों के दौरान ही एक दिन जूही ने अमलतास को अपने बारे में भी सब कुछ बता दिया था कि वह एक लड़की की मां भी है और अपने पति के बुरे स्वभाव के कारण उससे अलग हो चुकी है, तथा एक प्राइमरी स्कूल में दैनिक लिपिक की नौकरी करती है. फिर अमलतास के ये पूछने पर कि वह स्कूल की एक छोटी सी नौकरी क्यों करती है? इसके जबाब में जूही ने अमलतास से कहा था कि उसकी लड़की भी उसके साथ उसी स्कूल में पढ़ने जाया करती है और इस प्रकार से 'बेबी-सिटर' का खर्चा वह बचा लेती है. तब अमलतास ने उसको अपनी कम्पनी में नौकरी करने का निमंत्रण दिया और साथ ही ये भी कहा कि उसकी कम्पनी में नौकरी करने से उसे वेतन भी स्कूल की नौकरी से मिलेगा और इसके साथ ही उसकी लड़की की 'बेबी-सिटर' का खर्चा उसकी कम्पनी कुछ मामलों में स्वीकृत कर देती है. अमलतास की इस बात पर हांलाकि जूही उसकी नौकरी के लालच में तो नहीं आई थी मगर वह यह अवश्य ही जान गई थी कि अमलतास उसमें एक विशेष रूचि लेने लगा है. साथ-साथ जब जूही को ये भी ज्ञात हुआ कि अमलतास का अभी तक विवाह भी नहीं हुआ है तो वह भी न जाने अपने कौन से भविष्य का सुंदर सपना देखते हुए उसमें दिलचस्पी लेने लगी. सो जूही की इन्हीं सोचों के साथ वह अपने अरमानों के सपने देखते हुए आये दिन अमलतास के साथ देखी जाने लगी. अक्सर ही वह अपनी शाम को अमलतास के साथ किसी भी रेस्टोरेंट या फिर कहीं कॉफ़ी हाउस में कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ बिताने लगी. तब एक दिन ऐसी ही अमलतास के साथ मुलाक़ात के दौरान जब अमलतास ने जूही को फिर से अपने यहाँ नौकरी कर लेने की बात कही तो फिर जूही ने अपनी हांमी भर दी. तब एक दिन वह अपने स्कूल की स्थायी नौकरी को छोड़कर अमलतास की कम्पनी में लिपिक की नौकरी करने को आ गई. हांलाकि जूही के लिए अमलतास की कम्पनी का काम तो स्कूल के कार्यालय के समान ही था, मगर स्कूल की नौकरी और इस कम्पनी की नौकरी में जो विशेष अंतर था वह यही कि यहाँ का काम करनेवाला हरेक कर्मचारी भी जूही को अमलतास के समान ही कम्पनी के प्रबंधक जैसा दर्जा और सम्मान देता था. कोई भी उससे किसी भी बात के लिए रोक-टोक नहीं करता था. ये जूही की मर्जी थी कि वह चाहे कितना भी काम करे अथवा नहीं. स्वयं अमलतास भी कभी भी उसके काम को चैक नहीं किया करता था. इसका कारण था कि शायद कार्यालय के अन्य समस्त कर्मचारी भी ये समझ गये थे जूही लाख उन सबके लिए कितनी ही जूनियर कर्मचारी हो मगर उसके ऊपर क्मोनी के मालिक की मेहरबानी अवश्य ही है. कम्पनी के कर्मचारियों के लिए सबसे आश्चर्यजनक धमाका तब हुआ जबकि एक दिन केवल तीन महीने के कार्यकाल में ही जूही को कार्यालय का मुख्य सचिव बना दिया गया. कार्यालय के कर्मचारियों के लिए आश्चर्य करना अति स्वभाविक ही था. जो नई लड़की अभी सभी के लिए बे-हद जूनियर थी वही अब उन सबके लिए बॉस बना दी गई थी. जूही की तरक्की से चाहे कार्यालय के समस्त कर्मचारियों को भले ही अच्छा न लगा हो, लेकिन जूही के मासिक वेतन में एक दम से अत्यधिक रुपियों की बढ़ोतरी कर दी गई थी. इसके साथ ही उसके काम में भी अब साहबी भर दी गई थी. फिर जूही की तरक्की ने उसके मन और मस्तिष्क में एक बात और भर दी कि वह अब अमलतास के बारे में दूसरे ढंग से सोचने लगी. उसके सोचने का तरीका इस प्रकार बदला कि वह अब अधिक से अधिक समय अमलतास को देने लगी थी. इस प्रकार कि प्राय: ही शाम का खाना वह अमलतास के साथ ही खा लिया करती थी. स्वयं अमलतास भी अब विशेष अवसरों पर उसको और उसकी लड़की को विभिन्न प्रकार के उपहारों से लादने लगा था और कभी-कभार कम्पनी के कार्यालय सम्बन्धी काम निकालकर वह अब उसके साथ अतिरिक्त समय में कार्यालय में साथ बैठकर गई रात तक काम करने लगा था. सो इन सब बातों और कार्यकलापों का प्रभाव ऐसा पड़ा कि जूही और अमलतास के बीच का नौकरी का रिश्ता कम और व्यक्तिगत सम्बन्धी अधिक बढ़ता गया. तब एक दिन जूही ने अपनी मकान मालकिन को अमलतास के बारे में बताया तो उसकी मकान मालकिन ने जूही से इतना ही कहा कि वह केवल अपने काम से काम रखे. अमलतास के साथ उसका रिश्ता केवल नौकर और मालिक तक ही रहना चाहिए, क्योंकि ऐसे मामलों में लोग सपने तो कुछ दूसरे देखते हैं, पर उनकी वास्तविकता कुछ और ही हुआ करती है. प्राय: इस प्रकार के मामलों में हानि केवल लड़की के पक्ष की ही हुआ करती है. जूही ने सोचा था कि, जो बात अपने मन में सोच कर उसने अमलतास के बारे में अपनी मकान मालकिन कोम ये सब कुछ बताया था उसकी ठोस बुनियाद रखने का कोई उपाय वह उसे बतायेगी, मगर मकान मालकिन ने जब उसकी बात का अर्थ विपरीत ही निकालकर दिया तो जूही के मन में खिले हुए फूलों की सारी खुशबू उड़ते देर भी नहीं लगी. पल भर में ही उसके सारे इरादों पर मकान मालकिन की बात ने जैसे पानी फेर दिया था. इतना अधिक कि फिर उसके बाद जूही ने कभी भी इस विषय पर उससे कभी बात भी नहीं की. फिर धीर-धीरे और समय आगे बढ़ा तो जूही और अमलतास के सम्बन्ध भी आगे ही बढ़ते गये. इतना अधिक कि इन आपसी सम्बन्धों की इस डोर ने आपस में एक-दूसरे के दोनों छोरों को भी जोड़ लिया. जूही अब सचमुच में अमलतास के घर की मालकिन बनने के सपने देखने लगी थी. और फिर मन और आत्मा की गहराइयों की कोख में जन्में सपनों को साकार करने की इच्छा लिए एक दिन जूही ने अमलतास से कहा कि, 'देखो, अब ये तीसरी बार ऐसा हुआ है. मैं इस बार एबार्शन नहीं करवाऊंगी. बेहतर है कि अब हमें विवाह कर लेना चाहिए?' '?' - खामोशी. जूही की इस अप्रत्याशित बात को अचानक से सुनकर अमलतास ऐसा चौंका जैसे कि उसे किसी बिच्छू ने अपना डंक कसकर मार दिया हो. तुरंत ही वह अपने मुख के कडवे स्वाद को छुपाता हुआ जूही से बोला कि, 'बच्चों जैसी बातें मत किया करो. जो अब तक कराती आई हो उसी परम्परा को जारी रखो.' इतना कहकर उसने मेज की दराज़ से नोटों की गडडी निकालकर जूही के सामने फेंक दी. 'मुझे बार-बार बहलाने की कोशिश मत करो. मैं सचमुच बहुत ही सीरियस हूँ.' जूही ने उसे उत्तर दिया तो अमलतास उससे बोला कि, 'मैं भी कोई तुमको बहला नहीं रहा हूँ. मैं तो केवल तुम्हारी प्रोब्लम को सुलझाने की कोशिश कर रहा हूँ.' 'तुम क्या समझते हो कि मेरी ये प्रोब्लम क्या केवल मेरी अपनी भर की है? तुम्हारा इसमें कोई भी हाथ नहीं है?' 'ऑफकोर्स! ये तुम्हारी अपनी ही प्रोब्लम है. बगैर तुम्हारी मर्जी के कोई तुम्हारे जिस्म से हाथ कैसे लगा सकता है?' अमलतास ने कहा तो जूही जैसे बिफर पड़ी. वह ज़रा तेज आवाज़ में अमलतास से बोली, 'इसका मतलब है कि पिछले दो वर्षों से तुम मुझे केवल बेवकूफ ही बना रहे थे. मेरे साथ किये गये तुम्हारे वे वायदे, कसमें और प्रेम के इज़हार आदि, सब खोखली वह बातें थीं जिनमें सच्चाई नाम का कोई एक कतरा भी नहीं था.' 'देखो, मैं तुमको बेवकूफ नहीं बना रहा हूँ. मैं तो तुमको इस ज़माने की हकीकत से वाकिफ करवा रहा हूँ. मैं और तुम, चाहे कितना भी हाथ और पैर मार लें, हम दोनों का विवाह नहीं हो सकता है. इसका कारण है कि तुम एक ईसाई युवती हो और मैं एक हिन्दू. अगर मैंने ये विवाह कर लिया तो मैं अपने घर से तो निकाला ही जाऊंगा और मेरा अपना हिन्दू समाज भी मुझ को अपने साथ कहीं नहीं बैठने देगा. मुझको अपनी बिरादरी से सदा के लिए निकाल दिया जाएगा. इतना ही नहीं, साथ में तुमको भी मेरे समाज में कोई भी सम्मान नहीं मिल सकेगा. मेरे परिवार के लोग तुमको किसी भी तरह से अपने घर की बहू स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे इसके लिए मैं सूली पर ही क्यों चढ़ जाऊं.' 'मुझसे सम्बन्ध जोड़ने से पहले तुमने यह सब नहीं सोचा था क्या? जूही ने पूछा तो अमलतास ने कहा कि, 'प्रेम के अंधे नशे में इंसान यह सब कहाँ सोच पाता है.' '?' अमलतास की इस बात पर जूही निरुत्तर हो गई. अमलतास ने सच ही तो कहा था. वह सचमुच ही तो उसके प्यार की झूठी दुनियां में के कुएं में अंधी होकर कूद पड़ी थी. बगैर कोई भी आगा-पीछा सोचे हुए उसने कितनी ही उम्मीदों से अपनी भविष्य की संजोईं हुई प्यार की दुनियां अमलतास की छ्या में सजानी चाही थी, मगर वह क्या जानती थी कि एक दिन खुद अमलतास ही खुद अपने पत्तों से नंगा होकर कड़ी धूप में जलने लगेगा. 'अब ज यादा सोचा-विचारी करके अपने आपको परेशान मत करो. जैसा च अलता आया है वैसा ही चलने दो. यूँ तो मैं हर तरह से तुम्हारा ख्याल रखा ही करता हूँ, जरूरी नहीं है कि शादी के बंधन में बंधकर ही मैं तुम्हारी जिम्मेदारी के कर्तव्यों में बंध जाऊं?' जूही को चुप और गम्भीर बने देख कर अमलतास ने अपनी बात आगे बढ़ाई तो जूही जैसे फट पड़ी. वह जैसे बहुत ही अधिक परेशान होते हुए बोली, 'तुमको मुझे अब और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है. मुझे क्या करना है और क्या नहीं. तुमने मुझे अपना असली चेहरा दिखा दिया है. मैं इतना तो जान ही गई हूँ कि अन्य पुरुषों के समान तुमने भी मुझको उसी नज़र से देखा है जैसा कि दूसरों ने. मैं यहाँ से जा रही हूँ और कभी भी तुमको अपनी शक्ल तक नहीं दिखाउंगी.' इतना सब कुछ कहने-सुनने के पश्चात जूही अमलतास के कार्यालय से रोटी-तड़पती और बे-हद परेशान होकर चली आई थी. आने से पहले ही उसने सोच लिया था कि वह अब अपने जीवन का अंत ही कर डालेगी और आत्महत्या का कारण अमलतास के मत्थे मढ़ जायेगी. इसीलिये आते समय उसने बाज़ार से चूहे मारने की दवाई खरीद ली थी. यही सोच कर कि घर पहुंचते ही वह इस दवा को पीकर सदा के लिए सो जायेगी. अब उसे और जीने से लाभ भी क्या? वह जान गई थी कि, जिस अमलतास की अमलतास की सुंदरता को देखकर वह रीझ गई थी, उसकी क्षत्र-छाया में महज उसकी ज़िन्दगी के गंदे इरादों के सिवा और कुछ भी बाकी नहीं