और सूरज डूब गया - Real Story - Real Stories

और स

चांदनी, यह रही तुम्हारी बिछुड़ी हुई चूड़ी का दूसरा हिस्सा। दुर्घटना के समय तुम्हारी टूटी हुई वह चूड़ी, जिसको तुम्हारी जान बचाने की ख़ातिर, मैंने कभी तुम्हारे ही कोमल जिस्म से काटकर बाहर निकाला था। तुम्हारी प्यारी सोने की चूडि़यां, वर्षों पहले इन्हें तुम्हारे हाथों में पहनाने के मैं कभी लायक नहीं था, और आज इन्हें पहनाने का मुझे कोई भी अधिकार नहीं। इसको मेरी तरफ से अपने विवाह का एक उपहार समझकर स्वीकार कर लेना। मैं यहां से जा रहा हूं। तुम्हारा शहर और तुम्हारी हरेक वह जगह को छोड़कर, उस स्थान पर जहां पर मुझे तुम्हारी स्मृतियों की सुगंध कभी भी परेशान न कर सके। अपने पति के साथ, अपने जीवन के नये संसार में, खुशियों की एक नई कहानी शुरू करके, उस किताब को सदा के लिये बंद कर देना, जिसमें शायद कभी भूले से मेरा नाम आ गया था। सूरज।’ चांदनी ने एक ही सांस में पत्र में लिखी चार पंक्तियां पढ़कर समाप्त की तो तुरन्त ही वह सकते में आ गई। इस प्रकार कि अचानक ही उसका दिल किसी अपराध बोध की भावना से ग्रस्त होकर हिल सा गया। वह समझ तो गई कि उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया है कि जिसके कारण वह एक भूल और अपराध की श्रेणी में गिनी जाये, पर फिर भी उसकी आंखों के सामने जैसे अंधकार सा छा गया। कितने वर्षों से वह अपने कदम जीवन की हरेक डगर और गली में फूंक-फूंककर रखती आई थी। अपने जज़बातों पर काबू करके प्यार की हवाओं से खुद को बचाती आई थी। एक प्रकार से सूरज को वह भूल ही चुकी थी। जब उसने कभी आवाज़ दी थी तो सुनकर भी वह अनजान बन गई थी। कारण था कि एक मसीही लड़की होते हुये वह, अपने आपको आदर्श नारी के पथ पर चलाते हुये इन सारी बातों से दूर रखती आई थी। सोच लिया था कि कायदे से मां-बाप के कहने पर, उनकी ही मर्जी के अनुसार अपना विवाह कर लेगी। लेकिन पिछले दिनों जो घातक दुर्घटना उसके जीवन में हुई और अचानक से एक अनजान, अनदेखा युवक उसके जीवन में उसका दूसरा जीवन बनकर ऐसा उदित हुआ कि, जिसने उसे मौत के पंजे से बाहर निकाला तो बहुत स्वभाविक ही था कि ऐसे स्वर्गीय-दूत स्वरूप पुरूष के विषय में वह सोचने पर विवश हो जाये। सोचना क्या वह तो सोचने से भी कहीं ज्यादा बहुत कुछ सोच बैठी थी। कितना इंतजार किया था उसने तब उस अनजान युवक का? कितना अधिक मन ही मन वह उसको चाहने लगी थी। बिन देखे ही वह उस अनजाने पुरूष को अपने मन-मन्दिर में वह विशेष स्थान दे चुकी थी, जो हरेक लड़की अपने जीवन में किसी एक को यह स्थान केवल एक बार ही दे पाती है। इतना ही नहीं कि जिस अनजान युवक को वह अपने मन-मन्दिर का चहेता बनाकर, अपने दिल की धड़कनों में बसा चुकी थी, वह कोई भी अनजान और अपरिचित युवक न होकर वही सूरज था, जिसने वर्षों पहले उसको अपना बनाने के लिये कभी कोई गुज़ारिश की थी। सोचने ही मात्र से चांदनी की आंखें ठंडी रात में पुष्पों के होठों पर पड़ने वाली किसी शबनम की बंूदों समान भर आईं। काश: सूरज उसके सामने बहुत पहले ही आ जाता। आ गया होता तो तब तो उसके जीवन की कहानी का मजमून ही दूसरा होता। अपने पसंद की प्यार की बगिया में वह सूरज के साथ दो सूख़ी रोटियां ही खाकर जितना खुश होती, शायद उतना कभी भी नहीं हो पाती। सोचते हुये चांदनी की आंखें स्वत: ही भीग आईं। इस प्रकार की उसकी आंखों में मोती झलकने लगे। कितनी बड़ी भूल और चूक वह अपने जीवन में कर चुकी थी। इतना बड़ा उधार का बोझ वह अपने सिर से बांध चुकी थी कि जिसके ब्याज का एक रत्ती भर हिसाब भी वह अब कभी नहीं दे सकेगी। वयो-संन्धि की उम्र पार करते ही, जि़न्दगी के तमाम आयामों से गुज़रते हुये उसके जीवन की गाड़ी में सूरज के प्यार की छिली हुई कराहटें फिर एक बार आकर उलझ जायेंगी; सोचते हुये चंादनी की आंखों में आज से पन्दरह वर्ष पुरानी वह घटना सामने आ गई, जब सूरज से उसका सामना अचानक ही हो गया था। तब चांदनी अपनी कॉलेज की गर्मी की छुट्टियां समाप्त होने से पहले, कॉलेज में प्रवेश लेने के लिये आवश्यक कागज़ात आदि सम्मिलित करने के लिये इस नये शहर के मशहूर कॉलेज में आई थी। हांलाकि, वह मिशन डॉयोसीज़ के बिशप की लड़की थी। मिशन का ईसाई कॉलेज था। इस शहर तो क्या, आस-पास के तमाम शहरों के मिशन स्कूलों और कॉलेजों में उसके पिता की तूती बोलती थी। चांदनी चाहती तो उसका सारा काम यूं भी घर बैठे ही हो जाता, पर नये शहर और अपने पिता की नई कार चलाने और नया शहर घूमने की इच्छा के कारण ही वह अपनी अन्य दो सखियों के साथ चली आई थी। कॉलेज के कार्यालय में आकर उसे कोई विशेष कार्य तो करना नहीं था, केवल पेपर ही जमा करने थे। उसका सारा काम उसके पिता के केवल एक फोन करने से ही हो चुका था। सो कॉलेज के कार्यालय में आकर उसने अपने पेपर जमा कराये। कॉलेज के कार्यालय के मुख्य हैडक्लर्क उसके आने की पहले ही से प्रतीक्षा कर रहे थे। पेपर जमा करते हुये चांदनी को कोई विशेष आश्चर्य भी नहीं हुआ, क्योंकि ऐसी बातों का चांदनी को बहुत अच्छा अनुभव पहले ही से था। अपना काम समाप्त करने के पश्चात, उसने एक अच्छे रेस्तरां में खाना खाया और फिर सहेलियों के साथ उसने अपनी कार का मुख हिमसारा नदी की तरफ मोड़ दिया। उसने सुना और पढ़ा भी था, हिंडौली शहर की यह नदी अपने आस-पास की खुबसूरती और प्राकृतिक छटाओं के लिये काफी सुविख्यात थी। फिर यूं भी चांदनी को प्रकृति की सजावट और मनोहरता बेहद प्यारी लगती थी। नदी के तट पर पहुंचते ही चांदनी सचमुच ही उसकी बहारों में खो सी गई। नदी की मदमस्त लहरों से नहाती हुई ठंडी हवाओं ने जब उसके जिस्म को स्पर्श किया तो स्वत: ही चांदनी के बदन में भी जैसे खुशियों की रश्मियां झिलमिलाने सी लगीं। उसने अपने आप ही अंदाजा लगा लिया पा जब गर्मी के दिनों में मौसमी वनस्पति और वृक्षों का ये नजारा है तो बसंत में पतझड़ से पहले और नई कोपलें आने के पश्चात इस नदी के मुहाने कितना कुछ प्रभावित करते होंगे। लगता था कि ढलते हुये सूर्य की रश्मियों के सहारे वृक्षों, झाडि़यों और तमाम वनस्पति की परछाइंयां नदी के जल में बड़े ही आराम से पसर कर सन्ध्या का स्नान करती होंगी। चांदनी अभी भी पुल की मुंडेर से अपने दोनों हाथों को अपने मुख के सहारे लगाये हुये इन्हीं विचारों में गुम थी कि, तभी अचानक से किसी मधुर बांसुरी की धुन ने उसका ध्यान भंग कर दिया। पुल के दूसरी तरफ से, पेड़ों की छांव से, नदी की लहरों के बदन को चीरती हुई बंसुरी का मोहक दर्दभरा सा संगीत चांदनी के कानों में जैसे हलचल मचाने लगा था। किसी ने अनजाने में ही एक प्यारा, मधुर और मसीही गीत छेड़ दिया था। बांसुरी की लय पर जो गीत बजाया जा रहा था, उसके बोल थे, ‘मेरे पिता, यह मेरी दुआ, यीशु की मानिन्द तू मुझको बना।’ इतनी प्यारी, धाराओं के गर्भ से निकलने वाली बांसुरी की आवाज़ थी कि चांदनी के पैर स्वत: ही उस तरफ बढ़ने लगे, जिधर से यह सुगम संगीत आ रहा था। वह चुपचाप जाने लगी तो उसकी सख़ी राहेल ने उसे टोका भी। वह बोली, ‘ऐ, किधर जाती है?’ लेकिन चांदनी ने उसकी तरफ हाथ से इशारा करके, उसको तुरन्त नकार दिया और फिर से आगे बढ़ने लगी। जल्दी ही, चांदनी उस स्थान तक पहुंच गई जिधर से ये मधुर धुन आ रही थी। पास, लेकिन थोड़ा दूर ही से, खड़े होकर चांदनी ने देखा कि कोई युवक नदी के किनारे, पेड़ों की छांव में, अपनी बंसी पानी में डाले हुये चुपचाप बांसुरी बजा रहा है और शायद मछली फंसने का इंतजार भी कर रहा है। मछली, बंसी और बांसुरी; इन तीनों बातों का संगम एक ही स्थान पर? सोचकर चांदनी किसी भी निर्णय पर नहीं पहुंच सकी। वह लड़का अभी भी अपनी बांसुरी बजाने में लीन था। चांदनी काफी देर तक चुपचाप खड़ी हुई उस लड़के को देखती रही। उसने सोचा कि, कौन हो सकता है ये युवक? मसीही गीत की धुन बजाता है, तो अवश्य ही मसीही भी हो सकता है। मछली का शिकार, कबूतर, फाख्तायें और नील गायों का शिकार आदि करने में ईसाई लड़के तो यूं भी माहिर होते ही हैं। उससे बोलूं, न बोलूं, ना जाने कौन हो सकता है? फिर, नया शहर, नई जगह, नदी का किनारा, एकान्त? कुछ भी हो सकता है; एक आशंका और भय के कारण चांदनी के पैर अपने आप ही पीछे लौटने लगे। राहेल और उसकी दूसरी सहेली मधु, दोनों उससे कुछ दूर ही खड़ी हुई, उसको ही देख रही थीं। चांदनी पास आई तो राहेल ने चुटकी ली। उसे छेड़ा और बोली, ‘देख लिया जी भर के?’ ‘हां।’ ‘कैसा लगा? पसंद आया?’ ‘नहीं।’ चांदनी ने भी वैसा ही उत्तर दिया तो मधु बोली, ‘लगता तो ईसाई है।’ ‘हां, लेकिन मछलीमार है।’ ‘यीशु मसीह के शिष्य भी तो मछलीमार ही थे।’ ‘हां थे, लेकिन बहुत अंतर है, गलील के सागर के मछुआरों और नदी के मछलीमारों में।’ चांदनी ने उत्तर दिया। बाद में चांदनी हिमासारा के नज़ारे देखकर वापस अपने शहर में आ गई। नदी वाली घटना और उस युवक के द्वारा प्यारी बांसुरी की धुन पर मसीही गीत बजाने वाले उस युवक का ध्यान भी उसके मानसपटल पर से धीरे-धीरे दो-एक दिनों में ही साफ भी हो गया; लेकिन बांसुरी की उस प्यारी और सुरीली आवाज़ को भी चांदनी भूल सकी, इसमें अवश्य ही सन्देह था। फिर जुलाई में कॉलेज खुले। नया सत्र आरंभ हुआ। चांदनी अपना शहर छोड़कर, एक मसीही कम्पाऊंड में ही मिशन की एक खाली पड़ी कोठी में रहने लगी। यहां भी उसके रहने का प्रबंध उसके पिता के नाम पर ही हो सका था। मिशन बंगले में रहते हुये चांदनी कॉलेज जाने लगी और अपनी पढ़ाई में व्यस्त भी हो गई। पर एक दिन अचानक से उसने हिमसारा के किनारे उस बांसुरी बजाने वाले युवक को कॉलेज में किताबें पकड़े हुये देखा तो खुद को संभाल नहीं सकी। वह युवक जल्दी-जल्दी अपनी किसी कक्षा में जा रहा था। चांदनी ने शीघ्र ही उस युवक को टोका। वह बोली, ‘ऐ, हलो, ज़रा सुनिये तो?’ कहते हुये चांदनी उसके सामने अचानक से आई तो वह युवक भी आश्चर्य से अपने स्थान पर ठिठक कर खड़ा हो गया और चांदनी का मूंह ताकने लगा। तभी चांदनी ने उससे कहा कि, ‘मैं अगर भूलूं न तो आप वही तो नहीं जो एक दिन शाम के समय हिमसारा पर मछली की बंसी पानी में डाले हुये बेहद प्यारी बांसुरी बजा रहे थे?’ ‘?’ चांदनी के कथन पर वह युवक थोड़ा चौंका पर गंभीरता से उसका चेहरा ताकने लगा। तभी चांदनी फिर से बोली, ‘मैं ठीक कह रही हूं न?’ ‘आपको कैसे मालुम?’ उस युवक ने आश्चर्य से पूछा। ‘मैं भी उसी दिन हिमसारा पर घूमने गई हुई थी, तभी आपको नदी के किनारे बैठे हुये और बांसुरी बजाते हुये देखा था।’ चांदनी की बात सुनकर वह युवक हल्के से मुस्कराया, फिर बोला, ‘आपने मुझे वहां पर देखा तो था, पर बोली कुछ भी नहीं।’ ‘हिम्मत ही नहीं हुई थी। एक अनजान से गुफ्तगू करने की। फिर किसी का क्या भरोसा। किसी के माथे पर तो नहीं लिखा होता है कि वह कौन है?’ चांदनी बोली तो वह युवक बोला, ‘चलिये मैं बताता हूं। मेरा पूरा नाम सूरज ज्योति प्रकाश है। मेरे पिता रेव्हरेंड ज्योति प्रकाश बदरिया कस्बे के एक छोटे से चर्च के कारगुजार हैं। दो माह पहिले मेरा टयूबरक्लोसिस का टेस्ट पॉज़ीटिब निकला था। डाक्टर ने अच्छी हेल्दी प्रोटीन डाइट खाने को बोला है। पापा की कारगुज़ारी की छोटी सी तनख्वाह में मेरी दवाइयों का खर्च तो जैसे-तैसे पूरा हो जाता है, लेकिन हेल्दी डाइट में रोजाना मीट और मछली नहीं खा सकता हूं। इसलिये हिमसारा पर मछली पकड़ लेता हूं, और कभी-कभार दो एक कबूतर मार कर अपना काम चला रहा हूं।’ सूरज ने अपने बारे में बताया तो चंादनी बड़ी देर तक कुछ भी नहीं बोली। वह चुप ही बनी रही तो सूरज ने आगे कहा, ‘अच्छा, अब मैं चलता हूं। मेरी क्लास शुरू हो चुकी है।’ उपरोक्त पहली मुलाकात के पश्चात, चांदनी प्राय: ही सूरज को कॉलेज में मिलती रही। सूरज चांदनी को अच्छा लगा। उसका स्वाभाव, कम बोलना और अपने ही काम तथा उत्तरदायित्वों तक सीमित रहना, जैसे उसकी आदत में शामिल था। वह उससे बोलती थी। बातें करती थीं। वह उसे पसंद था और अच्छा भी लगता था, लेकिन इतना सब कुछ होने के पश्चात भी चांदनी के बजूद ने कभी भी उसको सूरज के तंग दायरों में देर तक खड़े रहने की इजाजत नहीं दी। सूरज की हालत और पारिवारिक स्थिति ने चांदनी को यह बताने में कोई भी झिझक महसूस नहीं होने दी कि सूरज चाहे कितना भी भला लड़का क्यों न हो, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, पर आखिरकार वह उस गरीब पादरी कारगुजार का ही लड़का है कि जहां की सरहदों पर उसके पिता के हुक्म सदा राज्य किया करते हैं। फिर एक दिन चांदनी को यह भी महसूस हो गया कि, हरेक दिन उसका सूरज से मिलना, रोजाना कॉलेज आना और जब देखो तब ही उसका सूरज से हंसते खिल-खिलाते हुये बातें करने का नतीज़ा; सूरज के दिल में अपने उस प्यार का निमंत्रण देना हुआ कि जिसके बारे में उसने कभी भी सोचा तक नहीं था। सूरज की आंखों में छिपी हुई चांदनी की वह ठंडक जो सूरज की रश्मियों को अब छेड़ने लगी थी, उसको चांदनी स्पष्ट महसूस कर रही थी। सूरज उसको चुपचाप देखने लगा था। देखकर गंभीर और खोने लगा है। उसकी आंखों में चांदनी के अक्श को सदा अपना बनाने के लिये एक पूरा कैनवास तैयार हो चुका है। इस हकीकत को चांदनी ने तब जाना, जब कि अब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह जान गई थी कि सूरज के उसकी तरफ बढ़े हुये कदमों को अब वापस लौटाना सहज नहीं था। फिर एक दिन चांदनी को जिस बात का भय था, वही हो गया। एक समय पर सूरज ने चांदनी से कह ही दिया। वह अत्यन्त ही बोझिल आवाज़ में चांदनी से बोला कि, ‘चांदनी, कभी मैंने आरंभ में सोचा भी नहीं था कि, मैं कभी भी किसी की प्यार की हसरतों में जकड़कर उसकी गुलामी करने लगूंगा। डाक्टर ने मुझको बांसुरी बजाने के लिये मना किया है। उनका कहना है कि बांसुरी बजाने से फेफड़े खराब होते हैं, लेकिन तन्हाइयों में डूबी हुई मेरी बांसुरी की आवाज़ अब केवल चांदनी को ही पुकारा करती है। अगर तुम नहीं सुनोगी तो मेरे फेफड़े सदा के लिये खराब हो जायेंगे, और सूरज हमेशा के लिये डूब जायेगा।’ ‘?’ सूरज के गले से निकले हुये दर्द भरे शब्द चांदनी को अपने दामन में समेटने के लिये बेताब हो चुके हैं, उससे अपने प्यार की हसरतों का तकाज़ा कर रहे हैं; सुनकर चांदनी दंग रह गई। रोज़ाना की आपसी मुलाकात का अंजाम इस हद तक पहुंच जायेगा? नौबत यहां तक भी आ जायेगी? सुनकर, चांदनी के पैरों से जैसे सारी ज़मीन ही खिसक गई। सूरज उसको प्यार करे, इससे पहले वह उसके लिये एक बीमार, कमज़ोर और लाचार लड़का है। उसका आवश्यकता से अधिक हर वक्त सोचना, उसके स्वास्थ्य के लिये अच्छा भी नहीं है। उसने सूरज को अपने करीब लाने में जो गलती की है, उससे ज्यादा अच्छा उससे दूर हो जाना ही बेहतर होगा। अपने मन की विचार धाराओं में इस बात को बसाये हुये, चांदनी सूरज को कोई भी उत्तर दिये चुपचाप उसके सामने से चली गई। फिर कई दिनों तक वह उसके सामने भी जानबूझ कर नहीं आई। सूरज से वह दूर ही बनी रही। सूरज ने उससे बात करनी चाही, लेकिन चांदनी ने उसे अवसर ही नहीं आने दिया। नतीजा; सूरज निराश होने लगा। अपने प्रति चांदनी की आंखों में बसी हुई निर्लिप्तता का वह कोई ठोस कारण तो नहीं जान सका, पर इतना जरूर समझ गया था कि चांदनी की उसके प्रति पलायनता अवश्य ही जारी हो चुकी है। वह उससे दूर हटने लगी है। अब वह उसमें कोई दिलचस्पी भी नहीं ले रही है। सूरज के लिये इतना ही इशारा काफी था। वह समझ गया कि उसने जो प्रेम का निमंत्रण कभी चांदनी को दिया था, उसका सन्देश ना में ही है। कारण; उसकी गरीबी, कमजोरी, पारिवारिक स्थिति, उसकी बीमारी, चाहे कुछ भी हो सकता है। नाज़ों और ठाठों में पली हुई एक बिशप की अमीर लड़की, किसी गरीब साइकिल चलाने वाले पादरी के लड़के से एक बार को इश्क के पेंतरे जरूर खेल ले, लेकिन उसे जीवन भर का अपना साथी क्यों बनायेगी? यह कोई भी ऐसी बात नहीं थी कि जिसे सूरज न समझ सका हो। वह समझ गया था कि किस प्रकार चकोर पक्षी के प्यार की कराहटें चांदनी के अक्श को पाने के लिये, उसके पत्थरों से टकरा-टकराकर अपना बजूद समाप्त कर देती हैं। किस तरह से नाज़ुक फूलों की महकार का अस्तित्व मौसमी हवाओं के एक ही झोंके में सिमट कर विलीन हो जाता है। आज के जमाने की यही रीति है, रिवाज हैं और, शायद चलन भी। सूरज का दिल टूट गया। इस प्रकार कि पल भर में ही सारा संसार उसे काला दिखने लगा। हर लड़की में उसे चांदनी की बेवफाइंयां नज़र आने लगी। वह फिर से अपना दुख, अपना हाल बांसुरी की दर्दीली धुनों में सुनाने लगा। और तब जब वह कॉलेज में ही, खेल के मैदान में बैठा हुआ बांसुरी बजा रहा था कि, चांदनी उसकी आवाज़ को सुनकर उसके पास आई और छूटते ही बोली, ‘सूरज? अब हर वक्त बांसुरी बजाते रहते हो? तुम्हें मालुम है कि इसका बजाना तुम्हारे स्वास्थ्य के लिये अच्छा नहीं है?’ ‘जानता हूं।’ सूरज ने चांदनी को एक पल निहार कर उत्तर दिया तो वह बोली, ‘जब जानते हो तो फिर क्यों बजाते हो?’ ‘ताकि, जल्दी ही मर जाऊं।’ ‘?’ सूरज के मुख से ऐसी बात सुनकर चांदनी अपना मुंह फाड़कर ही रह गई। वह उसे कई क्षणों तक अपलक घूरती रही। लेकिन बाद में बोली, ‘जानते हो कि तुम क्या कह रहे हो?’ ‘क्या जानता हूं? तुम नहीं जानती हो कि मैं बा्ंसुरी क्यों बजाता हूं?’ ‘मुझे सुनाने के लिये? है ना?’ ‘?’ खा़मोशी। सुनकर सूरज ने अपना सिर झुका लिया तो चांदनी आगे बोली, ‘क्या समझते हो तुम अपने आपको? मुझे प्यार करके मुझ पर एहसान कर रहे हो क्या? फिर यह भी जरूरी नहीं है कि तुम जिसे चाहो वह भी तुम पर मरने लगे?’ कहते हुये चांदनी बिफर गई तो सूरज उसका क्राध में बढ़ता हुआ लाल चेहरा देखने लगा। तब ही चांदनी ने आगे कहा कि, ‘प्यार, मुहब्बत और इश्क की बाजि़यां खेलने से ही इंसान को जीवन में सब कुछ नहीं मिल जाता है। अपने आपको तो देखो पहले? तुम्हारी दशा क्या है? बजाय इसके कि, पहले अपना कैरियर बनाओ, अपना स्वास्थ्य संभालो, अपने आपको ठीक करो, अपने पैरों पर खड़े होकर अपने मां-बाप और परिवार की सहायता करो; बेमतलब में ही दिल का रोग लगा बैठे हो? तुम क्या समझते हो कि इतना सब कुछ देखते हुये भी मैं सब कुछ भूलकर तुम्हारे बदन से लिपट जाऊंगी क्या?’ ‘चांदनी?’ सूरज चिल्ला पड़ा तो चांदनी भी चीख़ी, ‘इतना चिल्लाओ मत। शोर मचाना मुझे भी आता है।’ चांदनी ने गंभीरता से कहा तो सूरज चुप हो गया। उसके बाद दोनों के मध्य काफी देर तक चुप्पी बनी रही। दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोला। सूरज से जब नहीं रहा गया तो वह चांदनी से बगैर कुछ भी कहे, वहां से उठ कर चला गया। चांदनी उसे मूक बनी बड़ी देर तक जाते हुये देखती रही। उसके पश्चात सूरज तीन दिनों तक कॉलेज नहीं गया। चांदनी की आंखें उसे कॉलेज में हर स्थान पर तलाशती रहीं। जब वह नहीं मिला तो वह एक दिन पता लगाते हुये उसके घर जा पहुंची। सूरज की मां ने दरवाज़ा खोला तो चांदनी को देखकर वह पहचान नहीं सकी। सूरज की मां ने उसे बताया कि, बाहर दरवाज़े पर कोई बड़ी प्यारी लड़की तुझे पूछ रही है। क्या तू उसे जानता है?’ सुनकर सूरज बाहर गया तो चांदनी को यूं अचानक से अपने दरवाज़े पर खड़े देख चौंक गया। सूरज ने घर में आने को उससे बोला तो चांदनी ने मना कर दिया तो सूरज उससे बोला, ‘बहुत समझदार हो। जब तुमको मेरे घर में आना ही नहीं है तो अभी से न आने की प्रेक्टिस करना अच्छी बात है।’ ‘?’ उसकी इस बात पर चांदनी ने उसकी आंखों में गौर से झांक कर देखा, और फिर बोली, ‘जो कुछ भी कहना है, वह जी-भर के कह लो। बाद में मैं तुम से कुछ बोलूंगी।’ ‘मेरे पास अब कुछ भी कहने को नहीं बचा है। अब तुम ही कहो, जो भी कहना है।’ तब चांदनी ने उससे कहा कि, ‘मेरे यहां रहने से तुम्हारी परेशानी बढ़ जाती हैै, इसलिये मैं यहां से जा रही हूं, और अब कभी भी तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊंगी। अगर तुम्हें कुछ हो गया तो मैं अपने आपको कभी मॉफ भी नहीं कर पाऊंगी।’ सूरज उससे कुछ भी कहता, उससे पहले ही चांदनी तुरन्त ही उसके सामने से चली भी गई, और वह उसे जाते हुये केवल देखता ही रहा। चांदनी ने जैसा सूरज से उसके दरवाज़े पर कहा था, वैसा ही हुआ भी। क्रिसमस की छुट्टियों के बाद चांदनी सचमुच कॉलेज में नहीं आई। वह डॉयोसीज़ के बिशप की लड़की थी। उसके पिता ने उसकी बाकी की पढ़ाई के लिये जैसा भी प्रबन्ध किया, वह तो सूरज को नहीं मालुम हुआ, पर हां, चांदनी अपनी वार्षिक परीक्षा के दौरान अवश्य ही उसे दिखाई दी थी। इस प्रकार कि, चांदनी से आमना-सामना होने के बाद भी, सूरज उससे कोई भी बात नहीं कर सका था। वह भी समझ गया था कि शायद चांदनी ही उससे बात नहीं करना चाहती थी। यह सोचकर सूरज ने अपने दिल पर पत्थर रख लिया। सालाना परीक्षायें समाप्त हुई। कॉलेज बंद हुये। चांदनी भी परीक्षायें देकर अपने घर लौट गई। फिर धीरे-धीरे समय बदला। तारीखे़ आगे बढ़ी। कई मौसम आये और चले भी गये। सूरज ने भी चांदनी की स्मृतियों को अपने जीवन की एक कभी भी न भूलने वाली घटना के समान हृदय के किसी कोने में सदा के लिये सुरक्षित कर लिया। समय आगे बढ़ा और बढ़ते हुये समय के इन चक्रों में एक-एक दिन निकल कर पन्द्रह वर्ष बीत गये। इतने वर्षों में सूरज का क्या हुआ, वह कहां गया, आदि, इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर चांदनी ने कभी भी जानने की कोशिश नहीं की। एक प्रकार से वह सूरज को सदा के लिये भूल भी गई। सूरज ने भी अपनी पढ़ाई पूरी की। मेहनत की। हिम्मत और साहस से काम लिया। अपना पूरा इलाज करवाया और एक दिन नौकरी के लिये आवेदन पत्र दिया तो एक अच्छी कम्पनी में उसे चार्टर लेखाकार की अच्छी नौकरी मिल गई। नौकरी मिली तो उसे अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर जाना पड़ा। सूरज का काम देखकर, उसका बॉस जो खुद भी लगभग उसी की उम्र का था, उसको बहुत पसंद करने लगा। तीन साल के कार्यकाल में ही उसने सूरज को अपनी कंपनी का मुख्य लेखाकार बना दिया। इतने वर्षों में सूरज हांलाकि, चांदनी को भूला तो नहीं था, पर उसकी स्मृतियों के कारण परेशान भी नहीं होता था। लेकिन एक दिन जब वह मोटर सायकिल से अपने काम पर जा रहा था तो सूनसान मार्ग पर एक कार की दुर्घटना को देखकर उसे रूकना पड़ा। पास जाकर देखा तो कोई युवा लड़की कार के स्टयरिंग से सिर टिकाकर बेहोश पड़ी थी। कार की दुर्घटना का कारण क्या था? वह यह तो नहीं जान सका था, पर उसने लड़की का जब चेहरा देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। कार की दुर्घटना में घायल और बेहोश पड़ी लड़की कोई अन्य नहीं, वही चांदनी थी कि जिसकी यादों के सहारे उसने अपना जीवन काटने की सौगध्ं खा ली थी। चांदनी के सिर और हाथ की कलाई से खून बह रहा था। खून बहने का मुख्य कारण, उस लड़की के हाथ में पहनी हुई सोने की वह मोटी चूड़ी थी जो दुर्घटना के समय किसी प्रकार उसके शरीर में जा घुसी थी। सूरज ने किसी तरह से चांदनी को संभाला। उसके हाथ की सोने की चूड़ी को काटकर अलग किया और उस चूड़ी को अपनी पेंट की जेब में रख लिया। फिर किसी प्रकार से वह उसको शीघ्र ही अस्पताल ले गया। अस्पताल के आपात्कालीन कक्ष में उसने चांदनी को भरती कराया, और शीघ्र ही अपने काम पर चला गया। यह सोचकर कि वह दूसरे दिन जाकर चांदनी से मिल भी लेगा और उसकी सोने की चूड़ी भी वापस कर देगा। मगर जब वह काम पर गया तो उसे पता चला कि उसे आज ही दूसरे शहर अपने कार्यालय के काम से जाना होगा, क्योंकि उसके बॉस किसी इमरजेंसी के कारण नहीं जा सकते हैं। सूरज को जाना पड़ा। दूसरे दिन जब वह लौटकर आया तो उसने सोचा था कि कार्यालय में अपनी हाजिरी लगाकर, और बॉस से कहकर वह कुछ देर के लिये अस्पताल चला जायेगा और चांदनी को भी देख आयेगा। परन्तु जाने से पहले ही उसके बॉस केनन स्टीमर ने उसे अपने कार्यालय में बुलाया। उसे बैठाया, चाय मंगवाई और अपने सिर को पकड़ते हुये सूरज से बोले कि, ‘मिस्टर सूरज, पता नहीं क्यों मैं आप पर बहुत विश्वास करता हूं। आपको अपने ही परिवार का एक नेक इंसान समझने लगा हूं। इसीलिये आपको बताकर खुद को हल्का कर लेना चाहता हूं। कल एक बहुत ही विशेष घटना मेरे जीवन में हुई है। मैं जिस लड़की से विवाह करने जा रहा हूं, या यूं समझ लीजिये कि जिससे एक प्रकार से विवाह की बात पक्की हो चुकी है, वह कल अपनी कार की दुर्घटना में मरते-मरते बची है। वह तो कोई भला इंसान समय पर आ गया जिसने उसको समय पर अस्पताल पहुंचा दिया था, वरना तो मेरी मंगेतर की जान बचनी बहुत ही मुश्किल थी। मैंने इसी एक ख़ास काम से आपको बुलाया है कि, जिस भले और नेक इंसान ने मेरी होने वाली पत्नि की जान बचाई है, मैं उसको अपनी तरफ से पचास हजार रूपयों का विशेष इनाम देना चाहता हूं। आप जाकर मेरी मंगेतर की इस तस्वीर के साथ अखबार में विज्ञापन दे दीजिये, कि वह भला इंसान मेरी मंगेतर की सोने की दूसरी चूड़ी के साथ मुझसे या फिर मेरी मंगेतर से मिले।’ कहते हुये केनन स्टीमर ने सूरज को चांदनी की तस्वीर दिखाई तो सूरज के हाथों से रहे-बचे आस के तोते भी उड़ गये। किस्मत ने कितना बेहूदा मजाक उसके साथ किया था। वर्षों बाद चांदनी उसे वापस मिली भी तो इस अनोखे अंदाज में कि ना तो वह हंस सकता था और ना ही रो सकता था? मन ही मन अपने मुकद्दर की लकीरों को कोसता हुआ सूरज कार्यालय से उठ आया। साथ ही चांदनी से दुबारा मिलने की उसकी इच्छा भी अपने आप ही किसी कब्र पर पड़ी हुई मिट्टी के समान, बारिश पड़ते ही सदा के लिये दब गई। फिर एक तरफ सूरज अपने आप में ही जलने लगा, तो दूसरी तरफ चांदनी का दिल खुद-ब-खुद ही उस अनजान युवक के प्रति अपार श्रदधा से तो भरा ही, साथ ही उसकी अनजानी छवि भी उसके दिल में एक विशेष महत्वपूर्ण स्थान बनाकर सुरक्षित हो गई। होश में आने के पश्चात डाक्टरों ने उसे यह तो बता दिया था कि कोई लंबा, दुबला सा बेहद गंभीर युवक उसको बेहोशी की हालत में अस्पताल में छोड़ गया था और दूसरे दिन फिर से आने की बात भी कह गया था कि उसके हाथ की सोने की चूड़ी जो लगभग पच्चीस हजार रूपयों की कीमत की होगी, वह स्वंय ही उसको अपने हाथ से वापस करेगा। लेकिन वह युवक फिर कभी भी वापस नहीं आया था। उसके न आने का कारण क्या हो सकता था? चांदनी बहुत सोचने के बाद भी कुछ निर्णय नहीं ले सकी थी। यदि उस युवक को चूड़ी का कोई लालच आ गया हो, तौभी यह बात मानने योग्य नहीं थी। वह यदि चाहता तो उसके हाथ की दूसरी चूड़ी, गले की सोने की चेन, कीमती घड़ी और पर्स में से नगदी आदि सब कुछ ले सकता था। मगर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया था। इसके साथ ही उसके