एक के बाद एक - Sad Story - Sad Stories

एक क

दिन के एक बज रहे थे. आकाश में बैठा हुआ सूर्य का गोला अपने पूरे योवन के साथ तमतमा रहा था. मार्च का महीना था और गर्मी के दिन शुरू हो गये थे. मगर अभी से भविष्य में जमकर पड़ने वाली गर्मी ने अपना असली रूप दिखाना आरम्भ कर दिया था. जूही ने रिक्शेवाले को अपना पर्स खोलकर पैसे दिए और चुपचाप जैसे गिरती-पड़ती सी दरवाज़ा खोलकर अपने घर में आ गई. मारे दर्द के उसका तो जैसे सर फटा जाता था. आते ही उसने पर्स को एक तरफ बिस्तर पर पटक दिया और फिर किचिन में जाकर नल से ही एक गिलास पानी भरा, फिर अपने पर्स को बिस्तर पर से उठाया और उसे खोलकर उसके अंदर से एक पुड़िया निकाली और उसे खोलकर उसका सारा पाउडर गिलास के पानी में भर दिया. ये चूहे मारने वाली दवाई थी. इसको उसने आज ही अपने कार्यालय से आते समय बाज़ार से खरीदा था. यही सोचकर कि इसे पीकर वह आज ही अपने अस्तित्व को सदा के लिए समाप्त कर लेगी. उसे अब जीने से लाभ भी क्या होनेवाला है? सब कुछ तो उसका छीना जा चुका है. फिर दवाई को पानी में मिलाकर जैसे ही उसने अपने मुंह से गिलास को लगाना चाहा कि अचानक ही सामने की मेज पर रखी हुई जीजस की तस्वीर को देख कर उसका हाथ जहां का तहां ही थम गया. जीजस की आँखों में उसके प्रति जैसे नफरत और क्रोध के अंगारे दहक रहे थे. जीजस का ऐसा बदला हुआ रूप देख कर वह दंग रह गई. शान्ति के राजकुमार कहे जाने वाले, करुणा और दया के सागर की आँखों में उसके प्रति क्रोध की भावनाएं. . .? सोचते ही जूही को अजीब सा लगने लगा. अजीब इसलिए क्योंकि उसका विश्वास था कि सारी मानव जाति के पापियों से प्यार करने वाला जीजस आज उसको ही घूरे क्यों जा रहा है? उसने सोचा कि क्या यह वही जीजस है जो एक दिन अपने परम मित्र लाजरस की कब्र के सामने जाकर रो पड़ा था? क्या यह वही यहूदिया के मैदानों में घूमने वाला मनुष्य है जिसे परमेश्वरीय पुत्र भी कहा जाता है, जो एक दिन भारी भीड़ को भूख और प्यासा देख कर परेशान और चिन्तित हो गया था? क्या यह वही सहनशील और दयालु इंसान है जो एक दिन सलीब पर अपने हाथ और पैरों में कीलें ठोकें जाने के समय भी किसी को बुरा-भला नहीं कह सका था? जूही जानती थी कि आज की हुई उसके जीवन की घटना ने उसके जीने के सारे रास्ते बंद कर दिए थे. वे उम्मीदों और आसरों के पहिये कि जिनको सहारा बनाकर इंसान अपने लिए रास्ते बनाता है और अपने जीवन का सफर तय करता है, अब सदा के लिए टूट चुके हैं. आज वह जिस भी जगह पर खड़ी है वहां से कोई भी मार्ग ना तो उसके अपने घर तक जाता है और ना ही किसी अन्य मंजिल की तरफ बढ़ने की सलाह देता है. आज उसने फिर एक बार कुल्हाड़ी अपने ही पैरों पर मार ली थी. ज़िन्दगी की एक और बाज़ी वह फिर एक बार बुरी तरह से हार चुकी थी. . . . सोचते-सोचते जूही की यादों के खंडर फिर एक बार एकत्रित होने लगे तो उसकी आँखों के पर्दों पर उसके अतीत के जिए हुए दिन किन्हीं बे-जान परिंदों के समान पंख फैलाए दिखने लगे. उसके जीवन की वे कड़वी और कसैली यादें कि जिनमें उसके कटु अनुभवों की अबाबीलें उसके दिल के घर को सूना और तन्हा पाकर स्वत: ही चिपकने लगी थीं. उसे अचानक ही याद आया कि एक दिन सब्जी मंडी में दैनिक खरीदारी करते समय वह वहां की कीचड़ में फिसल कर गिर पड़ी थी और उसके मुख से सहसा ही निकल पड़ा था कि, 'अरे, मैं गिर गई.' 