तेरे शहर में - रोमांचक कहानी - Story - Stories

तेर

‘नवरोश को जब अपने काम के सिलसिले में रत्नागिरि जाने का अवसर मिला तो उसे यह जानकर अत्यन्त प्रसन्नताहुई कि सारे शहर के लोग उसे शक्ल से ना जानकर उसके नाम से बख़ूबी जानते हैं, पर वहां पर जो उसे बहुत करीबसे जानता था, उसके पास कहने के लिये शब्द ही नहीं थे।’ अचानक से आकाश में एक तिहाई चांद के बदन को जब एक आवारा लावारिस सी बदली ने आकर अपने अंक में छुपा लिया तो पल भर में सारा आलम मटमैली चांदनी के रंग में फीका पड़ गया। इस प्रकार कि बढ़ती हुई रात की निस्तब्धता में भी हल्के से भय की एक रेखा भी मन ही मन कांप गई। दूर नदी के जल की लहरें हल्की हवाओं की कंपन के कारण किसी बार­बार पलटती हुई मछली के समान चमक रही थीं और शहर की विद्युत बत्तियों का प्रकाश पानी के जल में मचलती हुई लहरों के साथ तरह­-तरह के रंगों की अबरी बना रहा था। ख़तरे के निशान को छूती हुई नदी के बाढ़ के पानी की धारायें जब भी अपने पूरे बल के साथ पुल की दीवारों पर टक्करें मारती थीं तो पुल की मुंडेर पर बैठे हुये नवरोश का शरीर भी हिल जाता था। पुल पर आती­जाती मोटर­गाडि़यों और मनुष्यों के भरपूर आवागमन का शोर था, परन्तु नवरोश को इन सारी बातों का कुछ भी ध्यान नहीं था। यूं भी मनुष्य जब अपने विचारों और सोचों में लीन हो जाता है तो उसे अपने आस-­पास की किसी भी बात का कुछ भी होश नहीं रहता है। यही हाल नवरोश का भी था। कल तक उसके सारे कार्यक्रम समाप्त हो गये थे और आने वाले कल की सुबह में उसे वापस लौटना भी था। मिलने­-जुलने वालों से भी उसे फुरसत मिल चुकी थी। लेकिन जब उसका मन होटल में नहीं लगा तो वह किसी को भी बताये बगैर चुपचाप बहुत शाम से ही यहां आकर बैठ गया था। और तब से बैठे­-बैठे बहुत कुछ सोचे जा रहा था। अतीत की बहुत सारी बीती हुई बातों को याद किये जा रहा था। वैसे उसे इन सारी बातों को फिर से दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं होती यदि इस शहर में तमाम लोगों की भीड़ में यदि अचानक से उसे उल्का नहीं मिलती . . .? . . .बैठे हुये दूर क्षितिज के किनारों को देखते हुये, पीछे से आकर अचानक ही किन्हीं मुलायम हाथों और पतली हथेलियों ने नवरोश की आंखें बंदकर लीं तो वह सहज ही चौंका तो पर आश्चर्य नहीं कर सका। उसे समझते देर नहीं लगी कि किसी ने उससे खेल के साथ छेड़खानी की है। अब उसे बगैर हाथों को हटाये और बिना अपनी आंखें खोले हुये उसकी आंखें बंद करनेवाले का नाम बताना था, तभी उसकी जीत संभव थी। उसके नथुनों में नाख़ूनों पर नई लगी हुई लाली की खुशबू भर रही थी। नवरोश आंखें बंद करनेवाले को अपने स्पर्श से पहचानने की चेष्टा करते हुये अपने दोनों हाथों को उसकी हथेलियों को छूते हुये उसकी कोहनी की तरफ ले जाने लगा। छूते­-छूते ज्योंही उसके हाथ कोहनी से ऊपर बगलों तक जाने लगे तो फौरन ही उसकी आंखें बंद करनेवाले ने अपने हाथ पीछे खींच लिये और फिर जैसे चिढ़ते हुये कहा कि, ‘बदतमीज़! पहचानकर बताया तो गया नहीं, ऊपर से शैतानी करने लगे?’ ‘?’ नवरोश ने अपनी आंखें मलते हुये देखा तो सामने उल्का खड़ी हुई मुस्करा रही थी। इतने दिनों तक एक ही कक्षा में साथ पढ़ते हुये उल्का की नवरोश के प्रति यह पहली शरारत थी। उसके पश्चात कब उन दोनों की कॉलेज की पढ़ाई समाप्त हुई और कितना शीघ्र ही वे दोनों उम्र के उस मोड़ पर पहुंच गये जहां पर आकर उन्हें यह महसूस होने लगा कि अब उन्हें एक दूसरे को यह बता देना चाहिये कि चाहत की यह लुका­छुपी बहुत दिनों तक नहीं चल सकेगी। वे दोनों मन ही मन सारी दुनियां से कहीं दूर अपना अलग घरौंदा बसाने के सपने देखने लगे हैं। दोनों के मध्य का यह समय और फासला इतनी जल्दी समाप्त हो गया कि किसी को कुछ एहसास ही नहीं हो सका। यदि कुछ महसूस हुआ भी तो केवल इतना ही कि वे दोनों आपस में एक­दूसरे को इसकदर चाहने लगे हैं कि उसका बयान शब्दों में नहीं कर सकते हैं। तब इन्हीं दिनों एक दिन नवरोश ने उल्का से अपने मन की बात कही। बड़े दिन की पच्चीस तारीख की रात को चर्च के अन्दर मोम बत्तियों को जलाने के पश्चात नवरोश उल्का का हाथ पकड़े हुये काफी दूर एकान्त में आ गया। जाड़े की ठंडी रात थी। चर्च विला की बस्ती के सारे मकानों में यीशु मसीह के जन्म के उपलक्ष्य में मोमबत्तियों का प्रकाश झिलमिला रहा था। आकाश में चन्दमा की गैर­मौजूदगी के बावजूद भी छोटी­छोटी तारिकायें सर्दी की इस रात के फैले हुये अंधकार को मिटाने का एक असफल प्रयत्न कर रही थीं। तभी नवरोश ने अपने मन की बात उल्का से कही। वह आकाश की ओर देखता हुआ बोला, ‘उल्का, यह पूरे के पूरे फैले हुये सौर्यमंडल को देख रही हो?’ ‘हां।’ ‘मैं जब भी रात की ख़ामोशी में इस आकाश की तरफ देखा करता हूं तो हमेशा ही मुझे कोई न कोई उल्का टूटती हुई नज़र आ जाती थी। और जब वह टूटती हुई नीचे धरती की तरफ गिरने लगती थी तो मैं यही मनाता था कि वह किसी भी तरह से मेरी झोली में आ जाये।’ ‘हां। लेकिन कहना क्या चाहते हो तुम?’ उल्का ने बात की गहराई को समझते हुये भी रात के अंधकार में भी नवरोश की आंखों में एक संशय से झांकते हुये पूछा। ‘यही कि आकाश से उल्का टूटकर नीचे धरती पर आती तो है, लेकिन अफसोस यही है कि वह मेरी झोली में क्यों नहीं गिरती है?’ ‘अच्छा। कहानियां लिखते-­लिखते मेरे लिये कोई ऐसी कहानी मत बना देना कि सारी जि़न्दगी उसे पढ़­-पढ़कर आंसू बहाते रहो। अगर तुम में हिम्मत है तो मेरे मामा­-पापा से खुद ही बात करो। नहीं तो अपने घर से किसी को मेरे घर भेजो।’ ‘?’ उल्का की इस बात पर नवरोश की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वह मुस्कराते हुये बोला, ‘मैंने दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन के संपादकीय विभाग में नौकरी के लिये आवेदन दिया है। वहां मुझे दो सप्ताह के पश्चात साक्षात्कार के लिये जाना है। मुझे पूरी आशा है कि यह नौकरी मुझे जरूर ही मिल जायेगी। नौकरी मिलते ही मैं अपनी मां को तुम्हारे घर जरूर भेजूंगा।’ नवरोश और उल्का की यह मुलाकात यहीं समाप्त हुई। बड़ा दिन चला गया। नया साल भी बहुत सी आशायें लाकर दिलों की धड़कनें बढ़ा गया। नवरोश को दिल्ली प्रेस में सह­-संपादक की नौकरी भी मिल गई। देखते­-देखते खुशियों के अंबार इसकदर एकत्रित हुये कि उस पर वक्त की चीलें जलस के कारण अपने पंजों को मजबूत करने लगीं। नवरोश की मां उल्का के घर उसके रिश्ते की बात करने जाती, उससे पहले ही अपनी नई नौकरी पर जाने से एक दिन पहले उल्का नवरोश के पास आई। अत्यन्त दुखी, खूब ख़ामोश और निराश, परेशान सी। नवरोश ने उल्का की यह दशा देखी तो वह एक दम से कुछ समझा तो नहीं, लेकिन उसका चेहरा अपने हाथ से ऊपर उठाते हुये उसकी आंखों में देखते हुये बोला, ‘क्यों? क्या हो गया तुम्हें अचानक से? तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ क्यों है?’ ‘?’ उल्का ने कहा तो कुछ भी नहीं। वह चुपचाप अपना सिर नवरोश के सीने पर रखकर सिसकने लगी। तब नवरोश ने उल्का का चेहरा फिर से ऊपर उठाया। उसे गौर से देखा। उसकी आंखों में झलकते हुये ढेर सारे आंसुओं की बाढ़ को देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि उसकी सारी चाहतों पर पाबन्दी लग चुकी है। फिर भी अपना सन्देह मिटाने की गरज़ से उसने उल्का से पूछ ही लिया। वह बोला, ‘अब तुम कुछ बताओगी भी या फिर . . .?’ तब उल्का नवरोश की आंखों में झांकती हुई बोली, ‘मेरी किस्मत भी बड़ी अजीब है। सारी दुनियां में एक तुम ही रह गये थे, इसकदर प्यार करने के लिये?’ ‘?’ नवरोश बोला तो कुछ नहीं, मगर वह उल्का को बड़ी गंभीरता से देखने लगा। तभी उल्का उससे दूर हटते हुये बोली, ‘मेरे मामा-­पापा ने मेरा रिश्ता रत्नागिरि में रहने वाले किसी इंजीनियर लड़के से तय कर दिया है।’ ‘और तुमने भी यह रिश्ता मंजूर कर लिया?’ नवरोश ने गंभीरता से पूछा। ‘तो मैं क्या करती? अपने मां­-बाप से क्या बगावत करूं?’ ‘नहीं। बगावत तो मुझे करनी चाहिये, अपने आपसे, जिसने बगैर आगा­-पीछा सोचे हुये उस लड़की से प्यार की आस की जो मेरे दिल की धड़कनों का बोझ भी बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। उस लड़की के लिये जिसको शायद प्यार की झूठी कसमें खाने की आदत थी? एक ऐसी कमजोर मुहब्बतों के डर-डर के अपने कदम रखनेवाली उस लड़की के लिये जो ज़रा सी मौसमी हवाओं का झोंका खाते ही अपने प्यार का विश्वास बदल बैठी?’ नवरोश के स्वर बोझिल हुये तो उल्का जैसे तड़प गई। आंखों में आंसू भरे हुये ही वह जैसे खुद को संभालने की कोशिश करते हुये नवरोश से बोली, ‘तुम मुझसे शिकायत कर रहे हो? यह जानते हुये भी कि बेटियां तो अपने मां­-बाप की इज्ज़त हुआ करती हैं?’ ‘हां। तुम ठीक ही कहती हो। मेरे प्यार का कफन तुम्हारे मामा­-पापा की इज्ज़त से बहुत हल्का है। शायद तुम्हारी आंखों में पिछले पांच सालों से अपनी तस्वीर को देखते­-देखते मैं यह सब भूल ही गया था?’ ‘अब तुम मुझे खूब तो क्या, सारी उम्र दोष देते रहना। पर तुम क्या जानो कि मैं तुम्हें कितना चाहती हूं? किसकदर प्यार किया करती हूं? मैं तुम्हारी चाहतों की कोई दुश्मन तो नहीं हूं, पर जिस पृष्ठभूमि पर मेरी परवरिश हुई है, उसके उसूलों की दासी जरूर हूं। इस दासी की मजबूरियों पर कभी अगर गंभीरता से गौर करोगे तो हो सकता है कि तुम मुझे मॉफ भी कर दो।’ ‘अच्छा। जीवन में कभी यदि मैं तुमको अचानक से मिल गया तो.. .?’ ‘तुम्हारी तरफ देखूंगी जरूर।’ ‘लेकिन पहचानोगी नहीं?’ ‘?’ उल्का चुप रह गई। वह आगे कुछ भी नहीं कह सकी। उल्का की इस बेबसी भरी चुप्पी पर नवरोश बड़ी देर तक कुछ भी नहीं बोला। काफी देर तक वे दोनों मूक ही खड़े रहे। बिल्कुल पत्थर के बुतों समान। बड़ी देर तक दोनों के मध्य ख़ामोशी एक तीसरे बजूद के समान अपना डेरा डाले रही। फिर काफी क्षणों के पश्चात नवरोश ने ही दोनों के मध्य छाई हुई चुप्पी को तोड़ा। वह बोला, ‘लोग कहा करते हैं कि टूटते हुये तारे या उल्का को देखना शुभ नहीं होता है। मैं कभी भी ऐसी बातों पर विश्वास नहीं किया करता था, पर आज विश्वास करना पड़ा है। शायद किस्मत ने हम दोनों का साथ यहीं तक लिखा था। आज के बाद मैं तुम्हारी दुनियां से कहीं बहुत दूर निकल जाऊंगा और कोशिश करूंगा कि कभी भी भूले से तुम्हारे सामने न आ सकूं, ताकि तुम मुझे देखकर अपने होनेवाले पति के महान प्यार का अपमान न कर सको।’ इसके पश्चात फिर दोनों कभी भी नहीं मिले। यहीं इसी जगह तक शायद दोनों को आना था और यहीं से सदा के लिये अलग भी हो जाना था। बाद में उल्का का विवाह धूमधाम से हो गया। उल्का ने ना तो अपने विवाह का कार्ड ही नवरोश को भेजा और ना ही वह खुद भी उसके विवाह में आया। उल्का विवाह के पश्चात अपने पति के घर चली गई। दूसरी तरफ नवरोश अपनी नौकरी के सिलसिले में अपने घर से बाहर निकला तो फिर कभी उसने मुड़ कर उस तरफ देखा भी नहीं। कभी एक बार लौटकर आया भी नहीं। और वह देखकर करता भी क्या। वापस आकर उसे अब करना भी क्या था? फिर उस शहर और स्थान से उसे अब सरोकार भी क्या हो सकता था, जहां पर समय की मौसमी हवा के एक ही झोंके से उसके प्यार-­भरे नींड़ के परखच्चे उड़ चुके थे। कितना बुरा उसके प्यार का हश्र हुआ था? सारे रास्ते एक आशा पर चलते हुये मंजिल के पास आकर ही उसके सारे सपनों पर आग बरस पड़ी थी। वह अपना दुख किससे और क्यों कहता? उल्का शादी के पश्चात अपने घर चली गई तो नवरोश ने भी किसी तरह अपने आपको समझाया। अपनी नौकरी में दिल लगाने की कोशिश की। लिखता तो वह पहले ही से आ रहा था लेकिन अब उसकी लेखनी से उसके दिल के घाव रिस­-रिसकर टपकने लगे तो उसके लेखन में एक कशिश, एक अनकहा दर्द और तड़प भी शामिल हो गई। इस प्रकार कि उसके पाठक उसे एक मर्मस्पर्शी कथाकार के रूप में बखूबी जानने और पहचानने लगे। फिर अपने लेखन के सिलसिले में जब अपनी नई पुस्तक ‘काठ का कारीगर‘ के विमोचन के अवसर पर नवरोश को रत्नागिरि में आना हुआ तो वहां पर अन्य लोगों की भीड़ में वह उल्का को देखकर चौंका तो पर साथ ही प्रसन्नता भी हुई और दुख भी। प्रसन्नता इसलिये कि एक अरसे के पश्चात उसने उल्का को देखा था। उस लड़की को फिर से पाया था जिसके प्यार के एक मात्र तमाचे ने तमाम लोगों की भीड़ में उसे एक लेखक के रूप में सुप्रसिद्ध कर दिया था। और दुख इस कारण हुआ था कि उल्का ने उसे एक लेखक के तौर पर पहचाना तो था, लेकिन जिस नवरोश को वह खो चुकी थी उसे पहचानने की वह हॉमी नहीं भर सकी थी। कितनी अजीब बात थी कि उल्का के अपने शहर में नवरोश के न जाने कितने जानने वाले थे, मगर जो उसको बहुत करीब से जानता और पहचानता था वही उससे मीलों दूर था, और उसके पास इज़हार के लिये शब्द ही नहीं थे। मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

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Hindi Info भारत के 5 सबसे अनूठे गांव ये है

