नाम याद नहीं मुझे - love story - love stories

नाम

क्लास, सातवीं से आठवीं हो गई तब महसूस किया कि कुछ बदल रहा है। कपड़ों में सलवार दुपट्टे की गिनती बढ़ी। मम्मी पहले से ज्यादा चौकन्नी हो गयीं। थोड़ी दुपट्टे को लेकर मैं भी सतर्क हुई। स्कूल जाने के लिए सहेलियों का एक ग्रुप साथ हो गया। लड़कों का कोई झुण्ड देखते ही सिर झुक जाना, चिड़ियों की तरह चहचहाहट को बीच में ही रोककर..कदमों का तेंज हो जाना..खुदबखुद आ गया.. ऐसा नहीं कि कुछ बदल गई थी मैं! बिल्कुल वैसे ही तो थी.... स्कैच पैन से साड़ी का किनारा बनाना, लूडो के खेल में देर तक पासे को डिबिया में हिलाकर लूडो पर फेंकना, कि अबकी छह आ जाये.. कई चांस तक छह न खुलने पर आँख भर आना। गिट्टियां, किटकिट, कबड्डी खेलते वक्त दुपट्टे को कमर में बांध लेना। एक-दो चक्कर पापा की साईकिल चलाने की जिद करना। स्कूल से लौटकर चावल फ्राई बनाकर खाना, चुपके से मिठाई गटक जाना, पूछने पर साफ मुकर जाना। जन्माष्टमी में लकड़ी के बुरादे को ढ़ेर सारे रंगो से रंगकर, जन्माष्टमी सजाना, दीपावली में मिट्टी का घर बनाकर फिर उसे मिट्टी से लीपना, उस पर रंग चढ़ाना, मम्मी के हाथों जूं निकलवाना सब वैसे ही तो था। बस इतना बदल गया कि महीने में दो तीन दिन मम्मी के एक इशारे पर पापा मुझसे यह नहीं पूछने आते कि आज मैं स्कूल क्यों नहीं जा रही। रोज चमचमाते जूती के साथ स्कूल जाने और गंदे जूते लेकर लौटने के बीच उधम चौकड़ी और शैतानियों की, रोज एक गुल्लक भरती थी मैं। स्कूल से घर तक इमली की चटनी का स्वाद रास्ते पर चटखारे दिलाता रहता। बिस्कुट को कुतर पर खाना। कदमों को गिनकर स्कूल से घर पहुंचना...स्कूल से तितली पेंसिल बाक्स में छिपाकर घर तक ले आना.. कुछ भी तो न भूली ... स्कूल आठवीं तक का ही था वो भी को-एजुकेशन। क्लास में लड़की-लड़को की डेस्क, अलग लगती थी। बायें हाथ लड़कियों की डेस्क और दायीं हाथ लड़कों की। दोनों डेस्क के बीच मास्टर साहब के गुजरने की एक पतली सी गैलरी नुमा जगह। जहाँ से वह दोनों तरफ मुआइना करते रहते। मास्टर साहब के हाथ और संंटी, दोनों की कुल लम्बाई से बाहर कोई भी स्टूडेंट्स नहीं थे। उस पतली सी जगह में कॉपी-कलम, ब्लेड, चूरन, इमली देने लेने में हाथों का इधर से उधर जाना-आना आम बात थी. क्लास में हर किस्म के लड़के-लड़कियां..अपने खूबी, शैतानियों और बद्तमीजी से जाने जाते थे। किसी ने किसी लड़की की इमली चुरा ली.. घंटों झगड़ा हुआ। किसी ने किसी की चुगली कर दी। किसी ने 'मोटी' बोल दिया, किसी ने 'काली'। पिछले डेस्क पर बैठा लड़का पान के पत्ते के भीतर किसी का नाम लिख दिया, सर से शिकायत हुई। सर ने आसमान सिर पर ले लिया। पूरी क्लास को चेतावनी दी गई। उन सब के बीच लड़की का पूरा दिन रोना...दो दिन स्कूल न आना फिर गुमसुम रहना.... इन सब के बीच, रोज सातों घंटी समाप्त.. और हम थके हारे घर लौट आये। मेरी सीट, दूसरे कतार पर पतली गैलरी की तरफ थी। पहली घंटी क्लास टीचर की थी। हाजिरी के बाद सर ने दो सवाल समझाकर पांच सवाल ब्लैकबोर्ड पर लिखे। पूरी क्लास शान्त थी.. जो भी आवाज़ चल रही थी वो गणित और मस्तिष्क के बीच। क्लास में टहलते वक्त सर जी की निगाह मेरी कॉपी पर टिक गई.. जहाँ मैंने एक आसान से गुणा में चूक कर दी थी..सर ने मेरी कॉपी उठाई और गुस्से से मेरे कान खींच कर मेरा सिर घुमाने लगे। कान की कील और बेइज्जती के बीच मेरे आंख में पानी भर आया। हाँलाकि सर जी मेरी इस भावना और संवेदना से अनभिज्ञ दिखे। तभी मेरे बराबर के डेस्क से 'अभिनव' ने अचानक से उठकर सर की कलाई जोर से पकड़ ली। अचानक ऐसी घटना से सर सहित पूरा क्लास स्तब्ध हो गया! सर ने अपनी बेज्जती और अभिनव की जुर्रत और जो भी कुछ उनके मन में आया हो. मुझे छोड़कर तेज़ी से डंडे की तरफ लपके और अभिनव के शरीर पर तेज़ी के साथ डंडे बरसाने लगे। सर गुस्से से हाँफ रहें थे और उतना ही चीख भी..अभिनव बिल्कुल पत्थर की तरह पैर जमाकर खड़ा था। वह अपने दोनों हाथ डेस्क पर मजबूती से टिका कर ऐसा खड़ा था मानों गुरूजी को चुनौती दे रहा हो। मैं थरथर-थरथर काँप रही थी. मेरे पैर के पंजे की सब उंगलियां जूती में सिकुड़ कर तले को दबाने लगीं। क्लास में किसी की हिम्मत न हुई जो अभिनव के लिए खड़ा हो सके। डंडा अभिनव के शरीर पर टूट गया लेकिन अभिनव रत्ती भर भी नहीं। डंडा टूटते ही गुरुजी टूटे..