मंगेतर ने उस युवक के लिये पचास हजार रूपयों का इनाम भी घोषित कर दिया था पर, इसके बाबजूद भी उस युवक ने कभी भी अपनी शक्ल तक नहीं दिखाई थी? चांदनी दिन-रात इसी तरह से सोचती रहती थी। सोचती थी और अपने आपको परेशान किये रहती थी। उसकी परेशानी का जो मुख्य कारण था कि अनजाने में ही एक अपरिचित और अनदेखा युवक उसके दिल के द्वार पर दस्तकें देने लगा था। वह कौन हो सकता है? कैसा भी कोई क्यों न हो, इतना सब कुछ होने के बाद, कोई भी क्यों न होता, कम से कम एक बार उससे मिलने तो आता ही? चांदनी के दिल की हसरत, उस अनजान युवक से मिलने और देखने की ख्वाइश, उसके दिल में ही खुदक-खुदक कर शांत हो गई। ना ही उसकी चूड़ी वापस आई और ना ही वह अनजान युवक उसको कभी भी देखने आ सका। इंतजार और उस युवक को एक बार देखने की ललक में चांदनी के दस महिने और समाप्त हो गये। उसके विवाह का समय आया तो सूरज के बॉस की तरफ से सूरज को भी निमंत्रण दिया गया। सूरज, जो अब तक चांदनी के बारे में सोच-सोच कर खुद ही जल कर ख़ाक हो चुका था, वह किसी से क्या कहता? किससे अपने दिल की दास्तां सुनाता फिरता? उसकी दशा तो उसके गले में अटके हुये मछली के उस कांटे के समान हो चुकी थी कि जिसे ना तो वह बाहर ही निकाल सकता था और ना ही निगल सकता था। एक तरफ उसका वह बॉस केनन स्टीमर था कि जिसके एहसानों की वह कभी भी नमकहरामी नहीं कर सकता था और दूसरी तरफ उसका वह प्यार था कि जिसकी सारी बाजियां जीतने के पश्चात भी उसको छूने का उसे अब कोई अधिकार नहीं था। सूरज डूबने के बाद रात आती है। रात में केवल चांदनी दिखाई देती है। वह चांदनी कि जिस पर सूरज का कोई भी अधिकार नहीं होता है। सूरज जानता था कि उसने चांदनी को फिर एक बार हमेशा के लिये खो दिया था। पहली बार अपनी कमज़ोरियों और कमियों के कारण और दूसरी बार फ़र्ज़ और कर्तव्य की वेदी पर स्वाहा होने के कारण? जीवन की पिछली घटनाओं को दोहराते हुये चांदनी की आंखें फिर से भर आईं। कितना बुरा उसके नसीब का हश्र हुआ है। अब किस मुंह से वह सूरज के सामने आ सकेगी? सूरज ने अपने एक ही पग में प्यार की सारी रस्में जीत लीं थीं, और एक वह है जो अभी तक कस्में-वादों के गुणा-भाग में उलझी रही थी। तभी चांदनी के पति केनन स्टीमर ने घर में कदम रखा और आते ही निराश मन से थका हुआ सा सोफे पर धंस गया। चांदनी ने अपने पति को देखा, उसका उतरा हुआ सा मुंह देखा, फिर फ्रिज से ठंडा पानी का गिलास देते हुये बोली, ‘आपकी तबियत तो ठीक है न?’ ‘हां, मैं बिल्कुल ठीक हूं। लेकिन मेरी एक बात समझ में नहीं आ सकी।’ ‘कौन सी बात?’ चांदनी ने आश्चर्य से पूछा तो उसके पति ने उसको बताया। वह बोला, ‘मेरा एकाऊटेंट सूरज ज्योति प्रकाश; पता नहीं उसको मुझसे क्या तकलीफ हुई कि वह अचानक से, मुझसे मिले बगैर ही, मेरी मेज पर अपना रेज़ीनेशन रख कर, अपनी नौकरी छोड़ कर चला गया है।’ ‘?’ चांदनी के सिर पर अचानक ही पहाड़ गिर पड़ा। वह कुछ भी नहीं बोली। फिर कहती भी क्या। वह जानती थी कि उसके सिर पर सदा चमकने वाला सूरज अब सदा के लिये डूब चुका है। वह सूरज जो अपनी मर्जी से, उसकी मर्जी के बगैर ही, उसके जीवन में रोशनी भरने की तमाम कोशिशें करता रहा था और जिसकी उसने कभी भी कोई कद्र नहीं की थी, जाते-जाते भी, डूबने से पहले ही उसके दिल में वह रश्मि छोड़ गया है कि जिसके प्रकाश में वह हमेशा उसका अक्श देखती रहेगी। मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

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Hindi Info भारत के 5 सबसे अनूठे गांव ये है

ये है भारत के 5 सबसे अनूठे गांव, नंबर 1 में तो है अपना संविधान. नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, आज हम आपको भारत के 5 सबसे अनोखे गांव के बारे में बताने वाले हैं जो अपने आप में अलग ही देश-विदेश में पहचान रखते हैं, तो चलिए आज की चर्चा शुरू करते हैं। 5. पिपलांत्री यह भारत का सबसे विकसित गांव के तौर पर जाना जाता है। इस गांव के विकास को डेनमार्क देश की किताबों में भी पढ़ाया जाता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारत के अधिकतर लोग इस गांव के बारे में नहीं जानते हैं। यह गांव राजस्थान के उदयपुर से 50 किलोमीटर दूर है और इस गांव की जनसंख्या करीब 1500 लोगों की है। इस गांव में पानी, पेड़ और बेटी बचाने के लिए देशभर में सबसे शानदार उदाहरण पेश किया है। इस गांव में इजरायल तकनीक पर आधारित कई प्रकार हाईटेक खेती की जाती है। लड़कियों के जन्म पर इस गांव में 111 पेड़ लगाने होते हैं और इनकी शादी का सारा खर्च पूरा गांव मिलकर उठाता है। 4. मावल्यान्नॉंग इस गांव को एशिया का सबसे स्वच्छ गांव की उपाधि मिली हुई है। यह गांव स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने से कई सालों पहले स्वच्छता के मामले में अव्वल रहा है। यह गांव भगवान का बगीचे के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह गांव भारत-बांग्लादेश के बॉर्डर पर मेघालय राज्य में स्थित है। आपको अपनी जिंदगी में एक बार इस गांव में जरूर जाकर आना चाहिए। 3. कोडिन्ही केरल में स्थित यह गांव जुड़वाँ बच्चों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। आपको यहां पर हर घर में एक जुड़वाँ बच्चा जरूर मिल जाएगा। यहां जुड़वाँ बच्चा पैदा होने की क्या वजह है, अभी तक कोई भी असली कारण नहीं खोज पाया है। आपको यहां पर नवजात शिशु लेकर 60 साल के बुड्ढे तक का डबल रोल मिल जाएगा। यह गांव वाले इन जुड़वाँ बच्चों की वजह से कितने कंफ्यूज होते होंगे यह तो अब बस ऊपरवाला ही जाने। 2. करचोंड आज भी भारत में अंतरजातीय विवाह या फिर शादी से पहले लड़की से मिलने की वजह कितनी ही समस्या और लड़ाई दंगे हो जाते हैं। भारतीय न्यायालय ने हाल ही में लोगों को लव इन रिलेशनशिप में रहने के अधिकार प्रदान किए हैं लेकिन यह गांव इस मामले में हजारों साल पहले से ही आगे हैं। गुजरात के सेलवास से 30 किलोमीटर दूर स्थित 3 हजार आदिवासी लोगों के इस गांव में आप बेरोकटोक किसी भी लड़की के साथ लव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं। अक्सर लोगों की गांव के प्रति गलत धारणाएं ही रहती है लेकिन यह गांव शहर से भी आगे है। 1. मलाणा हिमाचल प्रदेश के मनाली शहर से 70 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव अपने आप में कई खूबियों से भरा हुआ है। अगर आपको इस गांव की पहली खूबी बताई जाए तो इस गांव में कनाशी भाषा बोली जाती है जो केवल विश्व में केवल इसी गांव के लोग जानते हैं और यह इसे ना ही किसी बाहरी लोगों को सिखाते हैं। दूसरी बात इस गांव में मलाणा क्रीम मिलती है जिसे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भांग के तौर पर जानी जाती है। इस गांव के लोग खुद को सिकंदर का वंशज मानते हैं और यह दुनिया का सबसे पुरानी लोकशाही गांव है। इस गांव में खुद का संविधान और संसद है जिसमें ये निचले सदन को कनिष्थाँग और उच्च सदन को जयेशथाँग कहते है। गांव में साल भर भीड़ रहती है लेकिन यहां के लोग अपने ही मस्ती में रहते हैं। खैर, यह थे भारत के कुछ अनूठे गांव, अगर आपके गांव या आसपास गांव में भी कुछ अनूठी बात है उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Story क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी

क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी? नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, गुजरात में कई ऐसे खूबसूरत पर्यटक स्थल हैं, जिसे देखने का मोह लोग छोड़ नहीं पाते। इन्हीं पर्यटक स्थलों में एक बेहद दिलचस्प जगह है, रानी की बावड़ी, जिसे रानी की वाव का नाम भी दिया गया है। इतिहास में पानी के कुंड को बावली कहा जाता था, इसीलिए इसका नाम रानी की बावड़ी रखा गया। सरस्वती नदी के मुहाने पर बसे पाटन में यह खूबसूरत कला का नमूना कई सदियों से खड़ा हुआ है। गुजरात के पाटन को इतिहास में अन्हिलपुर के नाम से जाना जाता था जो गुजरात की राजधानी हुआ करती थी। यही मौजूद है वास्तुकला और ऐतिहासिक सुंदरता का खूबसूरत नमूना। आइये जानते हैं इस बावड़ी के बारे में दिलचस्प बातें। क्यों कहा जाता है इसे रानी की बावड़ी? यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है जैसा कि आप सभी जानते हैं भारत में कई ऐतिहासिक स्थल पुराने राजाओं द्वारा बनवाए गए हैं। असल में रानी की बावड़ी सोलंकी राज के राजा भीमदेव की पहली पत्नी रानी उदयामति ने सन 1063 में बनवाई थी। यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है। क्योंकि इसका निर्माण रानी ने करवाया था, इसीलिए इसे रानी की बावड़ी का नाम दिया गया है। आम तौर पर बावड़ियां एक ही तरह से बनाई जाती है, लेकिन इस कुंड को मंदिर का रूप दिया गया, जिसमें सात अलग-अलग मंज़िलें बनी हुई है। इसके चारों ओर खूबसूरत नक्काशी और पौराणिक और धार्मिक चित्रों को उकेरा गया है। इन शैलियों में सोलंकी वंश की कला को दर्शाया गया है, जो दिखने में बेहद खूबसूरत दिखाई देती है। लंबी लंबी सीढ़ियां और बीच में पानी का कुंड बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। चमत्कारी पानी की बावड़ी सुरंग के साथ बावड़ी आपको जानकर हैरानी होगी कि हर ऐतिहासिक स्मारक का एक रहस्य भी होता है। ऐसा ही रानी की वाव के साथ भी है। इसकी अंतिम सीढ़ी पर बना हुआ है एक ख़ास दरवाज़ा, जहां से 30 मीटर लंबी सुरंग बनाई गई है, जो यहां से सीधी सिद्धपुर गांव में जाकर खुलती है। यह गांव पाटन के पास ही बसा हुआ है। इस पानी को पीने से मौसमी बुखार और कई बीमारियां ठीक हो जाया करती थी उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Info अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया

अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया गया जिसे आप नही जानते, जानकर होगी हैरानी नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, दोस्तों राजा अकबर को भारतीय इतिहास का एक महान राजा माना जाता है राजा अकबर ने अपने शासनकाल में काफी ज्यादा सामाजिक कार्य किया था जिसके कारण राजा अकबर को एक अच्छा शासक माना जाता है राजा अकबर के शासन काल में प्रजा काफी ज्यादा सुखी हुआ करती थी। अकबर ने अपने शासनकाल में सभी धर्मों का सम्मान किया था इसके अलावा अकबर के शासनकाल में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहता था। अकबर ने अपने शासनकाल में कई बड़े-बड़े कार्य करवाए थे। अकबर के शासनकाल में भारत ने काफी ज्यादा तरक्की की थी लेकिन दोस्तों क्या आप लोगों को मालूम है कि जब राजा अकबर इतना बड़ा महान व्यक्ति था तो उसकी जब मृत्यु हुई तब उसके सब को राजकीय सम्मान के साथ क्यों नहीं जलाया गया। आज हम आप लोगों को बताने वाले हैं कि आखिर राजा अकबर की मृत्यु के बाद उसके शव के साथ क्या किया गया था। दोस्तों जब राजा अकबर की मृत्यु हुई थी उनके शव को बिना किसी राजकीय सम्मान और बिना अंतिम संस्कार के दुर्ग के पीछे दीवार तोड़कर सिकंदरा में दफना दिया। इसका कारण यह था कि उस समय अफगान के लोग मुगल साम्राज्य पर हावी हो रहे थे जिसके कारण मुगल साम्राज्य के लोग चाहते थे कि राजा अकबर की मृत्यु के बारे में अफगान लोगों को मालूम ना हो। उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Real Hindi Stories प्यार या संस्कार

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, अदिति ने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद बेंगलुरु महानगर के एक नामीगिरमी कालेज में मैनेजमैंट कोर्स में ऐडमिशन लिया तो मानो उस के सपनों को पंख लग गए. उस के जीवन की सोच से ले कर संस्कार तथा सपनो से ले कर लाइफस्टाइल सभी तेजी से बदल गए. अदिति के जीवन में कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीकठाक चलता रहा, लेकिन अचानक उस के जीवन में उस के ही कालेज के एक छात्र प्रतीक की दस्तक के कारण जो मोड़ आया वह उस पहले प्यार के बवंडर से खुद को सुरक्षित नहीं रख पाई. अदिति बहुत जल्दी प्रतीक के प्यार के मोहपाश में इस तरह जकड़ गई मानो वह पहले कभी उस से अलग और अनजान नहीं थी. जवानी की दहलीज पर पहले प्यार की अनूठी कशिश में अदिति अपने जीवन के बीते दिनों तथा परिवार की चाहतों को पूरी तरह से विस्मृत कर चुकी थी. प्रतीक के प्यार में सुधबुध खो बैठी अदिति अपने सब से खूबसूरत ख्वाब के जिस रास्ते पर चल पड़ी वहां से पीछे मुड़ने का कोईर् रास्ता न तो उसे सूझा और न ही वह उस के लिए तैयार थी. गरमी की छुट्टी में जब अदिति अपने घर वापस आई तो उस के बदले हावभाव देख कर उस की अनुभवी मां को बेटी के बहके पांवों की चाल समझते देर नहीं लगी. जल्दी ही छिपे प्यार की कहानी किसी आईने की तरह बिलकुल साफ हो गई और मां को पहली बार अपनी गुडि़या सरीखी मासूम बेटी अचानक ही बहुत बड़ी लगने लगी. अदिति ने अपनी मां से प्रतीक से शादी के लिए शुरू में तो काफी विनती की, लेकिन मां के इनकार को देखते हुए वह जिद पर अड़ गई. अदिति के पिता तो उसी वक्त गुजर गए थे जब अदिति ठीक से चलना भी नहीं सीख पाई थी. मां और बेटी के अलावा उस छोटे से संसार में प्रतीक के प्रवेश की