'जब उठाने वाला नज़दीक ही खड़ा हो तो फिसलने वाले को डरना नहीं चाहिए.' उपरोक्त शब्दों के आदान-प्रदान के साथ ही तो जूही के फूलों के प्यार की कहानी अमलतास की छाँव के आस-पास आरम्भ हो गई थी. बरसात के दिन थे. सारा शहर तो क्या लगता था कि समस्त सूबे को बारिश ने अपने प्रकोप में ले रखा था. यूँ भी जुलाई के महीने में बारिश का मौसम होता ही है, मगर न जाने क्यों पिछले कई बर्षों से प्रकृति का नियम भी जैसे टूट चुका था. सो ठीक जून के महीने की कड़ी गर्मी के दिनों में भी जब सारे लोग गर्मी के कारण हताश और परेशान होने लगे थे तब कहीं जाकर ये बारिश होना आरम्भ हुई थी. फिर जब आरम्भ में पानी बरसना शुरू हुआ तो सब ही चेहरों पर जैसे एक चैन और सकून नज़र आने लगा था. लेकिन कोई क्या जानता था कि पहले जमकर गर्मी फिर बारिश भी हुई तो उसने थमने का नाम ही नहीं लिया था. लगता था कि आसमान में बैठा सबका विधाता भी जैसे सारे संसार में आये दिन होते पापों को देख-देखकर तंग आ चुका था. शायद इसीलिये वह समय-समय पर अपना रौद्र रूप प्रकृति के बिगड़ते हुए स्वभाव के साथ दिखा देता था. एक सप्ताह लगातार जब बारिश ने बंद होने का नाम ही नहीं लिया तो हार मानकर जूही को बाज़ार जाना ही पड़ गया था. घर में कुछ बचा ही नहीं था. साथ में चार साल की छोटी बच्ची रक्षा की भी तो उसे रक्षा करनी ही थी. वह चाहे एक बार को तो भूखी रह सकती थी लेकिन अपने कलेजे के हिस्से को किस प्रकार भूखा सुला सकती थी. इसीलिये वह न चाहते हुए भी बाज़ार गई थी. रक्षा को वह बरसात की हर समय होती हुई रिमझिम के कारण अपने पड़ोस में छोड़ गई थी. जरूरत का सारा सामान खरीदने के पश्चात वह सब्जी मंडी में चली गई थी. चाहा था कि जब वह बाज़ार ही आई है तो कुछेक सब्जी आदि भी लेती जाए. फिर जब सब्जी मंडी में गई तो वहां का दृश्य देखते ही उसका मन हुआ कि वह तुरंत ही वापस हो ले.सारी सब्जी मंडी में इतना अधिक कीचड़ भरा हुआ था कि कहीं भी पैर रखने की जगह तक नहीं थी. लेकिन फिर भी साहस करके उसने कुछेक सब्जियां खरीद लेनी चाही थीं. मग आर बहुत सम्भालकर चलते हुए भी उसका पैर अचानक से फिसला था और वह वहीं गिर पड़ी थी. गिरने के कारण सहसा ही उसके मुख से एक डरावनी सी चीख निकल पड़ी थी. 'अरे, मैं गिर गई .' मग आर वह क्या जानती थी कि उसकी चीख के साथ ही एक सभ्य जैसे दिखनेवाले पुरुष ने जब उसे सहारा देकर उठाना चाहा और उपरोक्त शब्द कहे तो न जाने कैसे जूही ने अपना हाथ उस अंज आन पुरुष की तरफ बढ़ा दिया था. तब उसके पश्चात उस पुरुष ने न केवल उसे उठाया ही था बल्कि पास ही की एक दूकान से उसे नई साड़ी भी खरीदकर दे दी थी. जूही की पहनी हुई साड़ी तो कीचड़ के पानी में सनकर बुरी तरह से खराब हो चुकी थी. इसके साथ ही उस पुरुष ने जूही को अपनी कार से उसके घर तक छोड़ भी दिया था. वह अनायास उसकी सहायता करने वाला और उसके साथ बे-हद हमदर्दी जतानेवाला सभ्य सा युवक कौन था? क्या करता था? ये सब जूही को बाद में कुछेक ही दिनों में पता चलते देर भी नहीं लगी थी. एक दिन अमलतास ने उसको अपने बारे में सब कुछ विस्तार से बता दिया था. अमलतास एक भरे-पूरे तथा धनाड्य परिवार से था और उसके परिवार में पुश्तों से व्यापार के द्वारा ही रोजी-रोटी कमाने का काम चलता आया था. शहर के सदर बाजार में अमलतास के पिता की कार के पुर्जे बनाने की फेक्ट्री चला करती थी. अपनी इसी कम्पनी में अमलतास मैनेजर, और निदेशक दोनों ही पदों का कार्य सम्भाला करता था. बातो-बातों के दौरान ही एक दिन जूही ने अमलतास को अपने बारे में भी सब कुछ बता दिया था कि वह एक लड़की की मां भी है और अपने पति के बुरे स्वभाव के कारण उससे अलग हो चुकी है, तथा एक प्राइमरी स्कूल में दैनिक लिपिक की नौकरी करती है. फिर अमलतास के ये पूछने पर कि वह स्कूल की एक छोटी सी नौकरी क्यों करती है? इसके जबाब में जूही ने अमलतास से कहा था कि उसकी लड़की भी उसके साथ उसी स्कूल में पढ़ने जाया करती है और इस प्रकार से 'बेबी-सिटर' का खर्चा वह बचा लेती है. तब अमलतास ने उसको अपनी कम्पनी में नौकरी करने का निमंत्रण दिया और साथ ही ये भी कहा कि उसकी कम्पनी में नौकरी करने से उसे वेतन भी स्कूल की नौकरी से मिलेगा और इसके साथ ही उसकी लड़की की 'बेबी-सिटर' का खर्चा उसकी कम्पनी कुछ मामलों में स्वीकृत कर देती है. अमलतास की इस बात पर हांलाकि जूही उसकी नौकरी के लालच में तो नहीं आई थी मगर वह यह अवश्य ही जान गई थी कि अमलतास उसमें एक विशेष रूचि लेने लगा है. साथ-साथ जब जूही को ये भी ज्ञात हुआ कि अमलतास का अभी तक विवाह भी नहीं हुआ है तो वह भी न जाने अपने कौन से भविष्य का सुंदर सपना देखते हुए उसमें दिलचस्पी लेने लगी. सो जूही की इन्हीं सोचों के साथ वह अपने अरमानों के सपने देखते हुए आये दिन अमलतास के साथ देखी जाने लगी. अक्सर ही वह अपनी शाम को अमलतास के साथ किसी भी रेस्टोरेंट या फिर कहीं कॉफ़ी हाउस में कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ बिताने लगी. तब एक दिन ऐसी ही अमलतास के साथ मुलाक़ात के दौरान जब अमलतास ने जूही को फिर से अपने यहाँ नौकरी कर लेने की बात कही तो फिर जूही ने अपनी हांमी भर दी. तब एक दिन वह अपने स्कूल की स्थायी नौकरी को छोड़कर अमलतास की कम्पनी में लिपिक की नौकरी करने को आ गई. हांलाकि जूही के लिए अमलतास की कम्पनी का काम तो स्कूल के कार्यालय के समान ही था, मगर स्कूल की नौकरी और इस कम्पनी की नौकरी में जो विशेष अंतर था वह यही कि यहाँ का काम करनेवाला हरेक कर्मचारी भी जूही को अमलतास के समान ही कम्पनी के प्रबंधक जैसा दर्जा और सम्मान देता था. कोई भी उससे किसी भी बात के लिए रोक-टोक नहीं करता था. ये जूही की मर्जी थी कि वह चाहे कितना भी काम करे अथवा नहीं. स्वयं अमलतास भी कभी भी उसके काम को चैक नहीं किया करता था. इसका कारण था कि शायद कार्यालय के अन्य समस्त कर्मचारी भी ये समझ गये थे जूही लाख उन सबके लिए कितनी ही जूनियर कर्मचारी हो मगर उसके ऊपर क्मोनी के मालिक की मेहरबानी अवश्य ही है. कम्पनी के कर्मचारियों के लिए सबसे आश्चर्यजनक धमाका तब हुआ जबकि एक दिन केवल तीन महीने के कार्यकाल में ही जूही को कार्यालय का मुख्य सचिव बना दिया गया. कार्यालय के कर्मचारियों के लिए आश्चर्य करना अति स्वभाविक ही था. जो नई लड़की अभी सभी के लिए बे-हद जूनियर थी वही अब उन सबके लिए बॉस बना दी गई थी. जूही की तरक्की से चाहे कार्यालय के समस्त कर्मचारियों को भले ही अच्छा न लगा हो, लेकिन जूही के मासिक वेतन में एक दम से अत्यधिक रुपियों की बढ़ोतरी कर दी गई थी. इसके साथ ही उसके काम में भी अब साहबी भर दी गई थी. फिर जूही की तरक्की ने उसके मन और मस्तिष्क में एक बात और भर दी कि वह अब अमलतास के बारे में दूसरे ढंग से सोचने लगी. उसके सोचने का तरीका इस प्रकार बदला कि वह अब अधिक से अधिक समय अमलतास को देने लगी थी. इस प्रकार कि प्राय: ही शाम का खाना वह अमलतास के साथ ही खा लिया करती थी. स्वयं अमलतास भी अब विशेष अवसरों पर उसको और उसकी लड़की को विभिन्न प्रकार के उपहारों से लादने लगा था और कभी-कभार कम्पनी के कार्यालय सम्बन्धी काम निकालकर वह अब उसके साथ अतिरिक्त समय में कार्यालय में साथ बैठकर गई रात तक काम करने लगा था. सो इन सब बातों और कार्यकलापों का प्रभाव ऐसा पड़ा कि जूही और अमलतास के बीच का नौकरी का रिश्ता कम और व्यक्तिगत सम्बन्धी अधिक बढ़ता गया. तब एक दिन जूही ने अपनी मकान मालकिन को अमलतास के बारे में बताया तो उसकी मकान मालकिन ने जूही से इतना ही कहा कि वह केवल अपने काम से काम रखे. अमलतास के साथ उसका रिश्ता केवल नौकर और मालिक तक ही रहना चाहिए, क्योंकि ऐसे मामलों में लोग सपने तो कुछ दूसरे देखते हैं, पर उनकी वास्तविकता कुछ और ही हुआ करती है. प्राय: इस प्रकार के मामलों में हानि केवल लड़की के पक्ष की ही हुआ करती है. जूही ने सोचा था कि, जो बात अपने मन में सोच कर उसने अमलतास के बारे में अपनी मकान मालकिन कोम ये सब कुछ बताया था उसकी ठोस बुनियाद रखने का कोई उपाय वह उसे बतायेगी, मगर मकान मालकिन