एक झटके में रजिस्टर लेकर काँपते हुए क्लास से बाहर निकल गये। गुरुजी के क्लास छोड़ने के बाद कुछ देर तक पूरी क्लास वैसी ही बैठी रही केवल अभिनव स्टैच्यू की तरह खड़ा था। उसकी निगाह अपने डेस्क पर गड़ी थी कि अचानक उसके पलकों से फिसल कर चमकती हुई पानी की दो बूंदे डेस्क पर गिरी। डेस्क की शुष्क लकड़ियों ने तो उसे अपने भीतर जगह न दी लेकिन मेरे भीतर उन दो बूंदों ने गहरे तक डुबकी लगाई। लगातार तीन दिन अभिनव की जगह खाली रही। चौथे दिन अभिनव अन्तिम डेस्क पर दिखा। ऐसा भी नहीं था कि उससे किसी ने सीट बदलने के लिए कहा हो लेकिन पता नहीं उसने ऐसा क्यों किया..अभिनव पहले से भी पढ़ने वाला शान्त और गंभीर स्टूडेन्ट था लेकिन उस घटना ने उसे और भी अकेला और गंभीर बना दिया। मुझे जहाँ तक याद है घटना के बाद गुरूजी ने न तो किसी बच्चे डांटा और न ही हाथ में डंडा उठाया। अभिनव की कॉपी पर कोई दस्तख़त उस दिन के बाद दर्ज न हुई। उसने पूरी क्लास से एक दूरी बनाई जिसमें मैं भी शामिल थी...शायद उसकी इस गलतफहमी में भी.. उस दिन, स्कूल से लेकर घर तक मैं एक अदृश्य पिंजरे में बंद सी रही। जो भी कुछ खाया पिया वो सिर्फ इसलिए कि न खाने की वजह बतानी पड़ती.. खाया तो लेकिन स्वाद एक बार भी जुबान पर दस्तक देने न पहुंची। रोशनी कचोट रही थी, अंधेरा डरावना सा लग रहा था। रोशनी और खुली आंखों के बीच कम्बल नें एक पर्दा गिराया जिसमें ढ़ेर सारे ख्वाब टकराये। मैंने खुद से न जाने कितने सवाल किये...कितनों के जबाब खुद ही दिये.. 'ऐसा नहीं करना चाहिए था अभिनव को. क्या जरूरत थी सर की कलाई पकड़ने की ? ऐसा भी नहीं था कि सर मुझे बेरहमी से पीट रहे थे. लेकिन अभिनव जैसा गंभीर लड़के ने ऐसा किया तो जरूर मैं उसके भीतर शामिल हूँ.. वरना वो ऐसा क्यों करता भला! सर को भी इतनी बेरहमी से नहीं पीटना चाहिए था.. लग ही नहीं रहा था कि कोई टीचर अपने स्टूडेन्ट को मार रहा है.. सर तो ऐसा पीट रहे थे मानों रंजिश या प्रतिशोध की भावना थी... 'अभिनव' यदि सर से माफी मांग लेता तो शायद उसे इतना न मारते लेकिन वो तो जैसे उन्हें खड़ा होकर ललकार रहा था। मुझे भी कुछ हिम्मत करनी चाहिए थी. क्यों नहीं मैंने ही सर के पैर पकड़ लिये..पैर पकड़ लेती तो जरूर माफ कर देते...लेकिन यह भी तो होता कि सब लड़के-लड़कियाँ इल्ज़ाम लगाने लगते। क्या होता यदि वो इल्ज़ाम लगाते! अब भी तो इल्ज़ाम लगेगा. अभिनव ने जो किया हर बच्चे के मन में एक दूसरी तश्वीर उतरी। फिर भी मुझे अभिनव की तरफ से माफ़ी मांगनी चाहिए थी' ऐसे उधेड़बुन और सवाल जबाब में न जाने कितनी रातें गुजर गयीं.. अर्धवार्षिकी परीक्षा में अभिनव एक मात्र लड़का था जिसे गणित में सौ फीसदी अंक मिले। गुरुजी को मालूम था कि अभिनव क्लास का सबसे होनहार है शायद यही विश्वास गुरूजी के क्रोध को सातवें आसमान में ले गया हो। आठवीं पास होने तक मेरे अन्दर कुछ ऐसा घटने लगा था जिसकी आवाज़ बाहर आने में मेरे भीतर डर होने लगा था। अभिनव गंभीर लड़का था उसने पूरे सत्र कभी ऐसा नहीं देखा कि मुझे किसी के सामने शर्मिंदा होना पड़े। उसकी निगाह में, मैं रहती थी यह सच था और मेरी खोज में अभिनव...यह भी झूठ नहीं.. पापा बैंक मैनेजर थे। ट्रांसफर होना आम बात थी..उसी वर्ष पापा का ट्रांसफर हो गया। पापा के ट्रांसफर के बाद शहर बदल गया.. नये शहर में बहुत कुछ नया दिखा। पुराने शहर में बहुत कुछ पुराना छोड़ आयी...कुछ चुपके से बटोर लाई। अभिनव से कभी मेरी एक भी शब्द बात न थी कि उस पर कुछ हक जता पाती. यह भी न बता पायी कि मैं शहर छोड़कर जा रहीं हूँ.. यह भी नहीं पूछ पायी कि तुम कहां रहते हो ? इतना भी कह लेती कि तुम्हारे शरीर पर सर की संटियों के निशान तुम्हारे शरीर के ऊपर लगे थे..लेकिन उसके गहरे निशान मेरे भीतर से अब तक न मिटे। नये शहर में, नौंवी में इस बार गर्ल्स कॉलेज में एडमिशन हुआ। मेरी रुचि साइंस में थी सो साइंस ग्रुप चुन लिया। फिजिक्स, कमेस्ट्री, बायोलॉजी के बीच इतना वक्त नहीं बचता कि कुछ याद किया जाये लेकिन सब भूल भी जाये यह भी मुमकिन न था। अभिनव से इतना जरूर हासिल किया कि किशोर भावनांए मुझे अपने संग न तो बहका पायीं और न मुझे रंग सकीं। मेरे लिए पढ़ने के अलावा कुछ और था ही नहीं। सिर्फ एक ही लक्ष्य था डाक्टर बनना.. इन्टरमीडिएट 81% पाकर घर में एक विश्वास कायम कर पायी। पापा ने मेडिकल कोचिंग में मेरा दाखिला करा दिया.. कोचिंग के बाद सिर्फ नोट्स, बुक.. क्वेश्चन पेपर.. कुछ आधी-अधूरी यादों के बीच एक वर्ष गुजर गया। मेडिकल के परिणाम आने पर पापा देर तक रोये थे। अखबार में नाम निकला.. जिंदगी बदल गई.. एक ही दिन में डाक्टर साहिबा बन गई। मेडिकल कालेज में फर्स्ट ईयर की स्टूडेन्ट.. कालेज में ही हास्टल था सो पूरा दिन कालेज कैम्पस में ही गुजरने लगा। नया माहौल, नई दोस्त, के बीच मेडिकल कॉलेज का बड़ा सा कैम्पस... बिल्कुल नई सी दुनिया हो गई थी मेरी.. एक दिन क्लास करके छत के सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी कि अचानक मेरी निगाह सफेद एप्रिन पहने एक मेडिकल स्टूडेन्ट पर गई.. जो नीचे से ऊपर की तरफ़ तेज़ी से जा रहे थे अचानक मेरे भीतर जैसे बिजली कौंध गई हो.. मेरे मुंह से चीख की तरह आवाज़ निकल पड़ी.. "अभिनव" ( हांलाकि मैं उस वक्त मैं भूल गई कि वो मेरे सीनीयर थे) मेरी आवाज़ सुनकर, सीनियर स्टूडेन्ट सीढ़ियों से वापस उतरने लगे। मैं बरामदे की दीवार पर टेक लगा कर खड़ी थी.. शरीर शक्तिहीन सा लग रहा था। सीनियर स्टूडैंट मेरे पास आकर रुके और बोले- "Yes" मैं बिल्कुल डरी आवाज़ में सिर्फ इतना बोल पायी.. "आप अभिनव हैं न?" जी... आई मैं अभिनव एंड यू ? "क्या आप मुझे पहचान नहीं पा रहे?" मैने सकुचाते हुए कहा सीनीयर ने बड़ी बेबाकी से कहा- "नो" ऐसे रूखे उत्तर की बिल्कुल भी आशा न थी मुझे.. मैं बिल्कुल रूआँसी हो गई.. शर्म से मेरी नजर नीची हो गई। "वैसे मुझे आपका नाम तो याद नहीं लेकिन आपका नाम अंग्रेज़ी अल्फाबेट के इस लेटर से शुरु होता है न?" मैंने शर्म का पर्दा हटाकर नजर उठाई तो देखा, सीनीयर अपने बायें आस्तीन का बटन खोलकर बाजू तक आस्तीन चढ़ाये हुए थे.. बाजू पर गहरे से अंग्रेज़ी में टी (T) का निशान बना था। इसी लेटर से ही न शुरू होता है न आपका नाम... उन्होंने बात दुहराई.. मैं अब सिसकियों से थी.. आँखों पर पानी की मोटी परत. बोलने पर गला कांटे की तरह चुभ रहा था. सिर्फ अपनी उंगलियां उस T पर दौड़ा पायी...उस वक्त ऐसा लगा कि पूरा छह वर्ष घूम लिया हो मैंने। सीनियर की आंखें नम थी . उन्होंने भर्राए गले सिर्फ इतना ही कहा.. छह साल में बहुत सी क्लास बदली, किताब बदली लेकिन अल्फाबेट का यह लेटर आज तक रटता रहा हूँ मैं.. मेरी धड़कने अब सामान्य न थीं। चेहरा सुर्ख हो चला था.. मुट्ठियाँ के बीच पसीनों ने मेरी घबराहट को मुझ तक सूचित किया.... छह साल के दरम्यान बातें तो बहुत उमड़ी लेकिन मैं सिर्फ इतना पूछ पायी... "मैं तो डरपोक थी लेकिन तुम तो हिम्मती थे अभिनव! तुमने सर की कलाई तक पकड़ ली थी लेकिन क्या तुम एक बार मुझसे बोल नहीं सकते थे... 'क्यों! बोला नहीं था मैंने? मेरे शरीर पर संटियाँ, बेतहाशा गिरी लेकिन क्या मैंने एक बार भी जुबान खोली ? जब मेरी चुप्पियाँ चीख चीखकर तुम तक न पहुंच पायीं तो फिर किस हिम्मत से तुम तक.." और फिर मेरी हथेली खुदबखुद अभिनव के मुंह पर चली गई.. अब हम दोनों के पास शब्द खत्म होे चुके थे. बस आंसुओं ने जो कहा सुना हो.. जिन्दगी अब बहुत व्यस्त हो चली है..परिवार, नौकरी, समाज की तमाम जिम्मेदारियों के बीच शायद कोई है जो मेरी थकान मिटाने चला आता है तो सिर्फ मेरी आधी-अधूरी प्रेम कहानी ही है.. जिसमें झूलकर सारी थकान मिट जाती है मेरी... भले उसमें बताने के लिए मेरे पास कुछ भी न हो.. ओह्ह! देखिए.. अपनी बातों में यूँ खोयी रही कि अब तक मैंने अपना नाम और परिचय भी न बताया- आई एम तूलिका (गायनेकोलॉजिस्ट ) एंड माई हस्बैंड इस न्यूरोलोजिस्ट... उनका नाम तो याद नहीं लेकिन इतना जरूर याद है कि अल्फाबेटके पहले लेटर से ही नाम शुरु होता है उनका... मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

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Hindi Info भारत के 5 सबसे अनूठे गांव ये है