ये है भारत के 5 सबसे अनूठे गांव, नंबर 1 में तो है अपना संविधान. नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, आज हम आपको भारत के 5 सबसे अनोखे गांव के बारे में बताने वाले हैं जो अपने आप में अलग ही देश-विदेश में पहचान रखते हैं, तो चलिए आज की चर्चा शुरू करते हैं। 5. पिपलांत्री यह भारत का सबसे विकसित गांव के तौर पर जाना जाता है। इस गांव के विकास को डेनमार्क देश की किताबों में भी पढ़ाया जाता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारत के अधिकतर लोग इस गांव के बारे में नहीं जानते हैं। यह गांव राजस्थान के उदयपुर से 50 किलोमीटर दूर है और इस गांव की जनसंख्या करीब 1500 लोगों की है। इस गांव में पानी, पेड़ और बेटी बचाने के लिए देशभर में सबसे शानदार उदाहरण पेश किया है। इस गांव में इजरायल तकनीक पर आधारित कई प्रकार हाईटेक खेती की जाती है। लड़कियों के जन्म पर इस गांव में 111 पेड़ लगाने होते हैं और इनकी शादी का सारा खर्च पूरा गांव मिलकर उठाता है। 4. मावल्यान्नॉंग इस गांव को एशिया का सबसे स्वच्छ गांव की उपाधि मिली हुई है। यह गांव स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने से कई सालों पहले स्वच्छता के मामले में अव्वल रहा है। यह गांव भगवान का बगीचे के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह गांव भारत-बांग्लादेश के बॉर्डर पर मेघालय राज्य में स्थित है। आपको अपनी जिंदगी में एक बार इस गांव में जरूर जाकर आना चाहिए। 3. कोडिन्ही केरल में स्थित यह गांव जुड़वाँ बच्चों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। आपको यहां पर हर घर में एक जुड़वाँ बच्चा जरूर मिल जाएगा। यहां जुड़वाँ बच्चा पैदा होने की क्या वजह है, अभी तक कोई भी असली कारण नहीं खोज पाया है। आपको यहां पर नवजात शिशु लेकर 60 साल के बुड्ढे तक का डबल रोल मिल जाएगा। यह गांव वाले इन जुड़वाँ बच्चों की वजह से कितने कंफ्यूज होते होंगे यह तो अब बस ऊपरवाला ही जाने। 2. करचोंड आज भी भारत में अंतरजातीय विवाह या फिर शादी से पहले लड़की से मिलने की वजह कितनी ही समस्या और लड़ाई दंगे हो जाते हैं। भारतीय न्यायालय ने हाल ही में लोगों को लव इन रिलेशनशिप में रहने के अधिकार प्रदान किए हैं लेकिन यह गांव इस मामले में हजारों साल पहले से ही आगे हैं। गुजरात के सेलवास से 30 किलोमीटर दूर स्थित 3 हजार आदिवासी लोगों के इस गांव में आप बेरोकटोक किसी भी लड़की के साथ लव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं। अक्सर लोगों की गांव के प्रति गलत धारणाएं ही रहती है लेकिन यह गांव शहर से भी आगे है। 1. मलाणा हिमाचल प्रदेश के मनाली शहर से 70 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव अपने आप में कई खूबियों से भरा हुआ है। अगर आपको इस गांव की पहली खूबी बताई जाए तो इस गांव में कनाशी भाषा बोली जाती है जो केवल विश्व में केवल इसी गांव के लोग जानते हैं और यह इसे ना ही किसी बाहरी लोगों को सिखाते हैं। दूसरी बात इस गांव में मलाणा क्रीम मिलती है जिसे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भांग के तौर पर जानी जाती है। इस गांव के लोग खुद को सिकंदर का वंशज मानते हैं और यह दुनिया का सबसे पुरानी लोकशाही गांव है। इस गांव में खुद का संविधान और संसद है जिसमें ये निचले सदन को कनिष्थाँग और उच्च सदन को जयेशथाँग कहते है। गांव में साल भर भीड़ रहती है लेकिन यहां के लोग अपने ही मस्ती में रहते हैं। खैर, यह थे भारत के कुछ अनूठे गांव, अगर आपके गांव या आसपास गांव में भी कुछ अनूठी बात है उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Story क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी

क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी? नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, गुजरात में कई ऐसे खूबसूरत पर्यटक स्थल हैं, जिसे देखने का मोह लोग छोड़ नहीं पाते। इन्हीं पर्यटक स्थलों में एक बेहद दिलचस्प जगह है, रानी की बावड़ी, जिसे रानी की वाव का नाम भी दिया गया है। इतिहास में पानी के कुंड को बावली कहा जाता था, इसीलिए इसका नाम रानी की बावड़ी रखा गया। सरस्वती नदी के मुहाने पर बसे पाटन में यह खूबसूरत कला का नमूना कई सदियों से खड़ा हुआ है। गुजरात के पाटन को इतिहास में अन्हिलपुर के नाम से जाना जाता था जो गुजरात की राजधानी हुआ करती थी। यही मौजूद है वास्तुकला और ऐतिहासिक सुंदरता का खूबसूरत नमूना। आइये जानते हैं इस बावड़ी के बारे में दिलचस्प बातें। क्यों कहा जाता है इसे रानी की बावड़ी? यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है जैसा कि आप सभी जानते हैं भारत में कई ऐतिहासिक स्थल पुराने राजाओं द्वारा बनवाए गए हैं। असल में रानी की बावड़ी सोलंकी राज के राजा भीमदेव की पहली पत्नी रानी उदयामति ने सन 1063 में बनवाई थी। यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है। क्योंकि