ने जब उसकी बात का अर्थ विपरीत ही निकालकर दिया तो जूही के मन में खिले हुए फूलों की सारी खुशबू उड़ते देर भी नहीं लगी. पल भर में ही उसके सारे इरादों पर मकान मालकिन की बात ने जैसे पानी फेर दिया था. इतना अधिक कि फिर उसके बाद जूही ने कभी भी इस विषय पर उससे कभी बात भी नहीं की. फिर धीर-धीरे और समय आगे बढ़ा तो जूही और अमलतास के सम्बन्ध भी आगे ही बढ़ते गये. इतना अधिक कि इन आपसी सम्बन्धों की इस डोर ने आपस में एक-दूसरे के दोनों छोरों को भी जोड़ लिया. जूही अब सचमुच में अमलतास के घर की मालकिन बनने के सपने देखने लगी थी. और फिर मन और आत्मा की गहराइयों की कोख में जन्में सपनों को साकार करने की इच्छा लिए एक दिन जूही ने अमलतास से कहा कि, 'देखो, अब ये तीसरी बार ऐसा हुआ है. मैं इस बार एबार्शन नहीं करवाऊंगी. बेहतर है कि अब हमें विवाह कर लेना चाहिए?' '?' - खामोशी. जूही की इस अप्रत्याशित बात को अचानक से सुनकर अमलतास ऐसा चौंका जैसे कि उसे किसी बिच्छू ने अपना डंक कसकर मार दिया हो. तुरंत ही वह अपने मुख के कडवे स्वाद को छुपाता हुआ जूही से बोला कि, 'बच्चों जैसी बातें मत किया करो. जो अब तक कराती आई हो उसी परम्परा को जारी रखो.' इतना कहकर उसने मेज की दराज़ से नोटों की गडडी निकालकर जूही के सामने फेंक दी. 'मुझे बार-बार बहलाने की कोशिश मत करो. मैं सचमुच बहुत ही सीरियस हूँ.' जूही ने उसे उत्तर दिया तो अमलतास उससे बोला कि, 'मैं भी कोई तुमको बहला नहीं रहा हूँ. मैं तो केवल तुम्हारी प्रोब्लम को सुलझाने की कोशिश कर रहा हूँ.' 'तुम क्या समझते हो कि मेरी ये प्रोब्लम क्या केवल मेरी अपनी भर की है? तुम्हारा इसमें कोई भी हाथ नहीं है?' 'ऑफकोर्स! ये तुम्हारी अपनी ही प्रोब्लम है. बगैर तुम्हारी मर्जी के कोई तुम्हारे जिस्म से हाथ कैसे लगा सकता है?' अमलतास ने कहा तो जूही जैसे बिफर पड़ी. वह ज़रा तेज आवाज़ में अमलतास से बोली, 'इसका मतलब है कि पिछले दो वर्षों से तुम मुझे केवल बेवकूफ ही बना रहे थे. मेरे साथ किये गये तुम्हारे वे वायदे, कसमें और प्रेम के इज़हार आदि, सब खोखली वह बातें थीं जिनमें सच्चाई नाम का कोई एक कतरा भी नहीं था.' 'देखो, मैं तुमको बेवकूफ नहीं बना रहा हूँ. मैं तो तुमको इस ज़माने की हकीकत से वाकिफ करवा रहा हूँ. मैं और तुम, चाहे कितना भी हाथ और पैर मार लें, हम दोनों का विवाह नहीं हो सकता है. इसका कारण है कि तुम एक ईसाई युवती हो और मैं एक हिन्दू. अगर मैंने ये विवाह कर लिया तो मैं अपने घर से तो निकाला ही जाऊंगा और मेरा अपना हिन्दू समाज भी मुझ को अपने साथ कहीं नहीं बैठने देगा. मुझको अपनी बिरादरी से सदा के लिए निकाल दिया जाएगा. इतना ही नहीं, साथ में तुमको भी मेरे समाज में कोई भी सम्मान नहीं मिल सकेगा. मेरे परिवार के लोग तुमको किसी भी तरह से अपने घर की बहू स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे इसके लिए मैं सूली पर ही क्यों चढ़ जाऊं.' 'मुझसे सम्बन्ध जोड़ने से पहले तुमने यह सब नहीं सोचा था क्या? जूही ने पूछा तो अमलतास ने कहा कि, 'प्रेम के अंधे नशे में इंसान यह सब कहाँ सोच पाता है.' '?' अमलतास की इस बात पर जूही निरुत्तर हो गई. अमलतास ने सच ही तो कहा था. वह सचमुच ही तो उसके प्यार की झूठी दुनियां में के कुएं में अंधी होकर कूद पड़ी थी. बगैर कोई भी आगा-पीछा सोचे हुए उसने कितनी ही उम्मीदों से अपनी भविष्य की संजोईं हुई प्यार की दुनियां अमलतास की छ्या में सजानी चाही थी, मगर वह क्या जानती थी कि एक दिन खुद अमलतास ही खुद अपने पत्तों से नंगा होकर कड़ी धूप में जलने लगेगा. 