बचा है. अपने जिन अरमानों की ख्वाईश में उसने अपना तन, अपना मन, और अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय जिसके चरणों में अर्पित कर दिया था, उसकी झोली में उसके लिए केवल लूट, स्वार्थ और मतलबपरस्ती जैसी भावनाएं ही एकत्रित रहती हैं. क्या ही अच्छा होता कि आरम्भ से ही उसने अपने से बड़ों का कहना मान लिया होता. अपनी मनमानी करके यूँ दूसरों के केवल बाहरी आवरण को देख कर वह रीझी न होती. अपना घर, अपना समाज और अपनी जाति-धर्म की बंदिशों की लापरवाही करके उसने गैरों के दामन में अपने भविष्य की खुशियाँ ढूंढ लेनी चाही थीं तो नुक्सान तो उसका होना ही था. अपने दिल की कितनी ही खुशियों के साथ उसने अमलतास को अपना समझकर अपने दिल में लगाकर जीवन भर के लिए उगा लेना चाहा था, उसे क्या मालुम था कि इसी अमलतास के सुंदर-सुंदर पीले फूलों जैसे झूठे वादे उसके जिस्म से किसी कोढ़ के दागों के समान सदा के लिए चिपक कर रह जायेंगे. सोचते-सोचते जूही की आँखों से उसकी बे-बसी के आंसू किसी राह-ए-सफर में अचानक से लुटर हुये मुसाफिर के नुचे हुए कपड़ों की कतरनों के समान टूट-टूटकर नीचे कमरे के सीमेंट के फर्श पर बिखरने लगे. बिखरने लगे तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी. कितना बुरा हश्र उसके प्यार के साथ-साथ उसकी हसरतों का भी हो चुका था. वह जानती थी कि अपने प्यार की मंजिल की तलाश में भटकते हुए वह आज जिस जगह पर खड़ी थी वहां से कोई भी रास्ता ना तो उसके मा-बाप के घर जाता था और ना ही अन्य मंजिल की चाहत में. और इतना सब कुछ करने के पश्चात वह जिस जगह जाकर खुद को सदा के लिए खो देना चाहती थी वहां जाने के लिए उसका प्यार करनेवाला मसीहा, उसका शान्ति का राजकुमार और उसका प्यारा ईश्वर न जाने किस बात पर नाराज़ होकर उसको घूरे जा रहा है? शायद इसीलिये कि वह ये बता देना चाहता है कि यह इस शैतानी दुनिया का चलन है कि पहले जो लोग उसका साथ देकर उसे निमंत्रण देते हैं वही अपना मतलब निकल जाने के बाद उसी पर दोष लगाकर उसके मार्गों से अलग हो जाया करते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो यह दुनिया इतनी जालिम नहीं होती. सदा से अपने ईश्वर से प्यार करनेवाली, यदि उसका ईश्वर उससे नाराज़ है तो केवल इस बात पर कि एक तो उसने गलती की है. गलती ही नहीं, बल्कि गलतियों पर गलतियाँ वह करती आई है और आज जब उसके प्रायश्चित का अवसर आया है तो वह अपने जीवन की वह भयंकर भूल करने जा रही है कि जिसके बाद उसके बचने का कोई भी मार्ग बाकी नहीं बचता है. पहले रामदास, राजेश फिर अमरनाथ. उसके बाद अमलतास. एक के बाद एक गलतियाँ करने के पश्चात . . .और अब . . .आगे . .? अपने जीवन के साथ अपनी दो नन्हीं जानों का भी भविष्य वह काला बना देना चाहती है? सोचते हुए जूही को तुरंत ही अपनी बेटी रक्षा और जिस बच्चे को वह अपनी कोख में लिए फिर रही है वह . . .? दोनों ही का ख्याल आते ही उसके जिस्म की रूह अंदर तक काँप गई. काँप गई तो उसने शीघ्र ही चूहे मारनेवाली दवा से भरा गिलास फेंककर सामने कमरे की दीवार से दे मारा और जाकर मेज पर रखी हुई जीजस की तस्वीर के सामने सर झुकाकर फूट-फूटकर रोने लगी. मानव जीवन में यदि इंसान की परेशानियों, दुखों और समस्याओं का समाधान हमेशा दुनियाबी तरीके से हो जाया करता तो शायद ईश्वर, भगवान और विधाता जैसे शब्दों का अस्तित्व ही नहीं होता. मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

तेरे शहर में - रोमांचक कहानी - Story - Stories

‘नवरोश को जब अपने काम के सिलसिले में रत्नागिरि जाने का अवसर मिला तो उसे यह जानकर अत्यन्त प्रसन्नताहुई कि सारे शहर के लोग उसे शक्ल से ना जानकर उसके नाम से बख़ूबी जानते हैं, पर वहां पर जो उसे बहुत करीबसे जानता था, उसके पास कहने के लिये शब्द ही नहीं थे।’ अचानक से आकाश में एक तिहाई चांद के बदन को जब एक आवारा लावारिस सी बदली ने आकर अपने अंक में छुपा लिया तो पल भर में सारा आलम मटमैली चांदनी के रंग में फीका पड़ गया। इस प्रकार कि बढ़ती हुई रात की निस्तब्धता में भी हल्के से भय की एक रेखा भी मन ही मन कांप गई। दूर नदी के जल की लहरें हल्की हवाओं की कंपन के कारण किसी बार­बार पलटती हुई मछली के समान चमक रही थीं और शहर की विद्युत बत्तियों का प्रकाश पानी के जल में मचलती हुई लहरों के साथ तरह­-तरह के रंगों की अबरी बना रहा था। ख़तरे के निशान को छूती हुई नदी के बाढ़ के पानी की धारायें जब भी अपने पूरे बल के साथ पुल की दीवारों पर टक्करें मारती थीं तो पुल की मुंडेर पर बैठे हुये नवरोश का शरीर भी हिल जाता था। पुल पर आती­जाती मोटर­गाडि़यों और मनुष्यों के भरपूर आवागमन का शोर था, परन्तु नवरोश को इन सारी बातों का कुछ भी ध्यान नहीं था। यूं भी मनुष्य जब अपने विचारों और सोचों में लीन हो जाता है तो उसे अपने आस-­पास की किसी भी बात का कुछ भी होश नहीं रहता है। यही हाल नवरोश का भी था। कल तक उसके सारे कार्यक्रम समाप्त हो गये थे और आने वाले कल की सुबह में उसे वापस लौटना भी था। मिलने­-जुलने वालों से भी उसे फुरसत मिल चुकी थी। लेकिन जब उसका मन होटल में नहीं लगा तो वह किसी को भी बताये बगैर चुपचाप बहुत शाम से ही यहां आकर बैठ गया था। और तब से बैठे­-बैठे बहुत कुछ सोचे जा रहा था। अतीत की बहुत सारी बीती हुई बातों को याद किये जा रहा था। वैसे उसे इन सारी बातों को फिर से दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं होती यदि इस शहर में तमाम लोगों की भीड़ में यदि अचानक से उसे उल्का नहीं मिलती . . .? . . .बैठे हुये दूर क्षितिज के किनारों को देखते हुये, पीछे से आकर अचानक ही किन्हीं मुलायम हाथों और पतली हथेलियों ने नवरोश की आंखें बंदकर लीं तो वह सहज ही चौंका तो पर आश्चर्य नहीं कर सका। उसे समझते देर नहीं लगी कि किसी ने उससे खेल के साथ छेड़खानी की है। अब उसे बगैर हाथों को हटाये और बिना अपनी आंखें खोले हुये उसकी आंखें बंद करनेवाले का नाम बताना था, तभी उसकी जीत संभव थी। उसके नथुनों में नाख़ूनों पर नई लगी हुई लाली की खुशबू भर रही थी। नवरोश आंखें बंद करनेवाले को अपने स्पर्श से पहचानने की चेष्टा करते हुये अपने दोनों हाथों को उसकी हथेलियों को छूते हुये उसकी कोहनी की तरफ ले जाने लगा। छूते­-छूते ज्योंही उसके हाथ कोहनी से ऊपर बगलों तक जाने लगे तो फौरन ही उसकी आंखें बंद करनेवाले ने अपने हाथ पीछे खींच लिये और फिर जैसे चिढ़ते हुये कहा कि, ‘बदतमीज़! पहचानकर बताया तो गया नहीं, ऊपर से शैतानी करने लगे?’ ‘?’ नवरोश ने अपनी आंखें मलते हुये देखा तो सामने उल्का खड़ी हुई मुस्करा रही थी। इतने दिनों तक एक ही कक्षा में साथ पढ़ते हुये उल्का की नवरोश के प्रति यह पहली शरारत थी। उसके पश्चात कब उन दोनों की कॉलेज की पढ़ाई समाप्त हुई और कितना शीघ्र ही वे दोनों उम्र के उस मोड़ पर पहुंच गये जहां पर आकर उन्हें यह महसूस होने लगा कि अब उन्हें एक दूसरे को यह बता देना चाहिये कि चाहत की यह लुका­छुपी बहुत दिनों तक नहीं चल सकेगी। वे दोनों मन ही मन सारी दुनियां से कहीं दूर अपना अलग घरौंदा बसाने के सपने देखने लगे हैं। दोनों के मध्य का यह समय और फासला इतनी जल्दी समाप्त हो गया कि किसी को कुछ एहसास ही नहीं हो सका। यदि कुछ महसूस हुआ भी तो केवल इतना ही कि वे दोनों आपस में एक­दूसरे को इसकदर चाहने लगे हैं कि उसका बयान शब्दों में नहीं कर सकते हैं। तब इन्हीं दिनों एक दिन नवरोश ने उल्का से अपने मन की बात कही। बड़े दिन की पच्चीस तारीख की रात को चर्च के अन्दर मोम बत्तियों को जलाने के पश्चात नवरोश उल्का का हाथ पकड़े हुये काफी दूर एकान्त में आ गया। जाड़े की ठंडी रात थी। चर्च विला की बस्ती के सारे मकानों में यीशु मसीह के जन्म के उपलक्ष्य में मोमबत्तियों का प्रकाश झिलमिला रहा था। आकाश में चन्दमा की गैर­मौजूदगी के बावजूद भी छोटी­छोटी तारिकायें सर्दी की इस रात के फैले हुये अंधकार को मिटाने का एक असफल प्रयत्न कर रही थीं। तभी नवरोश ने अपने मन की बात उल्का से कही। वह आकाश की ओर देखता हुआ बोला, ‘उल्का, यह पूरे के पूरे फैले हुये सौर्यमंडल को देख रही हो?’ ‘हां।’ ‘मैं जब भी रात की ख़ामोशी में इस आकाश की तरफ देखा करता हूं तो हमेशा ही मुझे कोई न कोई उल्का टूटती हुई नज़र आ जाती थी। और जब वह टूटती हुई नीचे धरती की तरफ गिरने लगती थी तो मैं यही मनाता था कि वह किसी भी तरह से मेरी झोली में आ जाये।’ ‘हां। लेकिन कहना क्या चाहते हो तुम?’ उल्का ने बात की गहराई को समझते हुये भी रात के अंधकार में भी नवरोश की आंखों में एक संशय से झांकते हुये पूछा। ‘यही कि आकाश से उल्का टूटकर नीचे धरती पर आती तो है, लेकिन अफसोस यही है कि वह मेरी झोली में क्यों नहीं गिरती है?’ ‘अच्छा। कहानियां लिखते-­लिखते मेरे लिये कोई ऐसी कहानी मत बना देना कि सारी जि़न्दगी उसे पढ़­-पढ़कर आंसू बहाते रहो। अगर तुम में हिम्मत है तो मेरे मामा­-पापा से खुद ही बात करो। नहीं तो अपने घर से किसी को मेरे घर भेजो।’ ‘?’ उल्का की इस बात पर नवरोश की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वह मुस्कराते हुये बोला, ‘मैंने दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन के संपादकीय विभाग में नौकरी के लिये आवेदन दिया है। वहां मुझे दो सप्ताह के पश्चात साक्षात्कार के लिये जाना है। मुझे पूरी आशा है कि यह नौकरी मुझे जरूर ही मिल जायेगी। नौकरी मिलते ही मैं अपनी मां को तुम्हारे घर जरूर भेजूंगा।’ नवरोश और उल्का की यह मुलाकात यहीं समाप्त हुई। बड़ा दिन चला गया। नया साल भी बहुत सी आशायें लाकर दिलों की धड़कनें बढ़ा गया। नवरोश को दिल्ली प्रेस में सह­-संपादक की नौकरी भी मिल गई। देखते­-देखते खुशियों के अंबार इसकदर एकत्रित हुये कि उस पर वक्त की चीलें जलस के कारण अपने पंजों को मजबूत करने लगीं। नवरोश की मां उल्का के घर उसके रिश्ते की बात करने जाती, उससे पहले ही अपनी नई नौकरी पर जाने से एक दिन पहले उल्का नवरोश के पास आई। अत्यन्त दुखी, खूब ख़ामोश और निराश, परेशान सी। नवरोश ने उल्का की यह दशा देखी तो वह एक दम से कुछ समझा तो नहीं, लेकिन उसका चेहरा अपने हाथ से ऊपर उठाते हुये उसकी आंखों में देखते हुये बोला, ‘क्यों? क्या हो गया तुम्हें अचानक से? तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ क्यों है?’ ‘?’ उल्का ने कहा तो कुछ भी नहीं। वह चुपचाप अपना सिर नवरोश के सीने पर रखकर सिसकने लगी। तब नवरोश ने उल्का का चेहरा फिर से ऊपर उठाया। उसे गौर से देखा। उसकी आंखों में झलकते हुये ढेर सारे आंसुओं की बाढ़ को देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि उसकी सारी चाहतों पर पाबन्दी लग चुकी है। फिर भी अपना सन्देह मिटाने की गरज़ से उसने उल्का से पूछ ही लिया। वह बोला, ‘अब तुम कुछ बताओगी भी या फिर . . .?’ तब उल्का नवरोश की आंखों में झांकती हुई बोली, ‘मेरी किस्मत भी बड़ी अजीब है। सारी दुनियां में एक तुम ही रह गये थे, इसकदर प्यार करने के लिये?’ ‘?’ नवरोश बोला तो कुछ नहीं, मगर वह उल्का को बड़ी गंभीरता से देखने लगा। तभी उल्का उससे दूर हटते हुये बोली, ‘मेरे मामा-­पापा ने मेरा रिश्ता रत्नागिरि में रहने वाले किसी इंजीनियर लड़के से तय कर दिया है।’ ‘और तुमने भी यह रिश्ता मंजूर कर लिया?’ नवरोश ने गंभीरता से पूछा। ‘तो मैं क्या करती? अपने मां­-बाप से क्या बगावत करूं?’ ‘नहीं। बगावत तो मुझे करनी चाहिये, अपने आपसे, जिसने बगैर आगा­-पीछा सोचे हुये उस लड़की से प्यार की आस की जो मेरे दिल की धड़कनों का बोझ भी बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। उस लड़की के लिये जिसको शायद प्यार की झूठी कसमें खाने की आदत थी? एक ऐसी कमजोर मुहब्बतों के डर-डर के अपने कदम रखनेवाली उस लड़की के लिये जो ज़रा सी मौसमी हवाओं का झोंका खाते ही अपने प्यार का विश्वास बदल बैठी?’ नवरोश के स्वर बोझिल हुये तो उल्का जैसे तड़प गई। आंखों में आंसू भरे हुये ही वह जैसे खुद को संभालने की कोशिश करते हुये नवरोश से बोली, ‘तुम मुझसे शिकायत कर रहे हो? यह जानते हुये भी कि बेटियां तो अपने मां­-बाप की इज्ज़त हुआ करती हैं?’ ‘हां। तुम ठीक ही कहती हो। मेरे प्यार का कफन तुम्हारे मामा­-पापा की इज्ज़त से बहुत हल्का है। शायद तुम्हारी आंखों में पिछले पांच सालों से अपनी तस्वीर को देखते­-देखते मैं यह सब भूल ही गया था?’ ‘अब तुम मुझे खूब तो क्या, सारी उम्र दोष देते रहना। पर तुम क्या जानो कि मैं तुम्हें कितना चाहती हूं? किसकदर प्यार किया करती हूं? मैं तुम्हारी चाहतों की कोई दुश्मन तो नहीं हूं, पर जिस पृष्ठभूमि पर मेरी परवरिश हुई है, उसके उसूलों की दासी जरूर हूं। इस दासी की मजबूरियों पर कभी अगर गंभीरता से गौर करोगे तो हो सकता है कि तुम मुझे मॉफ भी कर दो।’ ‘अच्छा। जीवन में कभी यदि मैं तुमको अचानक से मिल गया तो.. .?’ ‘तुम्हारी तरफ देखूंगी जरूर।’ ‘लेकिन पहचानोगी नहीं?’ ‘?’ उल्का चुप रह गई। वह आगे कुछ भी नहीं कह सकी। उल्का की इस बेबसी भरी चुप्पी पर नवरोश बड़ी देर तक कुछ भी नहीं बोला। काफी देर तक वे दोनों मूक ही खड़े रहे। बिल्कुल पत्थर के बुतों समान। बड़ी देर तक दोनों के मध्य ख़ामोशी एक तीसरे बजूद के समान अपना डेरा डाले रही। फिर काफी क्षणों के पश्चात नवरोश ने ही दोनों के मध्य छाई हुई चुप्पी को तोड़ा। वह बोला, ‘लोग कहा करते हैं कि टूटते हुये तारे या उल्का को देखना शुभ नहीं होता है। मैं कभी भी ऐसी बातों पर विश्वास नहीं किया करता था, पर आज विश्वास करना पड़ा है। शायद किस्मत ने हम दोनों का साथ यहीं तक लिखा था। आज के बाद मैं तुम्हारी दुनियां से कहीं बहुत दूर निकल जाऊंगा और कोशिश करूंगा कि कभी भी भूले से तुम्हारे सामने न आ सकूं, ताकि तुम मुझे देखकर अपने होनेवाले पति के महान प्यार का अपमान न कर सको।’ इसके पश्चात फिर दोनों कभी भी नहीं मिले। यहीं इसी जगह तक शायद दोनों को आना था और यहीं से सदा के लिये अलग भी हो जाना था। बाद में उल्का का विवाह धूमधाम से हो गया। उल्का ने ना तो अपने विवाह का कार्ड ही नवरोश को भेजा और ना ही वह खुद भी उसके विवाह में आया। उल्का विवाह के पश्चात अपने पति के घर चली गई। दूसरी तरफ नवरोश अपनी नौकरी के सिलसिले में अपने घर से बाहर निकला तो फिर कभी उसने मुड़ कर उस तरफ देखा भी नहीं। कभी एक बार लौटकर आया भी नहीं। और वह देखकर करता भी क्या। वापस आकर उसे अब करना भी क्या था? फिर उस शहर और स्थान से उसे अब सरोकार भी क्या हो सकता था, जहां पर समय की मौसमी हवा के एक ही झोंके से उसके प्यार-­भरे नींड़ के परखच्चे उड़ चुके थे। कितना बुरा उसके प्यार का हश्र हुआ था? सारे रास्ते एक आशा पर चलते हुये मंजिल के पास आकर ही उसके सारे सपनों पर आग बरस पड़ी थी। वह अपना दुख किससे और क्यों कहता? उल्का शादी के पश्चात अपने घर चली गई तो नवरोश ने भी किसी तरह अपने आपको समझाया। अपनी नौकरी में दिल लगाने की कोशिश की। लिखता तो वह पहले ही से आ रहा था लेकिन अब उसकी लेखनी से उसके दिल के घाव रिस­-रिसकर टपकने लगे तो उसके लेखन में एक कशिश, एक अनकहा दर्द और तड़प भी शामिल हो गई। इस प्रकार कि उसके पाठक उसे एक मर्मस्पर्शी कथाकार के रूप में बखूबी जानने और पहचानने लगे। फिर अपने लेखन के सिलसिले में जब अपनी नई पुस्तक ‘काठ का कारीगर‘ के विमोचन के अवसर पर नवरोश को रत्नागिरि में आना हुआ तो वहां पर अन्य लोगों की भीड़ में वह उल्का को देखकर चौंका तो पर साथ ही प्रसन्नता भी हुई और दुख भी। प्रसन्नता इसलिये कि एक अरसे के पश्चात उसने उल्का को देखा था। उस लड़की को फिर से पाया था जिसके प्यार के एक मात्र तमाचे ने तमाम लोगों की भीड़ में उसे एक लेखक के रूप में सुप्रसिद्ध कर दिया था। और दुख इस कारण हुआ था कि उल्का ने उसे एक लेखक के तौर पर पहचाना तो था, लेकिन जिस नवरोश को वह खो चुकी थी उसे पहचानने की वह हॉमी नहीं भर सकी थी। कितनी अजीब बात थी कि उल्का के अपने शहर में नवरोश के न जाने कितने जानने वाले थे, मगर जो उसको बहुत करीब से जानता और पहचानता था वही उससे मीलों दूर था, और उसके पास इज़हार के लिये शब्द ही नहीं थे। मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

और सूरज डूब गया - Real Story - Real Stories

चांदनी, यह रही तुम्हारी बिछुड़ी हुई चूड़ी का दूसरा हिस्सा। दुर्घटना के समय तुम्हारी टूटी हुई वह चूड़ी, जिसको तुम्हारी जान बचाने की ख़ातिर, मैंने कभी तुम्हारे ही कोमल जिस्म से काटकर बाहर निकाला था। तुम्हारी प्यारी सोने की चूडि़यां, वर्षों पहले इन्हें तुम्हारे हाथों में पहनाने के मैं कभी लायक नहीं था, और आज इन्हें पहनाने का मुझे कोई भी अधिकार नहीं। इसको मेरी तरफ से अपने विवाह का एक उपहार समझकर स्वीकार कर लेना। मैं यहां से जा रहा हूं। तुम्हारा शहर और तुम्हारी हरेक वह जगह को छोड़कर, उस स्थान पर जहां पर मुझे तुम्हारी स्मृतियों की सुगंध कभी भी परेशान न कर सके। अपने पति के साथ, अपने जीवन के नये संसार में, खुशियों की एक नई कहानी शुरू करके, उस किताब को सदा के लिये बंद कर देना, जिसमें शायद कभी भूले से मेरा नाम आ गया था। सूरज।’ चांदनी ने एक ही सांस में पत्र में लिखी चार पंक्तियां पढ़कर समाप्त की तो तुरन्त ही वह सकते में आ गई। इस प्रकार कि अचानक ही उसका दिल किसी अपराध बोध की भावना से ग्रस्त होकर हिल सा गया। वह समझ तो गई कि उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया है कि जिसके कारण वह एक भूल और अपराध की श्रेणी में गिनी जाये, पर फिर भी उसकी आंखों के सामने जैसे अंधकार सा छा गया। कितने वर्षों से वह अपने कदम जीवन की हरेक डगर और गली में फूंक-फूंककर रखती आई थी। अपने जज़बातों पर काबू करके प्यार की हवाओं से खुद को बचाती आई थी। एक प्रकार से सूरज को वह भूल ही चुकी थी। जब उसने कभी आवाज़ दी थी तो सुनकर भी वह अनजान बन गई थी। कारण था कि एक मसीही लड़की होते हुये वह, अपने आपको आदर्श नारी के पथ पर चलाते हुये इन सारी बातों से दूर रखती आई थी। सोच लिया था कि कायदे से मां-बाप के कहने पर, उनकी ही मर्जी के अनुसार अपना विवाह कर लेगी। लेकिन पिछले दिनों जो घातक दुर्घटना उसके जीवन में हुई और अचानक से एक अनजान, अनदेखा युवक उसके जीवन में उसका दूसरा जीवन बनकर ऐसा उदित हुआ कि, जिसने उसे मौत के पंजे से बाहर निकाला तो बहुत स्वभाविक ही था कि ऐसे स्वर्गीय-दूत स्वरूप पुरूष के विषय में वह सोचने पर विवश हो जाये। सोचना क्या वह तो सोचने से भी कहीं ज्यादा बहुत कुछ सोच बैठी थी। कितना इंतजार किया था उसने तब उस अनजान युवक का? कितना अधिक मन ही मन वह उसको चाहने लगी थी। बिन देखे ही वह उस अनजाने पुरूष को अपने मन-मन्दिर में वह विशेष स्थान दे चुकी थी, जो हरेक लड़की अपने जीवन में किसी एक को यह स्थान केवल एक बार ही दे पाती है। इतना ही नहीं कि जिस अनजान युवक को वह अपने मन-मन्दिर का चहेता बनाकर, अपने दिल की धड़कनों में बसा चुकी थी, वह कोई भी अनजान और अपरिचित युवक न होकर वही सूरज था, जिसने वर्षों पहले उसको अपना बनाने के लिये कभी कोई गुज़ारिश की थी। सोचने ही मात्र से चांदनी की आंखें ठंडी रात में पुष्पों के होठों पर पड़ने वाली किसी शबनम की बंूदों समान भर आईं। काश: सूरज उसके सामने बहुत पहले ही आ जाता। आ गया होता तो तब तो उसके जीवन की कहानी का मजमून ही