इसका निर्माण रानी ने करवाया था, इसीलिए इसे रानी की बावड़ी का नाम दिया गया है। आम तौर पर बावड़ियां एक ही तरह से बनाई जाती है, लेकिन इस कुंड को मंदिर का रूप दिया गया, जिसमें सात अलग-अलग मंज़िलें बनी हुई है। इसके चारों ओर खूबसूरत नक्काशी और पौराणिक और धार्मिक चित्रों को उकेरा गया है। इन शैलियों में सोलंकी वंश की कला को दर्शाया गया है, जो दिखने में बेहद खूबसूरत दिखाई देती है। लंबी लंबी सीढ़ियां और बीच में पानी का कुंड बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। चमत्कारी पानी की बावड़ी सुरंग के साथ बावड़ी आपको जानकर हैरानी होगी कि हर ऐतिहासिक स्मारक का एक रहस्य भी होता है। ऐसा ही रानी की वाव के साथ भी है। इसकी अंतिम सीढ़ी पर बना हुआ है एक ख़ास दरवाज़ा, जहां से 30 मीटर लंबी सुरंग बनाई गई है, जो यहां से सीधी सिद्धपुर गांव में जाकर खुलती है। यह गांव पाटन के पास ही बसा हुआ है। इस पानी को पीने से मौसमी बुखार और कई बीमारियां ठीक हो जाया करती थी उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Info अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया

अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया गया जिसे आप नही जानते, जानकर होगी हैरानी नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, दोस्तों राजा अकबर को भारतीय इतिहास का एक महान राजा माना जाता है राजा अकबर ने अपने शासनकाल में काफी ज्यादा सामाजिक कार्य किया था जिसके कारण राजा अकबर को एक अच्छा शासक माना जाता है राजा अकबर के शासन काल में प्रजा काफी ज्यादा सुखी हुआ करती थी। अकबर ने अपने शासनकाल में सभी धर्मों का सम्मान किया था इसके अलावा अकबर के शासनकाल में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहता था। अकबर ने अपने शासनकाल में कई बड़े-बड़े कार्य करवाए थे। अकबर के शासनकाल में भारत ने काफी ज्यादा तरक्की की थी लेकिन दोस्तों क्या आप लोगों को मालूम है कि जब राजा अकबर इतना बड़ा महान व्यक्ति था तो उसकी जब मृत्यु हुई तब उसके सब को राजकीय सम्मान के साथ क्यों नहीं जलाया गया। आज हम आप लोगों को बताने वाले हैं कि आखिर राजा अकबर की मृत्यु के बाद उसके शव के साथ क्या किया गया था। दोस्तों जब राजा अकबर की मृत्यु हुई थी उनके शव को बिना किसी राजकीय सम्मान और बिना अंतिम संस्कार के दुर्ग के पीछे दीवार तोड़कर सिकंदरा में दफना दिया। इसका कारण यह था कि उस समय अफगान के लोग मुगल साम्राज्य पर हावी हो रहे थे जिसके कारण मुगल साम्राज्य के लोग चाहते थे कि राजा अकबर की मृत्यु के बारे में अफगान लोगों को मालूम ना हो। उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Real Hindi Stories प्यार या संस्कार

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, अदिति ने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद बेंगलुरु महानगर के एक नामीगिरमी कालेज में मैनेजमैंट कोर्स में ऐडमिशन लिया तो मानो उस के सपनों को पंख लग गए. उस के जीवन की सोच से ले कर संस्कार तथा सपनो से ले कर लाइफस्टाइल सभी तेजी से बदल गए. अदिति के जीवन में कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीकठाक चलता रहा, लेकिन अचानक उस के जीवन में उस के ही कालेज के एक छात्र प्रतीक की दस्तक के कारण जो मोड़ आया वह उस पहले प्यार के बवंडर से खुद को सुरक्षित नहीं रख पाई. अदिति बहुत जल्दी प्रतीक के प्यार के मोहपाश में इस तरह जकड़ गई मानो वह पहले कभी उस से अलग और अनजान नहीं थी. जवानी की दहलीज पर पहले प्यार की अनूठी कशिश में अदिति अपने जीवन के बीते दिनों तथा परिवार की चाहतों को पूरी तरह से विस्मृत कर चुकी थी. प्रतीक के प्यार में सुधबुध खो बैठी अदिति अपने सब से खूबसूरत ख्वाब के जिस रास्ते पर चल पड़ी वहां से पीछे मुड़ने का कोईर् रास्ता न तो उसे सूझा और न ही वह उस के लिए तैयार थी. गरमी की छुट्टी में जब अदिति अपने घर वापस आई तो उस के बदले हावभाव देख कर उस की अनुभवी मां को बेटी के बहके पांवों की चाल समझते देर नहीं लगी. जल्दी ही छिपे प्यार की कहानी किसी आईने की तरह बिलकुल साफ हो गई और मां को पहली बार अपनी गुडि़या सरीखी मासूम बेटी अचानक ही बहुत बड़ी लगने लगी. अदिति ने अपनी मां से प्रतीक से शादी के लिए शुरू में तो काफी विनती की, लेकिन मां के इनकार को देखते हुए वह जिद पर अड़ गई. अदिति के पिता तो उसी वक्त