'अब ज यादा सोचा-विचारी करके अपने आपको परेशान मत करो. जैसा च अलता आया है वैसा ही चलने दो. यूँ तो मैं हर तरह से तुम्हारा ख्याल रखा ही करता हूँ, जरूरी नहीं है कि शादी के बंधन में बंधकर ही मैं तुम्हारी जिम्मेदारी के कर्तव्यों में बंध जाऊं?' जूही को चुप और गम्भीर बने देख कर अमलतास ने अपनी बात आगे बढ़ाई तो जूही जैसे फट पड़ी. वह जैसे बहुत ही अधिक परेशान होते हुए बोली, 'तुमको मुझे अब और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है. मुझे क्या करना है और क्या नहीं. तुमने मुझे अपना असली चेहरा दिखा दिया है. मैं इतना तो जान ही गई हूँ कि अन्य पुरुषों के समान तुमने भी मुझको उसी नज़र से देखा है जैसा कि दूसरों ने. मैं यहाँ से जा रही हूँ और कभी भी तुमको अपनी शक्ल तक नहीं दिखाउंगी.' इतना सब कुछ कहने-सुनने के पश्चात जूही अमलतास के कार्यालय से रोटी-तड़पती और बे-हद परेशान होकर चली आई थी. आने से पहले ही उसने सोच लिया था कि वह अब अपने जीवन का अंत ही कर डालेगी और आत्महत्या का कारण अमलतास के मत्थे मढ़ जायेगी. इसीलिये आते समय उसने बाज़ार से चूहे मारने की दवाई खरीद ली थी. यही सोच कर कि घर पहुंचते ही वह इस दवा को पीकर सदा के लिए सो जायेगी. अब उसे और जीने से लाभ भी क्या? वह जान गई थी कि, जिस अमलतास की अमलतास की सुंदरता को देखकर वह रीझ गई थी, उसकी क्षत्र-छाया में महज उसकी ज़िन्दगी के गंदे इरादों के सिवा और कुछ भी बाकी नहीं बचा है. अपने जिन अरमानों की ख्वाईश में उसने अपना तन, अपना मन, और अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय जिसके चरणों में अर्पित कर दिया था, उसकी झोली में उसके लिए केवल लूट, स्वार्थ और मतलबपरस्ती जैसी भावनाएं ही एकत्रित रहती हैं. क्या ही अच्छा होता कि आरम्भ से ही उसने अपने से बड़ों का कहना मान लिया होता. अपनी मनमानी करके यूँ दूसरों के केवल बाहरी आवरण को देख कर वह रीझी न होती. अपना घर, अपना समाज और अपनी जाति-धर्म की बंदिशों की लापरवाही करके उसने गैरों के दामन में अपने भविष्य की खुशियाँ ढूंढ लेनी चाही थीं तो नुक्सान तो उसका होना ही था. अपने दिल की कितनी ही खुशियों के साथ उसने अमलतास को अपना समझकर अपने दिल में लगाकर जीवन भर के लिए उगा लेना चाहा था, उसे क्या मालुम था कि इसी अमलतास के सुंदर-सुंदर पीले फूलों जैसे झूठे वादे उसके जिस्म से किसी कोढ़ के दागों के समान सदा के लिए चिपक कर रह जायेंगे. सोचते-सोचते जूही की आँखों से उसकी बे-बसी के आंसू किसी राह-ए-सफर में अचानक से लुटर हुये मुसाफिर के नुचे हुए कपड़ों की कतरनों के समान टूट-टूटकर नीचे कमरे के सीमेंट के फर्श पर बिखरने लगे. बिखरने लगे तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी. कितना बुरा हश्र उसके प्यार के साथ-साथ उसकी हसरतों का भी हो चुका था. वह जानती थी कि अपने प्यार की मंजिल की तलाश में भटकते हुए वह आज जिस जगह पर खड़ी थी वहां से कोई भी रास्ता ना तो उसके मा-बाप के घर जाता था और ना ही अन्य मंजिल की चाहत में. और इतना सब कुछ करने के पश्चात वह जिस जगह जाकर खुद को सदा के लिए खो देना चाहती थी वहां जाने के लिए उसका प्यार करनेवाला मसीहा, उसका शान्ति का राजकुमार और उसका प्यारा ईश्वर न जाने किस बात पर नाराज़ होकर उसको घूरे जा रहा है? शायद इसीलिये कि वह ये बता देना चाहता है कि यह इस शैतानी दुनिया का चलन है कि पहले जो लोग उसका साथ देकर उसे निमंत्रण देते हैं वही अपना मतलब निकल जाने के बाद उसी पर दोष लगाकर उसके मार्गों से अलग हो जाया करते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो यह दुनिया इतनी जालिम नहीं होती. सदा से अपने ईश्वर से प्यार करनेवाली, यदि उसका ईश्वर उससे नाराज़ है तो केवल इस बात पर कि एक तो उसने गलती की है. गलती ही नहीं, बल्कि गलतियों पर गलतियाँ वह करती आई है और आज जब उसके प्रायश्चित का अवसर आया है तो वह अपने जीवन की वह भयंकर भूल करने जा रही है कि जिसके बाद उसके बचने का कोई भी मार्ग बाकी नहीं बचता है. पहले रामदास, राजेश फिर अमरनाथ. उसके बाद अमलतास. एक के बाद एक गलतियाँ करने के पश्चात . . .