ये है भारत के 5 सबसे अनूठे गांव, नंबर 1 में तो है अपना संविधान. नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, आज हम आपको भारत के 5 सबसे अनोखे गांव के बारे में बताने वाले हैं जो अपने आप में अलग ही देश-विदेश में पहचान रखते हैं, तो चलिए आज की चर्चा शुरू करते हैं। 5. पिपलांत्री यह भारत का सबसे विकसित गांव के तौर पर जाना जाता है। इस गांव के विकास को डेनमार्क देश की किताबों में भी पढ़ाया जाता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारत के अधिकतर लोग इस गांव के बारे में नहीं जानते हैं। यह गांव राजस्थान के उदयपुर से 50 किलोमीटर दूर है और इस गांव की जनसंख्या करीब 1500 लोगों की है। इस गांव में पानी, पेड़ और बेटी बचाने के लिए देशभर में सबसे शानदार उदाहरण पेश किया है। इस गांव में इजरायल तकनीक पर आधारित कई प्रकार हाईटेक खेती की जाती है। लड़कियों के जन्म पर इस गांव में 111 पेड़ लगाने होते हैं और इनकी शादी का सारा खर्च पूरा गांव मिलकर उठाता है। 4. मावल्यान्नॉंग इस गांव को एशिया का सबसे स्वच्छ गांव की उपाधि मिली हुई है। यह गांव स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने से कई सालों पहले स्वच्छता के मामले में अव्वल रहा है। यह गांव भगवान का बगीचे के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह गांव भारत-बांग्लादेश के बॉर्डर पर मेघालय राज्य में स्थित है। आपको अपनी जिंदगी में एक बार इस गांव में जरूर जाकर आना चाहिए। 3. कोडिन्ही केरल में स्थित यह गांव जुड़वाँ बच्चों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। आपको यहां पर हर घर में एक जुड़वाँ बच्चा जरूर मिल जाएगा। यहां जुड़वाँ बच्चा पैदा होने की क्या वजह है, अभी तक कोई भी असली कारण नहीं खोज पाया है। आपको यहां पर नवजात शिशु लेकर 60 साल के बुड्ढे तक का डबल रोल मिल जाएगा। यह गांव वाले इन जुड़वाँ बच्चों की वजह से कितने कंफ्यूज होते होंगे यह तो अब बस ऊपरवाला ही जाने। 2. करचोंड आज भी भारत में अंतरजातीय विवाह या फिर शादी से पहले लड़की से मिलने की वजह कितनी ही समस्या और लड़ाई दंगे हो जाते हैं। भारतीय न्यायालय ने हाल ही में लोगों को लव इन रिलेशनशिप में रहने के अधिकार प्रदान किए हैं लेकिन यह गांव इस मामले में हजारों साल पहले से ही आगे हैं। गुजरात के सेलवास से 30 किलोमीटर दूर स्थित 3 हजार आदिवासी लोगों के इस गांव में आप बेरोकटोक किसी भी लड़की के साथ लव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं। अक्सर लोगों की गांव के प्रति गलत धारणाएं ही रहती है लेकिन यह गांव शहर से भी आगे है। 1. मलाणा हिमाचल प्रदेश के मनाली शहर से 70 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव अपने आप में कई खूबियों से भरा हुआ है। अगर आपको इस गांव की पहली खूबी बताई जाए तो इस गांव में कनाशी भाषा बोली जाती है जो केवल विश्व में केवल इसी गांव के लोग जानते हैं और यह इसे ना ही किसी बाहरी लोगों को सिखाते हैं। दूसरी बात इस गांव में मलाणा क्रीम मिलती है जिसे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भांग के तौर पर जानी जाती है। इस गांव के लोग खुद को सिकंदर का वंशज मानते हैं और यह दुनिया का सबसे पुरानी लोकशाही गांव है। इस गांव में खुद का संविधान और संसद है जिसमें ये निचले सदन को कनिष्थाँग और उच्च सदन को जयेशथाँग कहते है। गांव में साल भर भीड़ रहती है लेकिन यहां के लोग अपने ही मस्ती में रहते हैं। खैर, यह थे भारत के कुछ अनूठे गांव, अगर आपके गांव या आसपास गांव में भी कुछ अनूठी बात है उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Story क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी

क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी? नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, गुजरात में कई ऐसे खूबसूरत पर्यटक स्थल हैं, जिसे देखने का मोह लोग छोड़ नहीं पाते। इन्हीं पर्यटक स्थलों में एक बेहद दिलचस्प जगह है, रानी की बावड़ी, जिसे रानी की वाव का नाम भी दिया गया है। इतिहास में पानी के कुंड को बावली कहा जाता था, इसीलिए इसका नाम रानी की बावड़ी रखा गया। सरस्वती नदी के मुहाने पर बसे पाटन में यह खूबसूरत कला का नमूना कई सदियों से खड़ा हुआ है। गुजरात के पाटन को इतिहास में अन्हिलपुर के नाम से जाना जाता था जो गुजरात की राजधानी हुआ करती थी। यही मौजूद है वास्तुकला और ऐतिहासिक सुंदरता का खूबसूरत नमूना। आइये जानते हैं इस बावड़ी के बारे में दिलचस्प बातें। क्यों कहा जाता है इसे रानी की बावड़ी? यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है जैसा कि आप सभी जानते हैं भारत में कई ऐतिहासिक स्थल पुराने राजाओं द्वारा बनवाए गए हैं। असल में रानी की बावड़ी सोलंकी राज के राजा भीमदेव की पहली पत्नी रानी उदयामति ने सन 1063 में बनवाई थी। यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है। क्योंकि इसका निर्माण रानी ने करवाया था, इसीलिए इसे रानी की