दूसरा होता। अपने पसंद की प्यार की बगिया में वह सूरज के साथ दो सूख़ी रोटियां ही खाकर जितना खुश होती, शायद उतना कभी भी नहीं हो पाती। सोचते हुये चांदनी की आंखें स्वत: ही भीग आईं। इस प्रकार की उसकी आंखों में मोती झलकने लगे। कितनी बड़ी भूल और चूक वह अपने जीवन में कर चुकी थी। इतना बड़ा उधार का बोझ वह अपने सिर से बांध चुकी थी कि जिसके ब्याज का एक रत्ती भर हिसाब भी वह अब कभी नहीं दे सकेगी। वयो-संन्धि की उम्र पार करते ही, जि़न्दगी के तमाम आयामों से गुज़रते हुये उसके जीवन की गाड़ी में सूरज के प्यार की छिली हुई कराहटें फिर एक बार आकर उलझ जायेंगी; सोचते हुये चंादनी की आंखों में आज से पन्दरह वर्ष पुरानी वह घटना सामने आ गई, जब सूरज से उसका सामना अचानक ही हो गया था। तब चांदनी अपनी कॉलेज की गर्मी की छुट्टियां समाप्त होने से पहले, कॉलेज में प्रवेश लेने के लिये आवश्यक कागज़ात आदि सम्मिलित करने के लिये इस नये शहर के मशहूर कॉलेज में आई थी। हांलाकि, वह मिशन डॉयोसीज़ के बिशप की लड़की थी। मिशन का ईसाई कॉलेज था। इस शहर तो क्या, आस-पास के तमाम शहरों के मिशन स्कूलों और कॉलेजों में उसके पिता की तूती बोलती थी। चांदनी चाहती तो उसका सारा काम यूं भी घर बैठे ही हो जाता, पर नये शहर और अपने पिता की नई कार चलाने और नया शहर घूमने की इच्छा के कारण ही वह अपनी अन्य दो सखियों के साथ चली आई थी। कॉलेज के कार्यालय में आकर उसे कोई विशेष कार्य तो करना नहीं था, केवल पेपर ही जमा करने थे। उसका सारा काम उसके पिता के केवल एक फोन करने से ही हो चुका था। सो कॉलेज के कार्यालय में आकर उसने अपने पेपर जमा कराये। कॉलेज के कार्यालय के मुख्य हैडक्लर्क उसके आने की पहले ही से प्रतीक्षा कर रहे थे। पेपर जमा करते हुये चांदनी को कोई विशेष आश्चर्य भी नहीं हुआ, क्योंकि ऐसी बातों का चांदनी को बहुत अच्छा अनुभव पहले ही से था। अपना काम समाप्त करने के पश्चात, उसने एक अच्छे रेस्तरां में खाना खाया और फिर सहेलियों के साथ उसने अपनी कार का मुख हिमसारा नदी की तरफ मोड़ दिया। उसने सुना और पढ़ा भी था, हिंडौली शहर की यह नदी अपने आस-पास की खुबसूरती और प्राकृतिक छटाओं के लिये काफी सुविख्यात थी। फिर यूं भी चांदनी को प्रकृति की सजावट और मनोहरता बेहद प्यारी लगती थी। नदी के तट पर पहुंचते ही चांदनी सचमुच ही उसकी बहारों में खो सी गई। नदी की मदमस्त लहरों से नहाती हुई ठंडी हवाओं ने जब उसके जिस्म को स्पर्श किया तो स्वत: ही चांदनी के बदन में भी जैसे खुशियों की रश्मियां झिलमिलाने सी लगीं। उसने अपने आप ही अंदाजा लगा लिया पा जब गर्मी के दिनों में मौसमी वनस्पति और वृक्षों का ये नजारा है तो बसंत में पतझड़ से पहले और नई कोपलें आने के पश्चात इस नदी के मुहाने कितना कुछ प्रभावित करते होंगे। लगता था कि ढलते हुये सूर्य की रश्मियों के सहारे वृक्षों, झाडि़यों और तमाम वनस्पति की परछाइंयां नदी के जल में बड़े ही आराम से पसर कर सन्ध्या का स्नान करती होंगी। चांदनी अभी भी पुल की मुंडेर से अपने दोनों हाथों को अपने मुख के सहारे लगाये हुये इन्हीं विचारों में गुम थी कि, तभी अचानक से किसी मधुर बांसुरी की धुन ने उसका ध्यान भंग कर दिया। पुल के दूसरी तरफ से, पेड़ों की छांव से, नदी की लहरों के बदन को चीरती हुई बंसुरी का मोहक दर्दभरा सा संगीत चांदनी के कानों में जैसे हलचल मचाने लगा था। किसी ने अनजाने में ही एक प्यारा, मधुर और मसीही गीत छेड़ दिया था। बांसुरी की लय पर जो गीत बजाया जा रहा था, उसके बोल थे, ‘मेरे पिता, यह मेरी दुआ, यीशु की मानिन्द तू मुझको बना।’ इतनी प्यारी, धाराओं के गर्भ से निकलने वाली बांसुरी की आवाज़ थी कि चांदनी के पैर स्वत: ही उस तरफ बढ़ने लगे, जिधर से यह सुगम संगीत आ रहा था। वह चुपचाप जाने लगी तो उसकी सख़ी राहेल ने उसे टोका भी। वह बोली, ‘ऐ, किधर जाती है?’ लेकिन चांदनी ने उसकी तरफ हाथ से इशारा करके, उसको तुरन्त नकार दिया और फिर से आगे बढ़ने लगी। जल्दी ही, चांदनी उस स्थान तक पहुंच गई जिधर से ये मधुर धुन आ रही थी। पास, लेकिन थोड़ा दूर ही से, खड़े होकर चांदनी ने देखा कि कोई युवक नदी के किनारे, पेड़ों की छांव में, अपनी बंसी पानी में डाले हुये चुपचाप बांसुरी बजा रहा है और शायद मछली फंसने का इंतजार भी कर रहा है। मछली, बंसी और बांसुरी; इन तीनों बातों का संगम एक ही स्थान पर? सोचकर चांदनी किसी भी निर्णय पर नहीं पहुंच सकी। वह लड़का अभी भी अपनी बांसुरी बजाने में लीन था। चांदनी काफी देर तक चुपचाप खड़ी हुई उस लड़के को देखती रही। उसने सोचा कि, कौन हो सकता है ये युवक? मसीही गीत की धुन बजाता है, तो अवश्य ही मसीही भी हो सकता है। मछली का शिकार, कबूतर, फाख्तायें और नील गायों का शिकार आदि करने में ईसाई लड़के तो यूं भी माहिर होते ही हैं। उससे बोलूं, न बोलूं, ना जाने कौन हो सकता है? फिर, नया शहर, नई जगह, नदी का किनारा, एकान्त? कुछ भी हो सकता है; एक आशंका और भय के कारण चांदनी के पैर अपने आप ही पीछे लौटने लगे। राहेल और उसकी दूसरी सहेली मधु, दोनों उससे कुछ दूर ही खड़ी हुई, उसको ही देख रही थीं। चांदनी पास आई तो राहेल ने चुटकी ली। उसे छेड़ा और बोली, ‘देख लिया जी भर के?’ ‘हां।’ ‘कैसा लगा? पसंद आया?’ ‘नहीं।’ चांदनी ने भी वैसा ही उत्तर दिया तो मधु बोली, ‘लगता तो ईसाई है।’ ‘हां, लेकिन मछलीमार है।’ ‘यीशु मसीह के शिष्य भी तो मछलीमार ही थे।’ ‘हां थे, लेकिन बहुत अंतर है, गलील के सागर के मछुआरों और नदी के मछलीमारों में।’ चांदनी ने उत्तर दिया। बाद में चांदनी हिमासारा के नज़ारे देखकर वापस अपने शहर में आ गई। नदी वाली घटना और उस युवक के द्वारा प्यारी बांसुरी की धुन पर मसीही गीत बजाने वाले उस युवक का ध्यान भी उसके मानसपटल पर से धीरे-धीरे दो-एक दिनों में ही साफ भी हो गया; लेकिन बांसुरी की उस प्यारी और सुरीली आवाज़ को भी चांदनी भूल सकी, इसमें अवश्य ही सन्देह था। फिर जुलाई में कॉलेज खुले। नया सत्र आरंभ हुआ। चांदनी अपना शहर छोड़कर, एक मसीही कम्पाऊंड में ही मिशन की एक खाली पड़ी कोठी में रहने लगी। यहां भी उसके रहने का प्रबंध उसके पिता के नाम पर ही हो सका था। मिशन बंगले में रहते हुये चांदनी कॉलेज जाने लगी और अपनी पढ़ाई में व्यस्त भी हो गई। पर एक दिन अचानक से उसने हिमसारा के किनारे उस बांसुरी बजाने वाले युवक को कॉलेज में किताबें पकड़े हुये देखा तो खुद को संभाल नहीं सकी। वह युवक जल्दी-जल्दी अपनी किसी कक्षा में जा रहा था। चांदनी ने शीघ्र ही उस युवक को टोका। वह बोली, ‘ऐ, हलो, ज़रा सुनिये तो?’ कहते हुये चांदनी उसके सामने अचानक से आई तो वह युवक भी आश्चर्य से अपने स्थान पर ठिठक कर खड़ा हो गया और चांदनी का मूंह ताकने लगा। तभी चांदनी ने उससे कहा कि, ‘मैं अगर भूलूं न तो आप वही तो नहीं जो एक दिन शाम के समय हिमसारा पर मछली की बंसी पानी में डाले हुये बेहद प्यारी बांसुरी बजा रहे थे?’ ‘?’ चांदनी के कथन पर वह युवक थोड़ा चौंका पर गंभीरता से उसका चेहरा ताकने लगा। तभी चांदनी फिर से बोली, ‘मैं ठीक कह रही हूं न?’ ‘आपको कैसे मालुम?’ उस युवक ने आश्चर्य से पूछा। ‘मैं भी उसी दिन हिमसारा पर घूमने गई हुई थी, तभी आपको नदी के किनारे बैठे हुये और बांसुरी बजाते हुये देखा था।’ चांदनी की बात सुनकर वह युवक हल्के से मुस्कराया, फिर बोला, ‘आपने मुझे वहां पर देखा तो था, पर बोली कुछ भी नहीं।’ ‘हिम्मत ही नहीं हुई थी। एक अनजान से गुफ्तगू करने की। फिर किसी का क्या भरोसा। किसी के माथे पर तो नहीं लिखा होता है कि वह कौन है?’ चांदनी बोली तो वह युवक बोला, ‘चलिये मैं बताता हूं। मेरा पूरा नाम सूरज ज्योति प्रकाश है। मेरे पिता रेव्हरेंड ज्योति प्रकाश बदरिया कस्बे के एक छोटे से चर्च के कारगुजार हैं। दो माह पहिले मेरा टयूबरक्लोसिस का टेस्ट पॉज़ीटिब निकला था। डाक्टर ने अच्छी हेल्दी प्रोटीन डाइट खाने को बोला है। पापा की कारगुज़ारी की छोटी सी तनख्वाह में मेरी दवाइयों का खर्च तो जैसे-तैसे पूरा हो जाता है, लेकिन हेल्दी डाइट में रोजाना मीट और मछली नहीं खा सकता हूं। इसलिये हिमसारा पर मछली पकड़ लेता हूं, और कभी-कभार दो एक कबूतर मार कर अपना काम चला रहा हूं।’ सूरज ने अपने बारे में बताया तो चंादनी बड़ी देर तक कुछ भी नहीं बोली। वह चुप ही बनी रही तो सूरज ने आगे कहा, ‘अच्छा, अब मैं चलता हूं। मेरी क्लास शुरू हो चुकी है।’ उपरोक्त पहली मुलाकात के पश्चात, चांदनी प्राय: ही सूरज को कॉलेज में मिलती रही। सूरज चांदनी को अच्छा लगा। उसका स्वाभाव, कम बोलना और अपने ही काम तथा उत्तरदायित्वों तक सीमित रहना, जैसे उसकी आदत में शामिल था। वह उससे बोलती थी। बातें करती थीं। वह उसे पसंद था और अच्छा भी लगता था, लेकिन इतना सब कुछ होने के पश्चात भी चांदनी के बजूद ने कभी भी उसको सूरज के तंग दायरों में देर तक खड़े रहने की इजाजत नहीं दी। सूरज की हालत और पारिवारिक स्थिति ने चांदनी को यह बताने में कोई भी झिझक महसूस नहीं होने दी कि सूरज चाहे कितना भी भला लड़का क्यों न हो, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, पर आखिरकार वह उस गरीब पादरी कारगुजार का ही लड़का है कि जहां की सरहदों पर उसके पिता के हुक्म सदा राज्य किया करते हैं। फिर एक दिन चांदनी को यह भी महसूस हो गया कि, हरेक दिन उसका सूरज से मिलना, रोजाना कॉलेज आना और जब देखो तब ही उसका सूरज से हंसते खिल-खिलाते हुये बातें करने का नतीज़ा; सूरज के दिल में अपने उस प्यार का निमंत्रण देना हुआ कि जिसके बारे में उसने कभी भी सोचा तक नहीं था। सूरज की आंखों में छिपी हुई चांदनी की वह ठंडक जो सूरज की रश्मियों को अब छेड़ने लगी थी, उसको चांदनी स्पष्ट महसूस कर रही थी। सूरज उसको चुपचाप देखने लगा था। देखकर गंभीर और खोने लगा है। उसकी आंखों में चांदनी के अक्श को सदा अपना बनाने के लिये एक पूरा कैनवास तैयार हो चुका है। इस हकीकत को चांदनी ने तब जाना, जब कि अब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह जान गई थी कि सूरज के उसकी तरफ बढ़े हुये कदमों को अब वापस लौटाना सहज नहीं था। फिर एक दिन चांदनी को जिस बात का भय था, वही हो गया। एक समय पर सूरज ने चांदनी से कह ही दिया। वह अत्यन्त ही बोझिल आवाज़ में चांदनी से बोला कि, ‘चांदनी, कभी मैंने आरंभ में सोचा भी नहीं था कि, मैं कभी भी किसी की प्यार की हसरतों में जकड़कर उसकी गुलामी करने लगूंगा। डाक्टर ने मुझको बांसुरी बजाने के लिये मना किया है। उनका कहना है कि बांसुरी बजाने से फेफड़े खराब होते हैं, लेकिन तन्हाइयों में डूबी हुई मेरी बांसुरी की आवाज़ अब केवल चांदनी को ही पुकारा करती है। अगर तुम नहीं सुनोगी तो मेरे फेफड़े सदा के लिये खराब हो जायेंगे, और सूरज हमेशा के लिये डूब जायेगा।’ ‘?’ सूरज के गले से निकले हुये दर्द भरे शब्द चांदनी को अपने दामन में समेटने के लिये बेताब हो चुके हैं, उससे अपने प्यार की हसरतों का तकाज़ा कर रहे हैं; सुनकर चांदनी दंग रह गई। रोज़ाना की आपसी मुलाकात का अंजाम इस हद तक पहुंच जायेगा? नौबत यहां तक भी आ जायेगी? सुनकर, चांदनी के पैरों से जैसे सारी ज़मीन ही खिसक गई। सूरज उसको प्यार करे, इससे पहले वह उसके लिये एक बीमार, कमज़ोर और लाचार लड़का है। उसका आवश्यकता से अधिक हर वक्त सोचना, उसके स्वास्थ्य के लिये अच्छा भी नहीं है। उसने सूरज को अपने करीब लाने में जो गलती की है, उससे ज्यादा अच्छा उससे दूर हो जाना ही बेहतर होगा। अपने मन की विचार धाराओं में इस बात को बसाये हुये, चांदनी सूरज को कोई भी उत्तर दिये चुपचाप उसके सामने से चली गई। फिर कई दिनों तक वह उसके सामने भी जानबूझ कर नहीं आई। सूरज से वह दूर ही बनी रही। सूरज ने उससे बात करनी चाही, लेकिन चांदनी ने उसे अवसर ही नहीं आने दिया। नतीजा; सूरज निराश होने लगा। अपने प्रति चांदनी की आंखों में बसी हुई निर्लिप्तता का वह कोई ठोस कारण तो नहीं जान सका, पर इतना जरूर समझ गया था कि चांदनी की उसके प्रति पलायनता अवश्य ही जारी हो चुकी है। वह उससे दूर हटने लगी है। अब वह उसमें कोई दिलचस्पी भी नहीं ले रही है। सूरज के लिये इतना ही इशारा काफी था। वह समझ गया कि उसने जो प्रेम का निमंत्रण कभी चांदनी को दिया था, उसका सन्देश ना में ही है। कारण; उसकी गरीबी, कमजोरी, पारिवारिक स्थिति, उसकी बीमारी, चाहे कुछ भी हो सकता है। नाज़ों और ठाठों में पली हुई एक बिशप की अमीर लड़की, किसी गरीब साइकिल चलाने वाले पादरी के लड़के से एक बार को इश्क के पेंतरे जरूर खेल ले, लेकिन उसे जीवन भर का अपना साथी क्यों बनायेगी? यह कोई भी ऐसी बात नहीं थी कि जिसे सूरज न समझ सका हो। वह समझ गया था कि किस प्रकार चकोर पक्षी के प्यार की कराहटें चांदनी के अक्श को पाने के लिये, उसके पत्थरों से टकरा-टकराकर अपना बजूद समाप्त कर देती हैं। किस तरह से नाज़ुक फूलों की महकार का अस्तित्व मौसमी हवाओं के एक ही झोंके में सिमट कर विलीन हो जाता है। आज के जमाने की यही रीति है, रिवाज हैं और, शायद चलन भी। सूरज का दिल टूट गया। इस प्रकार कि पल भर में ही सारा संसार उसे काला दिखने लगा। हर लड़की में उसे चांदनी की बेवफाइंयां नज़र आने लगी। वह फिर से अपना दुख, अपना हाल बांसुरी की दर्दीली धुनों में सुनाने लगा। और तब जब वह कॉलेज में ही, खेल के मैदान में बैठा हुआ बांसुरी बजा रहा था कि, चांदनी उसकी आवाज़ को सुनकर उसके पास आई और छूटते ही बोली, ‘सूरज? अब हर वक्त बांसुरी बजाते रहते हो? तुम्हें मालुम है कि इसका बजाना तुम्हारे स्वास्थ्य के लिये अच्छा नहीं है?’ ‘जानता हूं।’ सूरज ने चांदनी को एक पल निहार कर उत्तर दिया तो वह बोली, ‘जब जानते हो तो फिर क्यों बजाते हो?’ ‘ताकि, जल्दी ही मर जाऊं।’ ‘?’ सूरज के मुख से ऐसी बात सुनकर चांदनी अपना मुंह फाड़कर ही रह गई। वह उसे कई क्षणों तक अपलक घूरती रही। लेकिन बाद में बोली, ‘जानते हो कि तुम क्या कह रहे हो?’ ‘क्या जानता हूं? तुम नहीं जानती हो कि मैं बा्ंसुरी क्यों बजाता हूं?’ ‘मुझे सुनाने के लिये? है ना?’ ‘?’ खा़मोशी। सुनकर सूरज ने अपना सिर झुका लिया तो चांदनी आगे बोली, ‘क्या समझते हो तुम अपने आपको? मुझे प्यार करके मुझ पर एहसान कर रहे हो क्या? फिर यह भी जरूरी नहीं है कि तुम जिसे चाहो वह भी तुम पर मरने लगे?’ कहते हुये चांदनी बिफर गई तो सूरज उसका क्राध में बढ़ता हुआ लाल चेहरा देखने लगा। तब ही चांदनी ने आगे कहा कि, ‘प्यार, मुहब्बत और इश्क की बाजि़यां खेलने से ही इंसान को जीवन में सब कुछ नहीं मिल जाता है। अपने आपको तो देखो पहले? तुम्हारी दशा क्या है? बजाय इसके कि, पहले अपना कैरियर बनाओ, अपना स्वास्थ्य संभालो, अपने आपको ठीक करो, अपने पैरों पर खड़े होकर अपने मां-बाप और परिवार की सहायता करो; बेमतलब में ही दिल का रोग लगा बैठे हो? तुम क्या समझते हो कि इतना सब कुछ देखते हुये भी मैं सब कुछ भूलकर तुम्हारे बदन से लिपट जाऊंगी क्या?’ ‘चांदनी?’ सूरज चिल्ला पड़ा तो चांदनी भी चीख़ी, ‘इतना चिल्लाओ मत। शोर मचाना मुझे भी आता है।’ चांदनी ने गंभीरता से कहा तो सूरज चुप हो गया। उसके बाद दोनों के मध्य काफी देर तक चुप्पी बनी रही। दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोला। सूरज से जब नहीं रहा गया तो वह चांदनी से बगैर कुछ भी कहे, वहां से उठ कर चला गया। चांदनी उसे मूक बनी बड़ी देर तक जाते हुये देखती रही। उसके पश्चात सूरज तीन दिनों तक कॉलेज नहीं गया। चांदनी की आंखें उसे कॉलेज में हर स्थान पर तलाशती रहीं। जब वह नहीं मिला तो वह एक दिन पता लगाते हुये उसके घर जा पहुंची। सूरज की मां ने दरवाज़ा खोला तो चांदनी को देखकर वह पहचान नहीं सकी। सूरज की मां ने उसे बताया कि, बाहर दरवाज़े पर कोई बड़ी प्यारी लड़की तुझे पूछ रही है। क्या तू उसे जानता है?’ सुनकर सूरज बाहर गया तो चांदनी को यूं अचानक से अपने दरवाज़े पर खड़े देख चौंक गया। सूरज ने घर में आने को उससे बोला तो चांदनी ने मना कर दिया तो सूरज उससे बोला, ‘बहुत समझदार हो। जब तुमको मेरे घर में आना ही नहीं है तो अभी से न आने की प्रेक्टिस करना अच्छी बात है।’ ‘?’ उसकी इस बात पर चांदनी ने उसकी आंखों में गौर से झांक कर देखा, और फिर बोली, ‘जो कुछ भी कहना है, वह जी-भर के कह लो। बाद में मैं तुम से कुछ बोलूंगी।’ ‘मेरे पास अब कुछ भी कहने को नहीं बचा है। अब तुम ही कहो, जो भी कहना है।’ तब चांदनी ने उससे कहा कि, ‘मेरे यहां रहने से तुम्हारी परेशानी बढ़ जाती हैै, इसलिये मैं यहां से जा रही हूं, और अब कभी भी तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊंगी। अगर तुम्हें कुछ हो गया तो मैं अपने आपको कभी मॉफ भी नहीं कर पाऊंगी।’ सूरज उससे कुछ भी कहता, उससे पहले ही चांदनी तुरन्त ही उसके सामने से चली भी गई, और वह उसे जाते हुये केवल देखता ही रहा। चांदनी ने जैसा सूरज से उसके दरवाज़े पर कहा था, वैसा ही हुआ भी। क्रिसमस की छुट्टियों के बाद चांदनी सचमुच कॉलेज में नहीं आई। वह डॉयोसीज़ के बिशप की लड़की थी। उसके पिता ने उसकी बाकी की पढ़ाई के लिये जैसा भी प्रबन्ध किया, वह तो सूरज को नहीं मालुम हुआ, पर हां, चांदनी अपनी वार्षिक परीक्षा के दौरान अवश्य ही उसे दिखाई दी थी। इस प्रकार कि, चांदनी से आमना-सामना होने के बाद भी, सूरज उससे कोई भी बात नहीं कर सका था। वह भी समझ गया था कि शायद चांदनी ही उससे बात नहीं करना चाहती थी। यह सोचकर सूरज ने अपने दिल पर पत्थर रख लिया। सालाना परीक्षायें समाप्त हुई। कॉलेज बंद हुये। चांदनी भी परीक्षायें देकर अपने घर लौट गई। फिर धीरे-धीरे समय बदला। तारीखे़ आगे बढ़ी। कई मौसम आये और चले भी गये। सूरज ने भी चांदनी की स्मृतियों को अपने जीवन की एक कभी भी न भूलने वाली घटना के समान हृदय के किसी कोने में सदा के लिये सुरक्षित कर लिया। समय आगे बढ़ा और बढ़ते हुये समय के इन चक्रों में एक-एक दिन निकल कर पन्द्रह वर्ष बीत गये। इतने वर्षों में सूरज का क्या हुआ, वह कहां गया, आदि, इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर चांदनी ने कभी भी जानने की कोशिश नहीं की। एक प्रकार से वह सूरज को सदा के लिये भूल भी गई। सूरज ने भी अपनी पढ़ाई पूरी की। मेहनत की। हिम्मत और साहस से काम लिया। अपना पूरा इलाज करवाया और एक दिन नौकरी के लिये आवेदन पत्र दिया तो एक अच्छी कम्पनी में उसे चार्टर लेखाकार की अच्छी नौकरी मिल गई। नौकरी मिली तो उसे अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर जाना पड़ा। सूरज का काम देखकर, उसका बॉस जो खुद भी लगभग उसी की उम्र का था, उसको बहुत पसंद करने लगा। तीन साल के कार्यकाल में ही उसने सूरज को अपनी कंपनी का मुख्य लेखाकार बना दिया। इतने वर्षों में सूरज हांलाकि, चांदनी को भूला तो नहीं था, पर उसकी स्मृतियों के कारण परेशान भी नहीं होता था। लेकिन एक दिन जब वह मोटर सायकिल से अपने काम पर जा रहा था तो सूनसान मार्ग पर एक कार की दुर्घटना को देखकर उसे रूकना पड़ा। पास जाकर देखा तो कोई युवा लड़की कार के स्टयरिंग से सिर टिकाकर बेहोश पड़ी थी। कार की दुर्घटना का कारण क्या था? वह यह तो नहीं जान सका था, पर उसने लड़की का जब चेहरा देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। कार की दुर्घटना में घायल और बेहोश पड़ी लड़की कोई अन्य नहीं, वही चांदनी थी कि जिसकी यादों के सहारे उसने अपना जीवन काटने की सौगध्ं