और अब . . .आगे . .? अपने जीवन के साथ अपनी दो नन्हीं जानों का भी भविष्य वह काला बना देना चाहती है? सोचते हुए जूही को तुरंत ही अपनी बेटी रक्षा और जिस बच्चे को वह अपनी कोख में लिए फिर रही है वह . . .? दोनों ही का ख्याल आते ही उसके जिस्म की रूह अंदर तक काँप गई. काँप गई तो उसने शीघ्र ही चूहे मारनेवाली दवा से भरा गिलास फेंककर सामने कमरे की दीवार से दे मारा और जाकर मेज पर रखी हुई जीजस की तस्वीर के सामने सर झुकाकर फूट-फूटकर रोने लगी. मानव जीवन में यदि इंसान की परेशानियों, दुखों और समस्याओं का समाधान हमेशा दुनियाबी तरीके से हो जाया करता तो शायद ईश्वर, भगवान और विधाता जैसे शब्दों का अस्तित्व ही नहीं होता. मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

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Hindi Info भारत के 5 सबसे अनूठे गांव ये है

ये है भारत के 5 सबसे अनूठे गांव, नंबर 1 में तो है अपना संविधान. नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, आज हम आपको भारत के 5 सबसे अनोखे गांव के बारे में बताने वाले हैं जो अपने आप में अलग ही देश-विदेश में पहचान रखते हैं, तो चलिए आज की चर्चा शुरू करते हैं। 5. पिपलांत्री यह भारत का सबसे विकसित गांव के तौर पर जाना जाता है। इस गांव के विकास को डेनमार्क देश की किताबों में भी पढ़ाया जाता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारत के अधिकतर लोग इस गांव के बारे में नहीं जानते हैं। यह गांव राजस्थान के उदयपुर से 50 किलोमीटर दूर है और इस गांव की जनसंख्या करीब 1500 लोगों की है। इस गांव में पानी, पेड़ और बेटी बचाने के लिए देशभर में सबसे शानदार उदाहरण पेश किया है। इस गांव में इजरायल तकनीक पर आधारित कई प्रकार हाईटेक खेती की जाती है। लड़कियों के जन्म पर इस गांव में 111 पेड़ लगाने होते हैं और इनकी शादी का सारा खर्च पूरा गांव मिलकर उठाता है। 4. मावल्यान्नॉंग इस गांव को एशिया का सबसे स्वच्छ गांव की उपाधि मिली हुई है। यह गांव स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने से कई सालों पहले स्वच्छता के मामले में अव्वल रहा है। यह गांव भगवान का बगीचे के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह गांव भारत-बांग्लादेश के बॉर्डर पर मेघालय राज्य में स्थित है। आपको अपनी जिंदगी में एक बार इस गांव में जरूर जाकर आना चाहिए। 3. कोडिन्ही केरल में स्थित यह गांव जुड़वाँ बच्चों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। आपको यहां पर हर घर में एक जुड़वाँ बच्चा जरूर मिल जाएगा। यहां जुड़वाँ बच्चा पैदा होने की क्या वजह है, अभी तक कोई भी असली कारण नहीं खोज पाया है। आपको यहां पर नवजात शिशु लेकर 60 साल के बुड्ढे तक का डबल रोल मिल जाएगा। यह गांव वाले इन जुड़वाँ बच्चों की वजह से कितने कंफ्यूज होते होंगे यह तो अब बस ऊपरवाला ही जाने। 2. करचोंड आज भी भारत में अंतरजातीय विवाह या फिर शादी से पहले लड़की से मिलने की वजह कितनी ही समस्या और लड़ाई दंगे हो जाते हैं। भारतीय न्यायालय ने हाल ही में लोगों को लव इन रिलेशनशिप में रहने के अधिकार प्रदान किए हैं लेकिन यह गांव इस मामले में हजारों साल पहले से ही आगे हैं। गुजरात के सेलवास से 30 किलोमीटर दूर स्थित 3 हजार आदिवासी लोगों के इस गांव में आप बेरोकटोक किसी भी लड़की के साथ लव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं। अक्सर लोगों की गांव के प्रति गलत धारणाएं ही रहती है लेकिन यह गांव शहर से भी आगे है। 