गुजर गए थे जब अदिति ठीक से चलना भी नहीं सीख पाई थी. मां और बेटी के अलावा उस छोटे से संसार में प्रतीक के प्रवेश की तैयारी के लिए एक बड़ा द्वंद्व और दुविधा का जो माहौल तैयार हो गया था वह सब के लिए दुखदायी था, जिस की मद्घिम लौ में मां को अपनी बेटी के चिरपोषित सपनों की दुनिया जल जाने का मंजर साफ नजर आ रहा था. ‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो? मैं प्रतीक से सच्चा प्यार करती हूं. वह ऐसावैसा लड़का नहीं है. वह अच्छे घर से है और निहायत शरीफ है. क्या बुरा है, यदि मैं उस से शादी करना चाहती हूं,’’ अदिति ने बड़े साफ लहजे में अपनी मां को अपने विचारों से अवगत कराया. मां अपनी बेटी के इस कठोर निर्णय से काफी आहत हुईं लेकिन खुद को संयमित करते हुए अदिति को अपने सांस्कारिक मूल्यों तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों का एहसास कराने की काफी कोशिश करती हुई बोलीं, ‘‘बेटी, मैं सबकुछ समझती हूं, लेकिन अपने भी कुछ संस्कार होते हैं. तुम्हारे पापा ने तुम्हारे लिए क्या सपने संजो रखे थे लेकिन तुम उन सपनों का इतनी जल्दी गला घोंट दोगी, इस बारे में तो मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था. अपनी जिद छोड़ो और अभी अपने भविष्य को संवारो. प्यार मुहब्बत और शादी के लिए अभी बहुत वक्त पड़ा है.’’ ‘‘मां, आप समझती नहीं हैं, प्यार संस्कार नहीं देखता, यह तो जीवन में देखे गए सपनों का प्रश्न होता है. मैं ने प्रतीक के साथ जीवन के न जाने कितने खूबसूरत सपने देखे हैं, लेकिन मैं यह भूल गई थी कि मेरे इंद्रधनुषी सपनों के पंख इतनी बेरहमी से कुतर दिए जाएंगे. आखिर, तुम्हें मेरे सपनों के टूटने से क्या?’’ ‘‘बेटी, सच पूछो तो प्रतीक के साथ तुम्हारा प्यार केवल तुम्हारे जीवन के लिए नहीं है. जीवन के रंगीन सपनों के दिलकश पंख पर बेतहाशा उड़ने की जिद में अपनों को लगे जख्म और दर्द के बारे में क्या तुम ने कभी सोचा है? प्यार का नाम केवल अपने सपनों को साकार होते देखनाभर नहीं है. वह सपना सपना ही क्या जो अपनों के दर्द की दास्तान की सीढ़ी पर चढ़ कर साकार किया गया हो. ‘‘आज तुम्हें मेरी बातें बचकानी लगती होंगी, लेकिन मेरी मानो जब कल तुम भी मेरी जगह पर आओगी और तुम्हारे अपने ही इस तरह की नासमझी की बातों को मनवाने के लिए तुम से जिद करेंगे तो तुम्हें पता चलेगा कि दिल में कितनी पीड़ा होती है. मन में अपनों द्वारा दिए गए क्लेश का शूल कितना चुभता है.’’ अदिति अपनी मां के मुंह से इस कड़वी सचाई को सुन कर थोड़ी देर के लिए सन्न रह गई. उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर अनजाने ही हाथ रख दिया हो. उस के जेहन में अनायास ही बचपन से ले कर अब तक अपनी मां द्वारा उस के लालनपालन के साथसाथ पढ़ाई के खर्चे के लिए संघर्ष करने की कहानी का हर दृश्य किसी सिनेमा की रील की भांति दौड़ता चला गया. अनायास ही उस की आंखें भर आईं. मन पर भ्रम और दुविधा की लंबे अरसे से पड़ी धूल की परत साफ हो चुकी थी और सबकुछ किसी शीशे की तरह साफसाफ प्रतीत होने लगा था. लेकिन बीते हुए कल के उस दर्र्द के आंसू को अपनी मां से छिपाते हुए वह भाग कर अपने कमरे में चली गई. अपनी मां की दिल को छू लेने वाली बातों ने अदिति को मानो एक गहरी नींद से जगा दिया हो. छुट्टियों के बाद अदिति अपने कालेज वापस आ गई और जीवन फिर परिवर्तन के एक नए दौर से गुजरने लगा. कालेज वापस लौटने के बाद अदिति गुमसुम रहने लगी. प्रतीक से भी वह कम ही बातें करती थी, बल्कि उस ने उसे शादी के बारे में अपनी मां की मरजी से भी अवगत करा दिया और इस तरह मंजिल तक पहुंचने से पहले ही दोनों की राहें अलग अलग हो गईं. कालेज के अंतिम वर्ष में कैंपस सिलैक्शन में प्रतीक को किसी मल्टीनैशनल कंपनी में ट्रेनी मैनेजर के रूप में यूरोप का असाइनमैंट मिला और अदिति ने किसी दूसरी मल्टीनैशनल कंपनी में क्वालिटी कंट्रोल ऐग्जीक्यूटिव के रूप में अपनी प्लेसमैंट की जगह बेंगलुरु को ही चुन लिया. अदिति अपनी मां के साथ इस मैट्रोपोलिटन सिटी में रह कर जीवन गुजारने लगी. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. इसी बीच कंपनी ने अदिति को 1 वर्ष के फौरेन असाइनमैंट पर आस्ट्रेलिया भेजने का निर्णय लिया. अदिति अपनी मां के साथ जब आस्टे्रलिया के सिडनी शहर आई तो संयोग से वहीं पर एक दिन किसी शौपिंग मौल में उस की प्रतीक से मुलाकात हो गई. अदिति के लिए यह एक सुखद लमहा था, जिस की नरम कशिश में वर्षों पूर्व के संबंधों की यादें बड़ी तेजी से ताजी हो गईं. लेकिन भविष्य में इस संबंध के मुकम्मल न होने के भय ने उस के पैर वापस खींच लिए. प्रतीक अपने क्वार्टर में अकेला रहता था और अकसर हर रोज शाम के वक्त वह अदिति के घर पर आ जाया करता था. मां को भी अपने घर में अपने देश के एक परिचित के रूप में प्रतीक का आना जाना अच्छा लगता था, क्योंकि परदेश में उस के अलावा सुख दुख बांटने वाला और कोई भी तो नहीं था. अचानक एक दिन औफिस से घर लौटते वक्त अदिति की औफिस कार की किसी प्राइवेट कार के साथ टक्कर हो गई और अदिति को सिर में काफी चोट आई. महीनेभर तक अदिति हौस्पिटल में ऐडमिट रही और इस दौरान उस का और उस की मां का ध्यान रखने वाला प्रतीक के अलावा और कोई नहीं था. प्रतीक ने मुसीबत की इस घड़ी में अदिति और उस की मां का भरपूर ध्यान रखा और इसी बीच अदिति और प्रतीक फिर से कब एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि उन्हें इस का पता ही नहीं चला. अदिति का यूरोप असाइनमैंट खत्म होने वाला था और उसे अब अपने देश वापस आना था. अदिति और उस की मां को छोड़ने के लिए प्रतीक भी बेंगलुरु आया था. प्रतीक के सेवाभाव से अदिति की मां अभिभूत हो गई थीं. प्रतीक सिडनी वापस जाने की पूर्व संध्या पर अपने मम्मीडैडी के साथ अदिति से मुलाकात करने आया था. अदिति का व्यवहार तथा शालीनता देख कर प्रतीक के पेरैंट्स काफी खुश हुए. प्रतीक की अगले दिन फ्लाइट थी. एयरपोर्ट पर बोर्डिंग के समय जब अदिति का फोन आया तो उस के दिलोदिमाग में एक अजीब हलचल मच गई. पुराने प्यार की सुखद और नरम बयार में प्रतीक के मन का कोनाकोना सिहर उठा. प्रतीक ने अपनी फ्लाइट कैंसिल करवा ली. उस ने अपनी कंपनी को बेंगलुरु में ही उसे शिफ्ट करने के लिए रिक्वैस्ट भेज दी जो कुछ दिनों में अपू्रव भी हो गई. अदिति की मां प्रतीक के इस फैसले से काफी प्रभावित हुईं. अदिति हमेशा के लिए अब प्रतीक की हो गई थी और वह मां के साथ ही बेंगलुरु में रहने लगी थी. प्रतीक अपनी खुली आंखों से अपने सपने को अपनी बांहों में पा कर खुशी से फूले नहीं समा रहा था. अदिति के पांव भी जमीं पर नहीं पड़ रहे थे. उसे आज जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि धरती की तरह सपनों की दुनिया भी गोल होती है और सितारे भले ही टूटते हों, लेकिन यदि विश्वास मजबूत हो तो सपने कभी नहीं टूटते. उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Real Stories भोले भक्त की भक्ति

एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था। एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम में आया और बोला कि बाबा आप सब का ध्यान रखते है, मेरा इस दुनिया मेँ कोई नही है तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम में रह सकता हूँ ? बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है ? उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ। तब संत ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना। रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा। उन संत की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ रुकेगा ? संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे.! क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे। अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था। बालक रामदास संत के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ। संत ने कहा ठीक हैँ पर तुझे काम करना पड़ेगा आश्रम की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा मे कोई कमी मत रखना। रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप बता दिजिये के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है ? फिर मैँ कर दूंगा। संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार की झाँकी थी। श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी थे. संत ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है सब सिखा दिया। रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योँकि अगर रिश्ता पता चल जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा। उन संत ने बालक रामदास कहा की तू कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज से ये राम जी और सीता जी तेरे माता-पिता