बावड़ी का नाम दिया गया है। आम तौर पर बावड़ियां एक ही तरह से बनाई जाती है, लेकिन इस कुंड को मंदिर का रूप दिया गया, जिसमें सात अलग-अलग मंज़िलें बनी हुई है। इसके चारों ओर खूबसूरत नक्काशी और पौराणिक और धार्मिक चित्रों को उकेरा गया है। इन शैलियों में सोलंकी वंश की कला को दर्शाया गया है, जो दिखने में बेहद खूबसूरत दिखाई देती है। लंबी लंबी सीढ़ियां और बीच में पानी का कुंड बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। चमत्कारी पानी की बावड़ी सुरंग के साथ बावड़ी आपको जानकर हैरानी होगी कि हर ऐतिहासिक स्मारक का एक रहस्य भी होता है। ऐसा ही रानी की वाव के साथ भी है। इसकी अंतिम सीढ़ी पर बना हुआ है एक ख़ास दरवाज़ा, जहां से 30 मीटर लंबी सुरंग बनाई गई है, जो यहां से सीधी सिद्धपुर गांव में जाकर खुलती है। यह गांव पाटन के पास ही बसा हुआ है। इस पानी को पीने से मौसमी बुखार और कई बीमारियां ठीक हो जाया करती थी उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Info अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया

अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया गया जिसे आप नही जानते, जानकर होगी हैरानी नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, दोस्तों राजा अकबर को भारतीय इतिहास का एक महान राजा माना जाता है राजा अकबर ने अपने शासनकाल में काफी ज्यादा सामाजिक कार्य किया था जिसके कारण राजा अकबर को एक अच्छा शासक माना जाता है राजा अकबर के शासन काल में प्रजा काफी ज्यादा सुखी हुआ करती थी। अकबर ने अपने शासनकाल में सभी धर्मों का सम्मान किया था इसके अलावा अकबर के शासनकाल में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहता था। अकबर ने अपने शासनकाल में कई बड़े-बड़े कार्य करवाए थे। अकबर के शासनकाल में भारत ने काफी ज्यादा तरक्की की थी लेकिन दोस्तों क्या आप लोगों को मालूम है कि जब राजा अकबर इतना बड़ा महान व्यक्ति था तो उसकी जब मृत्यु हुई तब उसके सब को राजकीय सम्मान के साथ क्यों नहीं जलाया गया। आज हम आप लोगों को बताने वाले हैं कि आखिर राजा अकबर की मृत्यु के बाद उसके शव के साथ क्या किया गया था। दोस्तों जब राजा अकबर की मृत्यु हुई थी उनके शव को बिना किसी राजकीय सम्मान और बिना अंतिम संस्कार के दुर्ग के पीछे दीवार तोड़कर सिकंदरा में दफना दिया। इसका कारण यह था कि उस समय अफगान के लोग मुगल साम्राज्य पर हावी हो रहे थे जिसके कारण मुगल साम्राज्य के लोग चाहते थे कि राजा अकबर की मृत्यु के बारे में अफगान लोगों को मालूम ना हो। उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Real Hindi Stories प्यार या संस्कार

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, अदिति ने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद बेंगलुरु महानगर के एक नामीगिरमी कालेज में मैनेजमैंट कोर्स में ऐडमिशन लिया तो मानो उस के सपनों को पंख लग गए. उस के जीवन की सोच से ले कर संस्कार तथा सपनो से ले कर लाइफस्टाइल सभी तेजी से बदल गए. अदिति के जीवन में कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीकठाक चलता रहा, लेकिन अचानक उस के जीवन में उस के ही कालेज के एक छात्र प्रतीक की दस्तक के कारण जो मोड़ आया वह उस पहले प्यार के बवंडर से खुद को सुरक्षित नहीं रख पाई. अदिति बहुत जल्दी प्रतीक के प्यार के मोहपाश में इस तरह जकड़ गई मानो वह पहले कभी उस से अलग और अनजान नहीं थी. जवानी की दहलीज पर पहले प्यार की अनूठी कशिश में अदिति अपने जीवन के बीते दिनों तथा परिवार की चाहतों को पूरी तरह से विस्मृत कर चुकी थी. प्रतीक के प्यार में सुधबुध खो बैठी अदिति अपने सब से खूबसूरत ख्वाब के जिस रास्ते पर चल पड़ी वहां से पीछे मुड़ने का कोईर् रास्ता न तो उसे सूझा और न ही वह उस के लिए तैयार थी. गरमी की छुट्टी में जब अदिति अपने घर वापस आई तो उस के बदले हावभाव देख कर उस की अनुभवी मां को बेटी के बहके पांवों की चाल समझते देर नहीं लगी. जल्दी ही छिपे प्यार की कहानी किसी आईने की तरह बिलकुल साफ हो गई और मां को पहली बार अपनी गुडि़या सरीखी मासूम बेटी अचानक ही बहुत बड़ी लगने लगी. अदिति ने अपनी मां से प्रतीक से शादी के लिए शुरू में तो काफी विनती की, लेकिन मां के इनकार को देखते हुए वह जिद पर अड़ गई. अदिति के पिता तो उसी वक्त गुजर गए थे जब अदिति ठीक से चलना