खा ली थी। चांदनी के सिर और हाथ की कलाई से खून बह रहा था। खून बहने का मुख्य कारण, उस लड़की के हाथ में पहनी हुई सोने की वह मोटी चूड़ी थी जो दुर्घटना के समय किसी प्रकार उसके शरीर में जा घुसी थी। सूरज ने किसी तरह से चांदनी को संभाला। उसके हाथ की सोने की चूड़ी को काटकर अलग किया और उस चूड़ी को अपनी पेंट की जेब में रख लिया। फिर किसी प्रकार से वह उसको शीघ्र ही अस्पताल ले गया। अस्पताल के आपात्कालीन कक्ष में उसने चांदनी को भरती कराया, और शीघ्र ही अपने काम पर चला गया। यह सोचकर कि वह दूसरे दिन जाकर चांदनी से मिल भी लेगा और उसकी सोने की चूड़ी भी वापस कर देगा। मगर जब वह काम पर गया तो उसे पता चला कि उसे आज ही दूसरे शहर अपने कार्यालय के काम से जाना होगा, क्योंकि उसके बॉस किसी इमरजेंसी के कारण नहीं जा सकते हैं। सूरज को जाना पड़ा। दूसरे दिन जब वह लौटकर आया तो उसने सोचा था कि कार्यालय में अपनी हाजिरी लगाकर, और बॉस से कहकर वह कुछ देर के लिये अस्पताल चला जायेगा और चांदनी को भी देख आयेगा। परन्तु जाने से पहले ही उसके बॉस केनन स्टीमर ने उसे अपने कार्यालय में बुलाया। उसे बैठाया, चाय मंगवाई और अपने सिर को पकड़ते हुये सूरज से बोले कि, ‘मिस्टर सूरज, पता नहीं क्यों मैं आप पर बहुत विश्वास करता हूं। आपको अपने ही परिवार का एक नेक इंसान समझने लगा हूं। इसीलिये आपको बताकर खुद को हल्का कर लेना चाहता हूं। कल एक बहुत ही विशेष घटना मेरे जीवन में हुई है। मैं जिस लड़की से विवाह करने जा रहा हूं, या यूं समझ लीजिये कि जिससे एक प्रकार से विवाह की बात पक्की हो चुकी है, वह कल अपनी कार की दुर्घटना में मरते-मरते बची है। वह तो कोई भला इंसान समय पर आ गया जिसने उसको समय पर अस्पताल पहुंचा दिया था, वरना तो मेरी मंगेतर की जान बचनी बहुत ही मुश्किल थी। मैंने इसी एक ख़ास काम से आपको बुलाया है कि, जिस भले और नेक इंसान ने मेरी होने वाली पत्नि की जान बचाई है, मैं उसको अपनी तरफ से पचास हजार रूपयों का विशेष इनाम देना चाहता हूं। आप जाकर मेरी मंगेतर की इस तस्वीर के साथ अखबार में विज्ञापन दे दीजिये, कि वह भला इंसान मेरी मंगेतर की सोने की दूसरी चूड़ी के साथ मुझसे या फिर मेरी मंगेतर से मिले।’ कहते हुये केनन स्टीमर ने सूरज को चांदनी की तस्वीर दिखाई तो सूरज के हाथों से रहे-बचे आस के तोते भी उड़ गये। किस्मत ने कितना बेहूदा मजाक उसके साथ किया था। वर्षों बाद चांदनी उसे वापस मिली भी तो इस अनोखे अंदाज में कि ना तो वह हंस सकता था और ना ही रो सकता था? मन ही मन अपने मुकद्दर की लकीरों को कोसता हुआ सूरज कार्यालय से उठ आया। साथ ही चांदनी से दुबारा मिलने की उसकी इच्छा भी अपने आप ही किसी कब्र पर पड़ी हुई मिट्टी के समान, बारिश पड़ते ही सदा के लिये दब गई। फिर एक तरफ सूरज अपने आप में ही जलने लगा, तो दूसरी तरफ चांदनी का दिल खुद-ब-खुद ही उस अनजान युवक के प्रति अपार श्रदधा से तो भरा ही, साथ ही उसकी अनजानी छवि भी उसके दिल में एक विशेष महत्वपूर्ण स्थान बनाकर सुरक्षित हो गई। होश में आने के पश्चात डाक्टरों ने उसे यह तो बता दिया था कि कोई लंबा, दुबला सा बेहद गंभीर युवक उसको बेहोशी की हालत में अस्पताल में छोड़ गया था और दूसरे दिन फिर से आने की बात भी कह गया था कि उसके हाथ की सोने की चूड़ी जो लगभग पच्चीस हजार रूपयों की कीमत की होगी, वह स्वंय ही उसको अपने हाथ से वापस करेगा। लेकिन वह युवक फिर कभी भी वापस नहीं आया था। उसके न आने का कारण क्या हो सकता था? चांदनी बहुत सोचने के बाद भी कुछ निर्णय नहीं ले सकी थी। यदि उस युवक को चूड़ी का कोई लालच आ गया हो, तौभी यह बात मानने योग्य नहीं थी। वह यदि चाहता तो उसके हाथ की दूसरी चूड़ी, गले की सोने की चेन, कीमती घड़ी और पर्स में से नगदी आदि सब कुछ ले सकता था। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया था। इसके साथ ही उसके मंगेतर ने उस युवक के लिये पचास हजार रूपयों का इनाम भी घोषित कर दिया था पर, इसके बाबजूद भी उस युवक ने कभी भी अपनी शक्ल तक नहीं दिखाई थी? चांदनी दिन-रात इसी तरह से सोचती रहती थी। सोचती थी और अपने आपको परेशान किये रहती थी। उसकी परेशानी का जो मुख्य कारण था कि अनजाने में ही एक अपरिचित और अनदेखा युवक उसके दिल के द्वार पर दस्तकें देने लगा था। वह कौन हो सकता है? कैसा भी कोई क्यों न हो, इतना सब कुछ होने के बाद, कोई भी क्यों न होता, कम से कम एक बार उससे मिलने तो आता ही? चांदनी के दिल की हसरत, उस अनजान युवक से मिलने और देखने की ख्वाइश, उसके दिल में ही खुदक-खुदक कर शांत हो गई। ना ही उसकी चूड़ी वापस आई और ना ही वह अनजान युवक उसको कभी भी देखने आ सका। इंतजार और उस युवक को एक बार देखने की ललक में चांदनी के दस महिने और समाप्त हो गये। उसके विवाह का समय आया तो सूरज के बॉस की तरफ से सूरज को भी निमंत्रण दिया गया। सूरज, जो अब तक चांदनी के बारे में सोच-सोच कर खुद ही जल कर ख़ाक हो चुका था, वह किसी से क्या कहता? किससे अपने दिल की दास्तां सुनाता फिरता? उसकी दशा तो उसके गले में अटके हुये मछली के उस कांटे के समान हो चुकी थी कि जिसे ना तो वह बाहर ही निकाल सकता था और ना ही निगल सकता था। एक तरफ उसका वह बॉस केनन स्टीमर था कि जिसके एहसानों की वह कभी भी नमकहरामी नहीं कर सकता था और दूसरी तरफ उसका वह प्यार था कि जिसकी सारी बाजियां जीतने के पश्चात भी उसको छूने का उसे अब कोई अधिकार नहीं था। सूरज डूबने के बाद रात आती है। रात में केवल चांदनी दिखाई देती है। वह चांदनी कि जिस पर सूरज का कोई भी अधिकार नहीं होता है। सूरज जानता था कि उसने चांदनी को फिर एक बार हमेशा के लिये खो दिया था। पहली बार अपनी कमज़ोरियों और कमियों के कारण और दूसरी बार फ़र्ज़ और कर्तव्य की वेदी पर स्वाहा होने के कारण? जीवन की पिछली घटनाओं को दोहराते हुये चांदनी की आंखें फिर से भर आईं। कितना बुरा उसके नसीब का हश्र हुआ है। अब किस मुंह से वह सूरज के सामने आ सकेगी? सूरज ने अपने एक ही पग में प्यार की सारी रस्में जीत लीं थीं, और एक वह है जो अभी तक कस्में-वादों के गुणा-भाग में उलझी रही थी। तभी चांदनी के पति केनन स्टीमर ने घर में कदम रखा और आते ही निराश मन से थका हुआ सा सोफे पर धंस गया। चांदनी ने अपने पति को देखा, उसका उतरा हुआ सा मुंह देखा, फिर फ्रिज से ठंडा पानी का गिलास देते हुये बोली, ‘आपकी तबियत तो ठीक है न?’ ‘हां, मैं बिल्कुल ठीक हूं। लेकिन मेरी एक बात समझ में नहीं आ सकी।’ ‘कौन सी बात?’ चांदनी ने आश्चर्य से पूछा तो उसके पति ने उसको बताया। वह बोला, ‘मेरा एकाऊटेंट सूरज ज्योति प्रकाश; पता नहीं उसको मुझसे क्या तकलीफ हुई कि वह अचानक से, मुझसे मिले बगैर ही, मेरी मेज पर अपना रेज़ीनेशन रख कर, अपनी नौकरी छोड़ कर चला गया है।’ ‘?’ चांदनी के सिर पर अचानक ही पहाड़ गिर पड़ा। वह कुछ भी नहीं बोली। फिर कहती भी क्या। वह जानती थी कि उसके सिर पर सदा चमकने वाला सूरज अब सदा के लिये डूब चुका है। वह सूरज जो अपनी मर्जी से, उसकी मर्जी के बगैर ही, उसके जीवन में रोशनी भरने की तमाम कोशिशें करता रहा था और जिसकी उसने कभी भी कोई कद्र नहीं की थी, जाते-जाते भी, डूबने से पहले ही उसके दिल में वह रश्मि छोड़ गया है कि जिसके प्रकाश में वह हमेशा उसका अक्श देखती रहेगी। मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

रिश्ते और दर्द का एहसास - Sad Story - Sad Stories

नाजुक - सी उम्र थी केवल पंद्रह बरस की, सांवली सलोनी राधा अपने माता-पिता की बहुत दुलारी बेटी थी, स्वभाव से बड़ी कोमल, ममतामयी और सेवा - भावना तो जैसे उसको जन्म के साथ ही मिली थी | माता-पिता के दिये संस्कार ने राधा को एक विशेष पहचान देने में जीवन भर साथ निभाया ,पढ़ाई-लिखाई तो उस जमाने मे आमतौर पर बड़ी कठिनाई से हुआ करती थी फिर भी राधा के सरकारी कर्मचारी पिता और घरेलू महिला माँ ने राधा के साथ - साथ अपने जान-पहचान वालों के बच्चों के लिए भी शिक्षा के प्रेरणा स्त्रोत के जैसे रहे हमेशा| राधा के घर के पास ही उसकी सभी सखी - सहेलियों के घर भी थे राधा तो सबकी दुलारी थी ,भोली भाली राधा को घरेलू काम-काज के साथ ही पढ़ने-लिखने का बेहद शौक था वैसे ज्यादातर शांत और चुपचाप रहकर अपना काम करने वाली राधा ख़ुशदिल भी बहुत थी लेकिन जब कभी उसे किसी बात पर गुस्सा आता तब बोलती तो कुछ नहीं बल्कि बाहर से नज़र न आने वाला उसका गुस्सा उसके शांत रहने की आदत की ओट में छिप जाया करता रहा था हाँ मगर उसके मन को बड़ी ठेस लगती और वह सिर्फ अपने-आप को दोष दिया करती थी| खैर भोलेपन में राधा की कई बातें ऐसी होती कि राधा के माता-पिता से अक्सर लोग कहा करते कि आपकी ये बिटिया एक दिन राजसी सुख में जिंदगी जियेगी , न जाने कितने ही लोगों के सम्मान का पात्र बनेगी और आगे समय के साथ लोगों की ये भविष्यवाणी सच भी साबित होती गयी थी| राधा का बचपन उसके बाबू जी की नौकरी के दौरान कई शहरों में बीता, सरकारी आवास में रहकर आस पास के बच्चों के साथ राधा को काफी अच्छा लगता था कि नई-नई जगहों पर नए-नए लोगों से मुलाकात हुआ करती रही थी, राधा की पढ़ाई की शुरुआत हुई ही थी कि गाँव मे राधा के पिता के भाइयों की किन्हीं अज्ञात व्यक्तियों के मार्फ़त किसी अज्ञात कारणों से हत्या कर दी गयी | अब राधा के दादा-दादी गांव के घर में अकेले डर के साये में अपने बेटों की हत्या के दुःख में घुटकर जीने को बेबस थे उन्होंने किसी तरह ये खबर राधा के पिताजी तक पहुंचाई ,अचानक हुई इस घटना का तार मिलते ही राधा के माता-पिता अवाक हो गए कि ये सब क्यों और कैसे हो गया, राधा के पिता बड़े ही निश्छल बिल्कुल संत जैसे गंभीर