हैँ। रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है ? संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है। रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये। आज सेवा का पहला दिन था, रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया ,आश्रम की साफ़ सफाई की,और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया। रामदास ने श्री राम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा। रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर खायेंगे. पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी। तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिश्ता बना हैँ तो शरमा रहेँ होँगे। रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था। अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ ! और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और मैँ भूख से मर जाऊँगा..! इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा। रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब भगवान राम जी हनुमान जी को कहते हैँ हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ। हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो? रामदास कहता हैँ आप कौन ? हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ? रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहा बोल रहा था की खाना खा लो तब आये नहीँ अब क्योँ आ गये ? तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे। फिर राम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी , हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैँ। इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता। सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा घर मैँ ५ लोग हैं,सारा काम में ही अकेला करता हुँ ,बाकी लोग तो दिन भर घर में आराम करते है.मेरे माँ, बाप ,चाचा ,भाई तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ. मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा। रामदास मंदिर जाता हैँ ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।राम जी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ ? रामदास कहता हैँ की घर में मैं सबसे छोटा हुँ ,और मैं ही सब काम करता हुँ।अब से मैँ अकेले काम नहीँ करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा,आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा। राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है?रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले. और चाचा जी (लक्ष्मणजी) आप घर की साफ़ सफाई करियेगा. भैय्या जी (हनुमान जी)शरीर से मज़बूत हैं ,जाकर जंगल से लकड़ियाँ लाइयेंगे. पिता जी (रामजी) आप बाज़ार से राशन लाइए और घर पर बैठकर पत्तल बनाओँगे। सबने कहा ठीक हैँ।मैंने बहुत दिन अकेले सब काम किया अब मैं आराम करूँगा. अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ। एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो देखा आश्रम तो शीशे जैसा चमक रहा है, वो बहुत प्रसन्न हुए.मंदिर मेँ गये और देखा की मंदिर से प्रतिमाऐँ गायब हैँ. संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीँ दी ? संत ने रामदास को बुलाया और पूछा भगवान कहा गये रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता हनुमान भैया जंगल लकड़ी लाने गए होंगे,लखन चाचा झाड़ू पोछा कर रहे होंगे,पिताजी राम पत्तल बन रहे होंगे माता सीता रसोई मेँ काम कर रही होंगी. संत बोले ये क्या बोल रहा ? रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जब से आप गये हैँ ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ। वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ राम जी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये। संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तू धन्य हैँ। और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये…! रामदास जैसे भोले,निश्छल भक्तो की भक्ति से विवश होकर भगवान को भी साधारण मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने आना पड़ता है. जय श्री राम उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

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