भी नहीं सीख पाई थी. मां और बेटी के अलावा उस छोटे से संसार में प्रतीक के प्रवेश की तैयारी के लिए एक बड़ा द्वंद्व और दुविधा का जो माहौल तैयार हो गया था वह सब के लिए दुखदायी था, जिस की मद्घिम लौ में मां को अपनी बेटी के चिरपोषित सपनों की दुनिया जल जाने का मंजर साफ नजर आ रहा था. ‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो? मैं प्रतीक से सच्चा प्यार करती हूं. वह ऐसावैसा लड़का नहीं है. वह अच्छे घर से है और निहायत शरीफ है. क्या बुरा है, यदि मैं उस से शादी करना चाहती हूं,’’ अदिति ने बड़े साफ लहजे में अपनी मां को अपने विचारों से अवगत कराया. मां अपनी बेटी के इस कठोर निर्णय से काफी आहत हुईं लेकिन खुद को संयमित करते हुए अदिति को अपने सांस्कारिक मूल्यों तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों का एहसास कराने की काफी कोशिश करती हुई बोलीं, ‘‘बेटी, मैं सबकुछ समझती हूं, लेकिन अपने भी कुछ संस्कार होते हैं. तुम्हारे पापा ने तुम्हारे लिए क्या सपने संजो रखे थे लेकिन तुम उन सपनों का इतनी जल्दी गला घोंट दोगी, इस बारे में तो मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था. अपनी जिद छोड़ो और अभी अपने भविष्य को संवारो. प्यार मुहब्बत और शादी के लिए अभी बहुत वक्त पड़ा है.’’ ‘‘मां, आप समझती नहीं हैं, प्यार संस्कार नहीं देखता, यह तो जीवन में देखे गए सपनों का प्रश्न होता है. मैं ने प्रतीक के साथ जीवन के न जाने कितने खूबसूरत सपने देखे हैं, लेकिन मैं यह भूल गई थी कि मेरे इंद्रधनुषी सपनों के पंख इतनी बेरहमी से कुतर दिए जाएंगे. आखिर, तुम्हें मेरे सपनों के टूटने से क्या?’’ ‘‘बेटी, सच पूछो तो प्रतीक के साथ तुम्हारा प्यार केवल तुम्हारे जीवन के लिए नहीं है. जीवन के रंगीन सपनों के दिलकश पंख पर बेतहाशा उड़ने की जिद में अपनों को लगे जख्म और दर्द के बारे में क्या तुम ने कभी सोचा है? प्यार का नाम केवल अपने सपनों को साकार होते देखनाभर नहीं है. वह सपना सपना ही क्या जो अपनों के दर्द की दास्तान की सीढ़ी पर चढ़ कर साकार किया गया हो. ‘‘आज तुम्हें मेरी बातें बचकानी लगती होंगी, लेकिन मेरी मानो जब कल तुम भी मेरी जगह पर आओगी और तुम्हारे अपने ही इस तरह की नासमझी की बातों को मनवाने के लिए तुम से जिद करेंगे तो तुम्हें पता चलेगा कि दिल में कितनी पीड़ा होती है. मन में अपनों द्वारा दिए गए क्लेश का शूल कितना चुभता है.’’ अदिति अपनी मां के मुंह से इस कड़वी सचाई को सुन कर थोड़ी देर के लिए सन्न रह गई. उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर अनजाने ही हाथ रख दिया हो. उस के जेहन में अनायास ही बचपन से ले कर अब तक अपनी मां द्वारा उस के लालनपालन के साथसाथ पढ़ाई के खर्चे के लिए संघर्ष करने की कहानी का हर दृश्य किसी सिनेमा की रील की भांति दौड़ता चला गया. अनायास ही उस की आंखें भर आईं. मन पर भ्रम और दुविधा की लंबे अरसे से पड़ी धूल की परत साफ हो चुकी थी और सबकुछ किसी शीशे की तरह साफसाफ प्रतीत होने लगा था. लेकिन बीते हुए कल के उस दर्र्द के आंसू को अपनी मां से छिपाते हुए वह भाग कर अपने कमरे में चली गई. अपनी मां की दिल को छू लेने वाली बातों ने अदिति को मानो एक गहरी नींद से जगा दिया हो. छुट्टियों के बाद अदिति अपने कालेज वापस आ गई और जीवन फिर परिवर्तन के एक नए दौर से गुजरने लगा. कालेज वापस लौटने के बाद अदिति गुमसुम रहने लगी. प्रतीक से भी वह कम ही बातें करती थी, बल्कि उस ने उसे शादी के बारे में अपनी मां की मरजी से भी अवगत करा दिया और इस तरह मंजिल तक पहुंचने से पहले ही दोनों की राहें अलग अलग हो गईं. कालेज के अंतिम वर्ष में कैंपस सिलैक्शन में प्रतीक को किसी मल्टीनैशनल कंपनी में ट्रेनी मैनेजर के रूप में यूरोप का असाइनमैंट मिला और अदिति ने किसी दूसरी मल्टीनैशनल कंपनी में क्वालिटी कंट्रोल ऐग्जीक्यूटिव के रूप में अपनी प्लेसमैंट की जगह बेंगलुरु को ही चुन लिया. अदिति अपनी मां के साथ इस मैट्रोपोलिटन सिटी में रह कर जीवन गुजारने लगी. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. इसी बीच कंपनी ने अदिति को 1 वर्ष के फौरेन असाइनमैंट पर आस्ट्रेलिया भेजने का निर्णय लिया. अदिति अपनी मां के साथ जब आस्टे्रलिया के सिडनी शहर आई तो संयोग से वहीं पर एक दिन किसी शौपिंग मौल में उस की प्रतीक से मुलाकात हो गई. अदिति के लिए यह एक सुखद लमहा था, जिस की नरम कशिश में वर्षों पूर्व के संबंधों की यादें बड़ी तेजी से ताजी हो गईं. लेकिन भविष्य में इस संबंध के मुकम्मल न होने के भय ने उस के पैर वापस खींच लिए. प्रतीक अपने क्वार्टर में अकेला रहता था और अकसर हर रोज शाम के वक्त वह अदिति के घर पर आ जाया करता था. मां को भी अपने घर में अपने देश के एक परिचित के रूप में प्रतीक का आना जाना अच्छा लगता था, क्योंकि परदेश में उस के अलावा सुख दुख बांटने वाला और कोई भी तो नहीं था. अचानक एक दिन औफिस से घर लौटते वक्त अदिति की औफिस कार की किसी प्राइवेट कार के साथ टक्कर हो गई और अदिति को सिर में काफी चोट आई. महीनेभर तक अदिति हौस्पिटल में ऐडमिट रही और इस दौरान उस का और उस की मां का ध्यान रखने वाला प्रतीक के अलावा और कोई नहीं था. प्रतीक ने मुसीबत की इस घड़ी में अदिति और उस की मां का भरपूर ध्यान रखा और इसी बीच अदिति और प्रतीक फिर से कब एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि उन्हें इस का पता ही नहीं चला. अदिति का यूरोप असाइनमैंट खत्म होने वाला था और उसे अब अपने देश वापस आना था. अदिति और उस की मां को छोड़ने के लिए प्रतीक भी बेंगलुरु आया था. प्रतीक के सेवाभाव से अदिति की मां अभिभूत हो गई थीं. प्रतीक सिडनी वापस जाने की पूर्व संध्या पर अपने मम्मीडैडी के साथ अदिति से मुलाकात करने आया था. अदिति का व्यवहार तथा शालीनता देख कर प्रतीक के पेरैंट्स काफी खुश हुए. प्रतीक की अगले दिन फ्लाइट थी. एयरपोर्ट पर बोर्डिंग के समय जब अदिति का फोन आया तो उस के दिलोदिमाग में एक अजीब हलचल मच गई. पुराने प्यार की सुखद और नरम बयार में प्रतीक के मन का कोनाकोना सिहर उठा. प्रतीक ने अपनी फ्लाइट कैंसिल करवा ली. उस ने अपनी कंपनी को बेंगलुरु में ही उसे शिफ्ट करने के लिए रिक्वैस्ट भेज दी जो कुछ दिनों में अपू्रव भी हो गई. अदिति की मां प्रतीक के इस फैसले से काफी प्रभावित हुईं. अदिति हमेशा के लिए अब प्रतीक की हो गई थी और वह मां के साथ ही बेंगलुरु में रहने लगी थी. प्रतीक अपनी खुली आंखों से अपने सपने को अपनी बांहों में पा कर खुशी से फूले नहीं समा रहा था. अदिति के पांव भी जमीं पर नहीं पड़ रहे थे. उसे आज जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि धरती की तरह सपनों की दुनिया भी गोल होती है और सितारे भले ही टूटते हों, लेकिन यदि विश्वास मजबूत हो तो सपने कभी नहीं टूटते. उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Real Stories भोले भक्त की भक्ति

एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था। एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम में आया और बोला कि बाबा आप सब का ध्यान रखते है, मेरा इस दुनिया मेँ कोई नही है तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम में रह सकता हूँ ? बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है ? उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ। तब संत ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना। रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा। उन संत की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ रुकेगा ? संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे.! क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे। अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था। बालक रामदास संत के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ। संत ने कहा ठीक हैँ पर तुझे काम करना पड़ेगा आश्रम की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा मे कोई कमी मत रखना। रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप बता दिजिये के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है ? फिर मैँ कर दूंगा। संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार की झाँकी थी। श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी थे. संत ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है सब सिखा दिया। रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योँकि अगर रिश्ता पता चल जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा। उन संत ने बालक रामदास कहा की तू कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज से ये राम जी और सीता जी तेरे माता-पिता