स्वभाव के इंसान थे अपने परिवार में अचानक हुई दुर्घटना से दोनों पति-पत्नी राधा और उसकी बड़ी बहन को लेकर गांव की ओर चल दिये | गाँव पहुंच कर राधा के माता-पिता ने वापस शहर को ओर लौटने की बजाय गाँव में ही रहकर बूढ़े माँ-बाप की देखभाल के फैसला किया और राधा के पिता ने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया | कुछ दिन बाद राधा और उसकी बड़ी बहन का दाखिला गांव से पांच किलोमीटर दूर के सरकारी स्कूल में करवा दिया गया जिसमें राधा अपनी दीदी और गाँव के बाकी वहाँ पढ़ने वाले बच्चों के साथ स्कूल जाने लगी | राधा का स्कूल उसके गांव से काफी दूर भी था और स्कूल तक जाने का रास्ता भी जंगलों-खेतों से होकर जाता था इसलिए धीरे-धीरे गाँव के कई बच्चों खासकर लड़कियों ने अपनी पढ़ाई बीच मे ही छोड़ दी लेकिन राधा अपनी धुन की पक्की थी उसकी दीदी ने भी पांचवीं कक्षा के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया मगर राधा ने कभी तो अकेले ही और कभी दूसरे गांव के कुछ बच्चों के साथ लगातार स्कूल जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करने का इरादा कर लिया था| राधा की पढ़ाई आठवीं कक्षा के बाद पूरी होने के साथ ही राधा की दीदी का ब्याह करने के बाद अब राधा के लिए भी दूल्हे की तलाश शुरू कर दी थी, कहते हैं न कि जो भाग्य में होता है वो भाग कर आता है ठीक ऐसा ही राधा के लिए सुयोग्यवर की तलाश में भी हुआ ,राधा के लिए भी सुंदर ,सुयोग्य वर की तलाश उसके माता-पिता को ज्यादा दिनों तक नहीं करनी पड़ी | राधा की मां ने राधा के लिए चुने गए दूल्हे के रूप-रंग और स्वभाव देख राधा के सुखद भविष्य की कल्पना कर डाली लेकिन दूल्हे के बड़े परिवार को देख थोड़ा - सा परेशान भी हुई कि बड़े परिवार में राधा को कोई दिक्कत न आये मगर राधा के पिता के समझाने पर राधा की माँ ने इस विवाह के लिए अपनी सहमति दे दी, अंततः राधा का विवाह विनोद के साथ सम्पन्न हो गया| राधा का पति विनोद बहुत सरल स्वभाव और सामाजिक व्यक्ति था उसे जब मालूम हुआ कि राधा को पढ़ने का बहुत शौक है तो उसने राधा की आगे की पढ़ाई खुद ही पूरी करवा कर राधा को सरकारी नौकरी भी दिलवा दी | राधा बहुत परिश्रमी थी परिवार, बच्चों की देखभाल के साथ-साथ अपनी नौकरी के बीच संतुलन हमेशा बनाये हुए रखती | बच्चे धीरे-धीरे बड़े होते गए अब जैसे राधा के बचपन में प्रायः उसके लिए की जाने वाली राजसुख के जीवन की भविष्यवाणी भी सच होती दिखने लगी थी| अब समय करीब आने लगा था कि अपने बच्चों के विवाह किए जाने की जिम्मेदारी भी राधा और उसके पति विनोद को पूरी करनी थी, एक ओर जहाँ राधा शांत स्वभाव की थी वहीं दूसरी ओर उसका पति विनोद मुखर स्वभाव का जल्दी क्रोधित होने के स्वभाव का था इसी वजह से विनोद की खूबियां कभी- कभी कहीं खोकर रह जाती थी लेकिन राधा का शांत स्वभाव सदैव विनोद की बहुत बड़ी ताकत बना रहा इसी तरह दोनों पति-पत्नीने साथ मिलकर अपने बच्चों में से चारों बेटियों और दोनों बेटों की शादी करके एक और जिम्मेदारी पूरी की| राधा और विनोद के बड़े बेटे राजन की पत्नी तो सभ्य और शालीन थी मगर उनके छोटे बेटे प्रकाश की पत्नी का स्वभाव बड़ी बहू के बहुत विपरीत था, पत्नी की आमतौर पर एक परिभाषा पति के लिए प्राणों से प्यारी भी कहा जाता है किंतु राधाकी छोटी बहू के लिए ये कहावत उल्टी थी वो अपने पति के प्राणों की प्यारी के बजाय प्राणों की प्यासी होती जा रही थी ,अभी तो राधा के छोटे बेटे प्रकाश के विवाह को एक साल भी पूरे नहीं हुए थे और प्रकाश के ससुराल वालों का तमाशा देखते ही बनता था, एक दिन राधा की छोटी बहू की माँ और बेटा यानी कि प्रकाश की सास और साला प्रकाश की पत्नी रजनी से मिलने आये उस समय घर में प्रकाश की बीवी और प्रकाश की माँ राधा ही घर पर थी, मेहमानों की आवाभगत के बाद जब वापस लौटने का वक़्त आया तब प्रकाश के साले ने प्रकाश की माँ से अपना दुखड़ा कहकर कुछ रुपयों की मांग की जिस पर कोमल हृदय राधा ने बिना कुछ सोचे समझे प्रकाश के साले को रुपये दे दिए और फिर प्रकाश की सास - साले दोनों अपने घर वापस लौट गए| रुपये मिलने के बाद से प्रकाश की पत्नी और उसके ससुराल वालों का रवैया पहले से कहीं और ज्यादा बिगड़ैल और मनमाना होता जा रहा था तब राधा ने सबसे छुपा कर छोटी बहू के भाई को रुपये दिए जाने की बात अपने बाकी के परिवार के लोगों को बताई सबने कहा कि अब तो रुपये वापस मिलने से रहे बल्कि प्रकाश की जिंदगी जो आये दिन नरक के समान होती जा रही है उसके बारे में हमें मिलकर कोई शान्तिपूर्ण उपाय खोजना होगा क्योंकि छोटी बहू और उसके मायके वालों के रवैये से प्रकाश ही नहीं हम सभी बहुत चिंतित हैं| विवाह होने के बाद से ही प्रकाश की पत्नी अपनी ससुराल में कम रहना पसंद करती थी और अपने मायके में ही ज्यादा रहती थी इससे प्रकाश और उसकी बीवी रजनी के बीच दूरी बढ़ती गयी जिससे प्रकाश अक्सर तनाव में रहने लगा था और अपने परिवार के साथ ही दोस्तों के बीच भी कम ही बातचीत करने लगा था, अपनी शादी को बरकरार रखने के लिए प्रकाश ने अपनी तरफ से कई समझौते किये मगर सबकी नजर में उसकी जोरू का गुलाम और कायर होने की छवि बनती जा रही थी लेकिन प्रकाश का सच यही था कि वो अपने ससुरालवालों और पत्नी के हाथों बेहद घुटनभरी और अपमानित जिंदगी जी रहा था| प्रकाश के माता-पिता, भाई-बहन और बाकी सभी लोग उसकी तकलीफ से बेखबर नहीं थे लेकिन वो सब भी केवल प्रकाश को समझा सकते थे, आख़िरकार प्रकाश ने अपनी घुटनभरी जिंदगी से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या करने की ठान ली मगर शायद होनी को कुछ और मंजूर रहा इसीलिए जिस रात प्रकाश आत्महत्या के इरादे से अपना सुसाइड नोट लिख अपनी माँ के सिरहाने रखकर घर से चुपचाप बाहर जाने लगा कि तभी थोड़ी देर बाद उसके पिता के सीने में भयानक दर्द उठा और वो मदद के लिए अपने बेटों को कातरस्वर में कराहते हुए पुकारने लगे , पिता की दर्दभरी कराह गेट के ताले को धीमी आवाज में खोलते हुए प्रकाश को जैसे ही सुनाई पड़ी उस समय प्रकाश को और कुछ नहीं सूझा वो उल्टे पैर भागता हुआ -"पापा जी क्या हुआ आपको?" चीखते हुए अपने पिता के पास जा पहुंचा इस तरह एक ही पल में मौत की आगोश में अपनी परेशानियों से ऊबकर हमेशा के लिए सो जाने का इरादा करने वाले प्रकाश की आँखों में अपना नहीं बल्कि ख़ुद के दुनिया से ऐसे आत्महत्या करके अचानक चले जाने के बाद अपने माँ-बाप की तकलीफ का एहसास का आँसू बनकर बह रहा था, उसी समय मोबाइल से सूचना पाकर डॉक्टर साहब ने आकर प्रकाश के पिता को कुछ दवाएं देकर आराम करने के लिएकहा | मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

पापा आप कहाँ चले गए कहानी - Real Stories - Real Story

त्यौहारों की ख़ुशी सबसे ज़्यादा बच्चो में होती हैं,या यूँ कहे बच्चो की वजह से ही त्यौहार अच्छे लगते हैं,दोनों शब्द अलग हैं और थोड़े बहुत मायने भी लेकिन सच तो यह हैं कि बच्चे ही त्यौहारों के रौनक होते हैं| जग्गू जो एक,तीन साल का लड़का हैं जिसका पूरा नाम जगदीश हैं, उसके बाबा ई-रिक्शा चलाता हैं और साथ में सब्जी मंडी में अपना रेड़ी लगाता हैं,नाम हैं मोहन,मोहन के लिए जग्गू उसकी ज़िन्दगी है वो उसे अपने से बेहतर ज़िन्दगी देना चाहता हैं,उसी के लिए तो मोहन अपना दो-दो बिज़नेस चला रहा था,मोहन ने उसके पढ़ने के लिए उसका दाखिला प्राइवेट स्कूल में करवाया था, यूँ तो जग्गू स्कूल जाने के टाइम हमेशा तंग करता था कि"स्कूल नहीं जाऊंगा" लेकिन जब उसके बाबा उसे अपने ई-रिक्शा में छोड़ने जाते तो वो ख़ुशी-ख़ुशी चला जाता लेकिन स्कूल में जाकर खूब रोता था,जग्गू कि माँ गीता जो अपने पति के बिज़नेस की आधी मालकिन थी ,वो जग्गू के साथ कुछ दिन स्कूल में जाकर बैठती थी तब जाके उसने स्कूल में बैठना सीखा,धीरे-धीरे उसके एकात दोस्त बने वो उसके साथ रहकर स्कूल में रोना भी भूल गया । कल दिवाली हैं,मोहन के लिए बहुत बड़ी ख़ुशी हैं क्यूंकि उसे पूरा दिन मिलेगा अपने जिगर के टुकड़े के साथ बिताने के लिए,उसने अभी से ठान लिया था के त्यौहार वाले दिन वो घर से कही नहीं जायेगा,उस दिन तो जग्गू की भी छुट्टी होती हैं वो उसी के साथ पूरा दिन बिताएगा,वैसे तो जग्गू की संडे को भी छुट्टी रहती थी लेकिन उस दिन भी उसके बाबा सब्जी बेचने मंडी जाता था और जब वो थक कर दस-ग्यारह बजे घर आता तो तब तक तो जग्गू सो चुका होता,मोहन सही से अपने बेटे को लाड भी नहीं कर पाता और पूरा दिन निकल जाता था, फिर भी सोते हुए भी वो उसके गालो पर हाथ फेरता और चुम्बन लेकर ही सोता था,सुबह आठ बजे मोहन अपने ई-रिक्शा से जग्गू को स्कूल छोड़ कर ही अपने काम पर जाता था और जब चार बजे वापस आता तब उसके बाद मंडी में सब्जी बेचने जाता था,गीता भी कुछ घंटे उसका हाथ बटा आती थी लेकिन जब से जग्गू पैदा हुआ तो मोहन ने उसे उसकी ड्यूटी करने के लिए छोड़ दिया था,मोहन जग्गू को अपने काम से दूर रखता था ताकि उसे उसके कामो का साया भी न पड़ सके,वो अपने बेटे को अफसर बनना देखना चाहता था,दो दिन पहले ही एक दूकान वाले ने उसकी रेड़ी पलट दी थी,उसने थोड़ी देर के लिए उस दूकान के पास खड़ा कर रखा था बस इसी लिए,"बहुत धांधली करते हैं यह अमीर ज़ादे,थोड़े से पैसे क्या हो गए,गरीबो की रोज़ी-रोटी पर लात मारने चलें हैं,अरे हाय लगेगी इनको हम जैसे लोगो की" 'छोड़ न गीता तू क्यूँ अपना खून जला रही हैं वो ऊपर वाला सब देखता हैं और इन जानवरो का हिसाब वही करेगा'यह कह कर मोहन ने अपनी बीवी को चुप कराया था,घर में तो मोहन अपने बेटे के लिए प्रिन्स था लेकिन बाहर की दुनिया उसको कौड़ी भर भी इज़्ज़त नहीं देती