तैयारी के लिए एक बड़ा द्वंद्व और दुविधा का जो माहौल तैयार हो गया था वह सब के लिए दुखदायी था, जिस की मद्घिम लौ में मां को अपनी बेटी के चिरपोषित सपनों की दुनिया जल जाने का मंजर साफ नजर आ रहा था. ‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो? मैं प्रतीक से सच्चा प्यार करती हूं. वह ऐसावैसा लड़का नहीं है. वह अच्छे घर से है और निहायत शरीफ है. क्या बुरा है, यदि मैं उस से शादी करना चाहती हूं,’’ अदिति ने बड़े साफ लहजे में अपनी मां को अपने विचारों से अवगत कराया. मां अपनी बेटी के इस कठोर निर्णय से काफी आहत हुईं लेकिन खुद को संयमित करते हुए अदिति को अपने सांस्कारिक मूल्यों तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों का एहसास कराने की काफी कोशिश करती हुई बोलीं, ‘‘बेटी, मैं सबकुछ समझती हूं, लेकिन अपने भी कुछ संस्कार होते हैं. तुम्हारे पापा ने तुम्हारे लिए क्या सपने संजो रखे थे लेकिन तुम उन सपनों का इतनी जल्दी गला घोंट दोगी, इस बारे में तो मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था. अपनी जिद छोड़ो और अभी अपने भविष्य को संवारो. प्यार मुहब्बत और शादी के लिए अभी बहुत वक्त पड़ा है.’’ ‘‘मां, आप समझती नहीं हैं, प्यार संस्कार नहीं देखता, यह तो जीवन में देखे गए सपनों का प्रश्न होता है. मैं ने प्रतीक के साथ जीवन के न जाने कितने खूबसूरत सपने देखे हैं, लेकिन मैं यह भूल गई थी कि मेरे इंद्रधनुषी सपनों के पंख इतनी बेरहमी से कुतर दिए जाएंगे. आखिर, तुम्हें मेरे सपनों के टूटने से क्या?’’ ‘‘बेटी, सच पूछो तो प्रतीक के साथ तुम्हारा प्यार केवल तुम्हारे जीवन के लिए नहीं है. जीवन के रंगीन सपनों के दिलकश पंख पर बेतहाशा उड़ने की जिद में अपनों को लगे जख्म और दर्द के बारे में क्या तुम ने कभी सोचा है? प्यार का नाम केवल अपने सपनों को साकार होते देखनाभर नहीं है. वह सपना सपना ही क्या जो अपनों के दर्द की दास्तान की सीढ़ी पर चढ़ कर साकार किया गया हो. ‘‘आज तुम्हें मेरी बातें बचकानी लगती होंगी, लेकिन मेरी मानो जब कल तुम भी मेरी जगह पर आओगी और तुम्हारे अपने ही इस तरह की नासमझी की बातों को मनवाने के लिए तुम से जिद करेंगे तो तुम्हें पता चलेगा कि दिल में कितनी पीड़ा होती है. मन में अपनों द्वारा दिए गए क्लेश का शूल कितना चुभता है.’’ अदिति अपनी मां के मुंह से इस कड़वी सचाई को सुन कर थोड़ी देर के लिए सन्न रह गई. उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर अनजाने ही हाथ रख दिया हो. उस के जेहन में अनायास ही बचपन से ले कर अब तक अपनी मां द्वारा उस के लालनपालन के साथसाथ पढ़ाई के खर्चे के लिए संघर्ष करने की कहानी का हर दृश्य किसी सिनेमा की रील की भांति दौड़ता चला गया. अनायास ही उस की आंखें भर आईं. मन पर भ्रम और दुविधा की लंबे अरसे से पड़ी धूल की परत साफ हो चुकी थी और सबकुछ किसी शीशे की तरह साफसाफ प्रतीत होने लगा था. लेकिन बीते हुए कल के उस दर्र्द के आंसू को अपनी मां से छिपाते हुए वह भाग कर अपने कमरे में चली गई. अपनी मां की दिल को छू लेने वाली बातों ने अदिति को मानो एक गहरी नींद से जगा दिया हो. छुट्टियों के बाद अदिति अपने कालेज वापस आ गई और जीवन फिर परिवर्तन के एक नए दौर से गुजरने लगा. कालेज वापस लौटने के बाद अदिति गुमसुम रहने लगी. प्रतीक से भी वह कम ही बातें करती थी, बल्कि उस ने उसे शादी के बारे में अपनी मां की मरजी से भी अवगत करा दिया और इस तरह मंजिल तक पहुंचने से पहले ही दोनों की राहें अलग अलग हो गईं. कालेज के अंतिम वर्ष में कैंपस सिलैक्शन में प्रतीक को किसी मल्टीनैशनल कंपनी में ट्रेनी मैनेजर के रूप में यूरोप का असाइनमैंट मिला और अदिति ने किसी दूसरी मल्टीनैशनल कंपनी में क्वालिटी कंट्रोल ऐग्जीक्यूटिव के रूप में अपनी प्लेसमैंट की जगह बेंगलुरु को ही चुन लिया. अदिति अपनी मां के साथ इस मैट्रोपोलिटन सिटी में रह कर जीवन गुजारने लगी. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. इसी बीच कंपनी ने अदिति को 1 वर्ष के फौरेन असाइनमैंट पर आस्ट्रेलिया भेजने का निर्णय लिया. अदिति अपनी मां के साथ जब आस्टे्रलिया के सिडनी शहर आई तो संयोग से वहीं पर एक दिन किसी शौपिंग मौल में उस की प्रतीक से मुलाकात हो गई. अदिति के लिए यह एक सुखद लमहा था, जिस की नरम कशिश में वर्षों पूर्व के संबंधों की यादें बड़ी तेजी से ताजी हो गईं. लेकिन भविष्य में इस संबंध के मुकम्मल न होने के भय ने उस के पैर वापस खींच लिए. प्रतीक अपने क्वार्टर में अकेला रहता था और अकसर हर रोज शाम के वक्त वह अदिति के घर पर आ जाया करता था. मां को भी अपने घर में अपने देश के एक परिचित के रूप में प्रतीक का आना जाना अच्छा लगता था, क्योंकि परदेश में उस के अलावा सुख दुख बांटने वाला और कोई भी तो नहीं था. अचानक एक दिन औफिस से घर लौटते वक्त अदिति की औफिस कार की किसी प्राइवेट कार के साथ टक्कर हो गई और अदिति को सिर में काफी चोट आई. महीनेभर तक अदिति हौस्पिटल में ऐडमिट रही और इस दौरान उस का और उस की मां का ध्यान रखने वाला प्रतीक के अलावा और कोई नहीं था. प्रतीक ने मुसीबत की इस घड़ी में अदिति और उस की मां का भरपूर ध्यान रखा और इसी बीच अदिति और प्रतीक फिर से कब एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि उन्हें इस का पता ही नहीं चला. अदिति का यूरोप असाइनमैंट खत्म होने वाला था और उसे अब अपने देश वापस आना था. अदिति और उस की मां को छोड़ने के लिए प्रतीक भी बेंगलुरु आया था. प्रतीक के सेवाभाव से अदिति की मां अभिभूत हो गई थीं. प्रतीक सिडनी वापस जाने की पूर्व संध्या पर अपने मम्मीडैडी के साथ अदिति से मुलाकात करने आया था. अदिति का व्यवहार तथा शालीनता देख कर प्रतीक के पेरैंट्स काफी खुश हुए. प्रतीक की अगले दिन फ्लाइट थी. एयरपोर्ट पर बोर्डिंग के समय जब अदिति का फोन आया तो उस के दिलोदिमाग में एक अजीब हलचल मच गई. पुराने प्यार की सुखद और नरम बयार में प्रतीक के मन का कोनाकोना सिहर उठा. प्रतीक ने अपनी फ्लाइट कैंसिल करवा ली. उस ने अपनी कंपनी को बेंगलुरु में ही उसे शिफ्ट करने के लिए रिक्वैस्ट भेज दी जो कुछ दिनों में अपू्रव भी हो गई. अदिति की मां प्रतीक के इस फैसले से काफी प्रभावित हुईं. अदिति हमेशा के लिए अब प्रतीक की हो गई थी और वह मां के साथ ही बेंगलुरु में रहने लगी थी. प्रतीक अपनी खुली आंखों से अपने सपने को अपनी बांहों में पा कर खुशी से फूले नहीं समा रहा था. अदिति के पांव भी जमीं पर नहीं पड़ रहे थे. उसे आज जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि धरती की तरह सपनों की दुनिया भी गोल होती है और सितारे भले ही टूटते हों, लेकिन यदि विश्वास मजबूत हो तो सपने कभी नहीं टूटते. उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Real Stories भोले भक्त की भक्ति

एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था। एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम में आया और बोला कि बाबा आप सब का ध्यान रखते है, मेरा इस दुनिया मेँ कोई नही है तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम में रह सकता हूँ ? बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है ? उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ। तब संत ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना। रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा। उन संत की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ रुकेगा ? संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे.! क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे। अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था। बालक रामदास संत के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ। संत ने कहा ठीक हैँ पर तुझे काम करना पड़ेगा आश्रम की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा मे कोई कमी मत रखना। रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप बता दिजिये के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है ? फिर मैँ कर दूंगा। संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार की झाँकी थी। श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी थे. संत ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है सब सिखा दिया। रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योँकि अगर रिश्ता पता चल जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा। उन संत ने बालक रामदास कहा की तू कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज से ये राम जी और सीता जी तेरे माता-पिता हैँ। रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है ? संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है। रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये। आज सेवा का पहला दिन था, रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया ,आश्रम की साफ़ सफाई की,और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया। रामदास ने श्री राम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा। रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर खायेंगे. पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी। तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिश्ता बना हैँ तो शरमा रहेँ होँगे। रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था। अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ ! और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और मैँ भूख से मर जाऊँगा..! इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा। रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब भगवान राम जी हनुमान जी को कहते हैँ हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ। हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो? रामदास कहता हैँ आप कौन ? हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ? रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहा बोल रहा था की खाना खा लो तब आये नहीँ अब क्योँ आ गये ? तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे। फिर राम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी , हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैँ। इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता। सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा घर मैँ ५ लोग हैं,सारा काम में ही अकेला करता हुँ ,बाकी लोग तो दिन भर घर में आराम करते है.मेरे माँ, बाप ,चाचा ,भाई तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ. मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा। रामदास मंदिर जाता हैँ ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।राम जी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ ? रामदास कहता हैँ की घर में मैं सबसे छोटा हुँ ,और मैं ही सब काम करता हुँ।अब से मैँ अकेले काम नहीँ करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा,आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा। राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है?रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले. और चाचा जी (लक्ष्मणजी) आप घर की साफ़ सफाई करियेगा. भैय्या जी (हनुमान जी)शरीर से मज़बूत हैं ,जाकर जंगल से लकड़ियाँ लाइयेंगे. पिता जी (रामजी) आप बाज़ार से राशन लाइए और घर पर बैठकर पत्तल बनाओँगे। सबने कहा ठीक हैँ।मैंने बहुत दिन अकेले सब काम किया अब मैं आराम करूँगा. अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ। एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो देखा आश्रम तो शीशे जैसा चमक रहा है, वो बहुत प्रसन्न हुए.मंदिर मेँ गये और देखा की मंदिर से प्रतिमाऐँ गायब हैँ. संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीँ दी ? संत ने रामदास को बुलाया और पूछा भगवान कहा गये रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता हनुमान भैया जंगल लकड़ी लाने गए होंगे,लखन चाचा झाड़ू पोछा कर रहे होंगे,पिताजी राम पत्तल बन रहे होंगे माता सीता रसोई मेँ काम कर रही होंगी. संत बोले ये क्या बोल रहा ? रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जब से आप गये हैँ ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ। वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ राम जी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये। संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तू धन्य हैँ। और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये…! रामदास जैसे भोले,निश्छल भक्तो की भक्ति से विवश होकर भगवान को भी साधारण मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने आना पड़ता है. जय श्री राम उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.