हैँ। रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है ? संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है। रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये। आज सेवा का पहला दिन था, रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया ,आश्रम की साफ़ सफाई की,और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया। रामदास ने श्री राम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा। रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर खायेंगे. पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी। तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिश्ता बना हैँ तो शरमा रहेँ होँगे। रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था। अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ ! और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और मैँ भूख से मर जाऊँगा..! इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा। रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब भगवान राम जी हनुमान जी को कहते हैँ हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ। हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो? रामदास कहता हैँ आप कौन ? हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ? रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहा बोल रहा था की खाना खा लो तब आये नहीँ अब क्योँ आ गये ? तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे। फिर राम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी , हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैँ। इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता। सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा घर मैँ ५ लोग हैं,सारा काम में ही अकेला करता हुँ ,बाकी लोग तो दिन भर घर में आराम करते है.मेरे माँ, बाप ,चाचा ,भाई तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ. मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा। रामदास मंदिर जाता हैँ ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।राम जी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ ? रामदास कहता हैँ की घर में मैं सबसे छोटा हुँ ,और मैं ही सब काम करता हुँ।अब से मैँ अकेले काम नहीँ करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा,आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा। राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है?रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले. और चाचा जी (लक्ष्मणजी) आप घर की साफ़ सफाई करियेगा. भैय्या जी (हनुमान जी)शरीर से मज़बूत हैं ,जाकर जंगल से लकड़ियाँ लाइयेंगे. पिता जी (रामजी) आप बाज़ार से राशन लाइए और घर पर बैठकर पत्तल बनाओँगे। सबने कहा ठीक हैँ।मैंने बहुत दिन अकेले सब काम किया अब मैं आराम करूँगा. अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ। एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो देखा आश्रम तो शीशे जैसा चमक रहा है, वो बहुत प्रसन्न हुए.मंदिर मेँ गये और देखा की मंदिर से प्रतिमाऐँ गायब हैँ. संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीँ दी ? संत ने रामदास को बुलाया और पूछा भगवान कहा गये रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता हनुमान भैया जंगल लकड़ी लाने गए होंगे,लखन चाचा झाड़ू पोछा कर रहे होंगे,पिताजी राम पत्तल बन रहे होंगे माता सीता रसोई मेँ काम कर रही होंगी. संत बोले ये क्या बोल रहा ? रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जब से आप गये हैँ ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ। वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ राम जी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये। संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तू धन्य हैँ। और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये…! रामदास जैसे भोले,निश्छल भक्तो की भक्ति से विवश होकर भगवान को भी साधारण मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने आना पड़ता है. जय श्री राम उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.