थी और कभी-कभी तो उसे ज़लील भी कर देती थी,अब तो आदत हो गयी थी ऐसे जलील होने की,खैर जब वो अपने बेटे के साथ होता तब सब कुछ भूल कर एक प्रिन्स की तरह अपने छोटे प्रिन्स पर हुकूमत चलाता था | कल ही दिवाली हैं अभी तक जग्गू और उसकी माई के लिए नए कपड़े नहीं लिए ,जाऊंगा ना तो फिर जग्गू मुझे याद दिलाएगा,ऐसा करता हूँ आज थोड़ा लेट मंडी चला जाऊंगा पहले बाजार से कपड़े और त्यौहारों की चीज़े ले लेता हूँ,यह सोचते हुए मोहन ने अपने रिक्शे को बाजार की तरफ मोड़ा,उसके मन में ख्याल आया पहले गीता को बता दूँ फिर सोचा सामान ले जाकर उसे सरप्राइज दे दूंगा,एक बार जब वो देखेंगी तो खुश हो जाएगी,हल्की मुस्कराहट के साथ रिक्शा एक तरफ लगा कर मोहन बाजार से सामान खरीदने लगा | सामान खरीदते-खरीदते ही आठ बज गए ,"गीता तो परेशान हो रही होगी,आज तो डांट खाना पक्का हैं, यह सोच ही रहा था के बाहर दरवाज़े पर खेल रहा जग्गू मिल गया,पापा-पापा कह कर उसके हाथ को पकड़ लिया,जग्गू ने बताया कि उसकी माई पूजा का सामान लेने गयी हैं,मोहन को थोड़ी शांति मिली,नहीं तो उसे आज गीता से बहुत डांट पड़ती ..... मोहन ने सारा सामान ले जाकर कमरे में रख दिया, अहा "क्या खुशबू हैं ।” जग्गू बोल पड़ा "पापा मम्मी ने आलू मतल बनाया हैं" जग्गू कि यह हकलाहट भरी आवाज़ उसके दिन भर कि सारी थकान दूर कर चुकी थी,वो एक पलेट चावल और सब्जी निकाल कर खुद भी खाने लगा और जग्गू को साथ बिठा कर उसे भी खिलाने लगा,जग्गू अपने नए कपड़े देख कर खिल उठा था,यूँ तो उसका किराये का घर तीसरे मंजिल पर था लेकिन जग्गू को एक मिनट भी नहीं लगा निचे उतरने में,जाकर अपने गली के दोस्तों को बता आया कि उसके भी नए कपड़े आ गए हैं और तो और वो अपने दोस्तों को ऊपर लेकर भी आ गया अपने कपड़े दिखाने के लिए,मोहन अपने बेटे को खुश देख कर अंदर तक खुश हो उठा,थोड़ी देर बाद गीता भी आ गयी उसके आने के बाद मोहन अपनी रेड़ी निकाल कर वापस अपने काम पर चला गया, मंडी से वापस आते समय बारह बज गए थे,त्यौहारों के सीजन में मंडियों में बहुत भीड़ रहती हैं इसलिए वो कुछ दिनों से घर लेट ही आ रहा था, अरे यह क्या जग्गू अभी तक सोया नहीं,यह कहते हुए वो अपने हाथो का थैला जिसमे कल की पूजा के लिए प्रशाद था गीता की तरफ बढ़ाता हैं । "अले पापा कल तुट्टी हैं एतत्कुल की,दिवाली हैं न इत् लिए" मोहन उसे गोद में उठा कर प्यार से पुचकारने लगा,गीता ने पहले ही उसे बता दिया की कल बहुत सारे मेहमान आने वाले हैं,और कल तो घर में एक रत्ती भी जगह नहीं रहेगी,दोनों बाप बेटे को ज़्यादा दिक्कत हो तो छत्त पर चले जाना,मोहन अपने बेटे के साथ खेलने में मशरूफ था,वो गीता की बातों पर ध्यान नहीं दे रहा था,जग्गू पूछता हैं'पापा आप मेले लिए पटाके नहीं लाये,कल मैं बहुत छाले पटाके फ़ोलूगा" मोहन उससे कहता हैं कि कल वो उसे बहुत सारे पठाखे दिलाएगा,खाना खाने के बाद मोहन अपने बेटे को अपने बगल में लिटा कर दिन-भर की पूरी खबर सुनने लगा,उसकी हकलाती हुई आवाज़ को सुनते-सुनते कब नींद आ गयी कुछ पता भी नहीं चला,कल सुबह जाके उसकी आँखे खुली,देखा तो गीता कमरे की सफाई कर रही थी,उस समय बगल के किरायेदारों के घरो से भी कभी बर्तन तो कभी झाड़ू लगाने कि आवाजे आ रही थी,मोहन उठा तो साथ में जग्गू भी उठा,दोनों उठ कर एक साथ मुँह धोने गए,मुँह धोकर आया तो गीता ने दोनों को नाश्ता दिया,नाश्ता करने के बाद मोहन जग्गू को पठाखे दिलाने ले गया तब तक गीता बेड का चादर बदल कर घर को अच्छे से सजाने लगी,दोपहर से ही मेहमान आने शुरू हो गए थे,गीता अकेले ही सब की खातिरदारी कर रही थी,मोहन उनके बीच बैठ कर उनसे बातें करने में व्यस्त था,जग्गू तो पड़ोस के बच्चो के साथ खेलने में बिजी था,कभी घर में तो कभी बाहर ऐसे ही उसने आवा-जाही लगा रखी थी ,गीता की बहन सुनीता भी आयी थी जो एक दिन उसके यहाँ ठहरे भी वाली थी,वो ही थोड़ी बहुत उसकी मदद कर रही थी,शाम चार बजे के करीब उस घर का मकान मालिक सभी किरायेदार के लिए एक-एक मिठाई का डब्बा भिजवाता हैं,वो उस डब्बे को जग्गू को दे देता हैं,जग्गू निचे से ऊपर लेकर आता हैं,उस समय गीता पूजा की तैयारी कर रही थी,साढ़े सात बजे का ही टाइम था,मेहमानों से बातें करते-करते समय कैसे बीत रहा था कुछ पता भी नहीं चल रहा था,पूजा के समय मोहन के भी एकात दोस्त आ गए थे और पूजा ख़त्म होने बाद सब पटाखे फोड़ने के लिए बाहर गली में चले गए,गीता अपने पड़ोस के घरो में मिठाई बाटने चली गयी,जग्गू के ज़िद करने पर मोहन उसे लेकर छत्त पर चला गया,गली में से पहले से ही पठाखे फूटने के शोर आ रहे थे,पूरा शहर रौशनी में जगमगा रहा था,हर तरफ चहल पहल थी,ऊपर का छत्त काफी बड़ा था,पड़ोस के और भी बच्चे अपने पठाखे छत पर फोड़ रहे थे,एक तरफ मोहन भी अपने बेटे के साथ पटाखे फोड़ने में व्यस्त था,लेकिन एका-एक पूरी गली में मातम का माहौल बन गया,गली के लोगो में जैसे हाहाकार मचा हुआ था,त्यौहार के दिन यह कैसा अनर्थ हो गया,देखा तो मोहन चौथे मंजिल से निचे गिर कर तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहा था,जो बच्चे छत्त पर पटाखे फोड़ रहे थे वो सब निचे आ गए,किसी को यकीन नहीं हो रहा था के अचानक से यह क्या हो गया,अच्छा-खासा दोनों छत्त पर पटाखे फोड़ रहे थे लेकिन मोहन चौथे मंजिल से निचे कैसे गिर गया,और जग्गू कहाँ हैं,उन बच्चो ने जब जग्गू को ढूंढा तो पता चला अभी-अभी जग्गू को सामने वाले घर से एक लड़का खून से लतपत् हॉस्पिटल ले गया,गली में लग रहा था जैसे मानो एक पतली सी खून की नदिया बह रही हो,मोहन वही पर तड़प-तड़प कर अपना दम तोड़ चुका था, गली में भीड़ देख कर गीता की बहन भी निचे आ गयी,देखा तो जैसे उसके होश ही उड़ गए,जाकर मोहन को उठाने लगी,मोहन का सिर फट चूका था,गली के आस-पास के लोग भी आ गए और उसे घेर कर खड़े हो गए,किसी ने उसके पास जाने की कोशिश नहीं की,उधर सामने से गीता भी प्रशाद बाँट कर वापस आ रही थी,अपने घर के बाहर लोगो का भीड़ देख क़र गीता भी उस भीड़ के अंदर गयी,जब उसने देखा तो जैसे उसके पैरो तले ज़मीन ही खिसक गयी,जाकर रोते हुए अपने पति को झिंझोर कर जगाने लगी,उस समय मोहन को देख कर गीता पर जो बीत रहा था वो तो सिर्फ वही समझ सकती थी,वो गली में बह रहे खून को जाकर समेटने लगी,उसकी हालत ऐसी लग रही थी जैसे वो सारा खून इकक्ठा कर दुबारा अपने पति को ज़िंदा कर लेगी,उतने में गीता का बहनोई और उसके दोस्त मोहन को उठा कर रिक्शे में लाद कर ले जाने लगे,मोहन गिरने के कुछ देर बाद ही मर चुका था,लेकिन वो लोग समझ नहीं पा रहे थे की क्या करे,गीता का रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था,वो उस खून को अपने हाथो से उठा कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रही थी,सब को लगने लगा शायद गीता इस सदमे से पागल हो गयी हैं,वो फिर रोते हुए अपने बेटे को ढूंढने लगी,ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाने लगी,पास खड़ी भीड़ में से ही एक ने कहा के वो पास के हॉस्पिटल में हैं,गीता का पूरा शरीर खून से लतपत था वो उठ कर हॉस्पिटल की तरफ भागने लगी,सुनीता भी उसके पीछे-पीछे दौड़ कर उसे सँभालने के लिए जा रही थी। थोड़ी देर बाद पुलिस आयी,पुरे जगह को घेर लिया,सभी के बीच एक दहशत का माहौल बना हुआ था,किसी को यह समझ नहीं आ रहा था के मोहन जैसा आदमी सुसाइड तो नहीं कर सकता फिर वो इतने ऊपर से निचे कैसे गिरा और तो और जग्गू को सामने वाले घर का लड़का हॉस्पिटल लेकर क्यूँ गया,वो तो अपने छत्त पर पटाखे फोड़ रहा था तो फिर उसके घर कैसे पंहुचा आखिर छत्त पर ऐसा क्या हुआ था?? इस भरे पर्व में क्या हो गया,आसपास के लोगो ने भी पटाखे फोड़ने बंद कर दिए थे,पुलिस ने उन बच्चो को अपने पास बुलाया जो छत्त पर मोहन और जग्गू के साथ फटाखे फोड़ रहे थे,वो सारे बच्चे मोहन की लाश को देख कर डरे हुए थे,उन्होंने उन बच्चो को समझा-बहलाकर पूछा,उन बच्चो ने पुलिस को बताया " मोहन अंकल उनके साथ ही छत्त पर पटाखे फोड़ रहे थे,जिस तरफ छत्त की दीवार छोटी थी वो उसी तरफ जग्गू को गोद में लेकर खड़े थे,जब अनार बम जला तो जैसे ही वो पीछे हुए उनका पैर फिसल गया और वो जग्गू के साथ ही उस दीवार पर गिरे,जग्गू उनके हाथ से छूट कर निचे गिर गया,मोहन अंकल उसको पकड़ने के लिए वो भी निचे कूद गये,उन्होंने जग्गू को सामने वाले छत पर फेंक दिया और खुद निचे गिर गए,जग्गू सामने वाले घर के बालकनी में गिर गया ,तभी वो सब लोग भी निचे आ गए । जग्गू का घर मेरे घर से ज़्यादा दूर नहीं था,मैं उसे अक्सर बाहर खेलते हुए देखती थी,उस समय मैं अपने रिश्तेदार के यहाँ से वापस आ रही थी,लोगो ने पूरा रास्ता जाम कर रखा था,यह देखने के लिए कि आखिर हमारे गली में भीड़ क्यूँ लगी है,मैं भी उन लोगो के भीड़ में गयी,देखा तो गली में काफी दूर तक खून फैला हुआ था,जहाँ पूरा देश खुशियों की रौशनी में झूम रहा था वही किसी के घर की रौशनी हमेशा के लिए चली गयी,गीता का पति तो मर चूका था लेकिन बेटा हॉस्पिटल में ज़िन्दगी और मौत से लड़ रहा था,मेरे पड़ोस की आंटी गीता को अच्छे से जानती थी वो अक्सर उससे सब्जिया खरीदती थी,जब उसने सुना तो वो उसी वक्त उससे मिलने चली गयी, तब गीता की बहन उसे घर लेकर आ चुकी थी,गीता ने रो-रो कर अपना बुरा हाल कर लिया था,उस समय उस पर क्या बीत रही होगी वो एक माँ और पत्नी ही समझ सकती हैं,बेचारी गीता जहाँ कुछ देर पहले लोगो को घूम-घूम कर प्रशाद बाँट रही थी,अभी वही लोग उसे चुप कराने में जुटे हुए थे | मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

//

© 2019 HP Video Status. All Rights Reserved | Developed by  Stepup Technosys