1. मलाणा हिमाचल प्रदेश के मनाली शहर से 70 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव अपने आप में कई खूबियों से भरा हुआ है। अगर आपको इस गांव की पहली खूबी बताई जाए तो इस गांव में कनाशी भाषा बोली जाती है जो केवल विश्व में केवल इसी गांव के लोग जानते हैं और यह इसे ना ही किसी बाहरी लोगों को सिखाते हैं। दूसरी बात इस गांव में मलाणा क्रीम मिलती है जिसे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भांग के तौर पर जानी जाती है। इस गांव के लोग खुद को सिकंदर का वंशज मानते हैं और यह दुनिया का सबसे पुरानी लोकशाही गांव है। इस गांव में खुद का संविधान और संसद है जिसमें ये निचले सदन को कनिष्थाँग और उच्च सदन को जयेशथाँग कहते है। गांव में साल भर भीड़ रहती है लेकिन यहां के लोग अपने ही मस्ती में रहते हैं। खैर, यह थे भारत के कुछ अनूठे गांव, अगर आपके गांव या आसपास गांव में भी कुछ अनूठी बात है उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Story क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी

क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी? नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, गुजरात में कई ऐसे खूबसूरत पर्यटक स्थल हैं, जिसे देखने का मोह लोग छोड़ नहीं पाते। इन्हीं पर्यटक स्थलों में एक बेहद दिलचस्प जगह है, रानी की बावड़ी, जिसे रानी की वाव का नाम भी दिया गया है। इतिहास में पानी के कुंड को बावली कहा जाता था, इसीलिए इसका नाम रानी की बावड़ी रखा गया। सरस्वती नदी के मुहाने पर बसे पाटन में यह खूबसूरत कला का नमूना कई सदियों से खड़ा हुआ है। गुजरात के पाटन को इतिहास में अन्हिलपुर के नाम से जाना जाता था जो गुजरात की राजधानी हुआ करती थी। यही मौजूद है वास्तुकला और ऐतिहासिक सुंदरता का खूबसूरत नमूना। आइये जानते हैं इस बावड़ी के बारे में दिलचस्प बातें। क्यों कहा जाता है इसे रानी की बावड़ी? यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है जैसा कि आप सभी जानते हैं भारत में कई ऐतिहासिक स्थल पुराने राजाओं द्वारा बनवाए गए हैं। असल में रानी की बावड़ी सोलंकी राज के राजा भीमदेव की पहली पत्नी रानी उदयामति ने सन 1063 में बनवाई थी। यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है। क्योंकि इसका निर्माण रानी ने करवाया था, इसीलिए इसे रानी की बावड़ी का नाम दिया गया है। आम तौर पर बावड़ियां एक ही तरह से बनाई जाती है, लेकिन इस कुंड को मंदिर का रूप दिया गया, जिसमें सात अलग-अलग मंज़िलें बनी हुई है। इसके चारों ओर खूबसूरत नक्काशी और पौराणिक और धार्मिक चित्रों को उकेरा गया है। इन शैलियों में सोलंकी वंश की कला को दर्शाया गया है, जो दिखने में बेहद खूबसूरत दिखाई देती है। लंबी लंबी सीढ़ियां और बीच में पानी का कुंड बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। चमत्कारी पानी की बावड़ी सुरंग के साथ बावड़ी आपको जानकर हैरानी होगी कि हर ऐतिहासिक स्मारक का एक रहस्य भी होता है। ऐसा ही रानी की वाव के साथ भी है। इसकी अंतिम सीढ़ी पर बना हुआ है एक ख़ास दरवाज़ा, जहां से 30 मीटर लंबी सुरंग बनाई गई है, जो यहां से सीधी सिद्धपुर गांव में जाकर खुलती है। यह गांव पाटन के पास ही बसा हुआ है। इस पानी को पीने से मौसमी बुखार और कई बीमारियां ठीक हो जाया करती थी उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Info अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया

अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया गया जिसे आप नही जानते, जानकर होगी हैरानी नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, दोस्तों राजा अकबर को भारतीय इतिहास का एक महान राजा माना जाता है राजा अकबर ने अपने शासनकाल में काफी ज्यादा सामाजिक कार्य किया था जिसके कारण राजा अकबर को एक अच्छा शासक माना जाता है राजा अकबर के शासन काल में प्रजा काफी ज्यादा सुखी हुआ करती थी। अकबर ने अपने शासनकाल में सभी धर्मों का सम्मान किया था इसके अलावा अकबर के शासनकाल में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहता था। अकबर ने अपने शासनकाल में कई बड़े-बड़े कार्य करवाए थे। अकबर के शासनकाल में भारत ने काफी ज्यादा तरक्की की थी लेकिन दोस्तों क्या आप लोगों को मालूम है कि जब राजा अकबर इतना बड़ा महान व्यक्ति था तो उसकी जब मृत्यु हुई तब उसके सब को राजकीय सम्मान के साथ क्यों नहीं जलाया गया। आज हम आप लोगों को बताने वाले हैं कि आखिर राजा अकबर की मृत्यु के बाद उसके शव के साथ क्या किया गया था। दोस्तों जब राजा अकबर की मृत्यु हुई थी उनके शव को बिना किसी राजकीय सम्मान और बिना अंतिम संस्कार के दुर्ग के पीछे दीवार तोड़कर सिकंदरा में दफना दिया। इसका कारण यह था कि उस समय अफगान के लोग मुगल साम्राज्य पर हावी हो रहे थे जिसके कारण मुगल साम्राज्य के लोग चाहते थे कि राजा अकबर की मृत्यु के बारे में अफगान लोगों को मालूम ना हो। उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Real Hindi Stories प्यार या संस्कार

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, अदिति ने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद बेंगलुरु महानगर के एक नामीगिरमी कालेज में मैनेजमैंट कोर्स में ऐडमिशन लिया तो मानो उस के सपनों को पंख लग गए. उस के जीवन की सोच से ले कर संस्कार तथा सपनो से ले कर लाइफस्टाइल सभी तेजी से बदल गए. अदिति के जीवन में कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीकठाक चलता रहा, लेकिन अचानक उस के जीवन में उस के ही कालेज के एक छात्र प्रतीक की दस्तक के कारण जो मोड़ आया वह उस पहले प्यार के बवंडर से खुद को सुरक्षित नहीं रख पाई. अदिति बहुत जल्दी प्रतीक के प्यार के मोहपाश में इस तरह जकड़ गई मानो वह पहले कभी उस से अलग और अनजान नहीं थी. जवानी की दहलीज पर पहले प्यार की अनूठी कशिश में अदिति अपने जीवन के बीते दिनों तथा परिवार की चाहतों को पूरी तरह से विस्मृत कर चुकी थी. प्रतीक के प्यार में सुधबुध खो बैठी अदिति अपने सब से खूबसूरत ख्वाब के जिस रास्ते पर चल पड़ी वहां से पीछे मुड़ने का कोईर् रास्ता न तो उसे सूझा और न ही वह उस के लिए तैयार थी. गरमी की छुट्टी में जब अदिति अपने घर वापस आई तो उस के बदले हावभाव देख कर उस की अनुभवी मां को बेटी के बहके पांवों की चाल समझते देर नहीं लगी. जल्दी ही छिपे प्यार की कहानी किसी आईने की तरह बिलकुल साफ हो गई और मां को पहली बार अपनी गुडि़या सरीखी मासूम बेटी अचानक ही बहुत बड़ी लगने लगी. अदिति ने अपनी मां से प्रतीक से शादी के लिए शुरू में तो काफी विनती की, लेकिन मां के इनकार को देखते हुए वह जिद पर अड़ गई. अदिति के पिता तो उसी वक्त गुजर गए थे जब अदिति ठीक से चलना भी नहीं सीख पाई थी. मां और बेटी के अलावा उस छोटे से संसार में प्रतीक के प्रवेश की तैयारी के लिए एक बड़ा द्वंद्व और दुविधा का जो माहौल तैयार हो गया था वह सब के लिए दुखदायी था, जिस की मद्घिम लौ में मां को अपनी बेटी के चिरपोषित सपनों की दुनिया जल जाने का मंजर साफ नजर आ रहा था. ‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो? मैं प्रतीक से सच्चा प्यार करती हूं. वह ऐसावैसा लड़का नहीं है. वह अच्छे घर से है और निहायत शरीफ है. क्या बुरा है, यदि मैं उस से शादी करना चाहती हूं,’’ अदिति ने बड़े साफ लहजे में अपनी मां को अपने विचारों से अवगत कराया. मां अपनी बेटी के इस कठोर निर्णय से काफी आहत हुईं लेकिन खुद को संयमित करते हुए अदिति को अपने सांस्कारिक मूल्यों तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों का एहसास कराने की काफी कोशिश करती हुई बोलीं, ‘‘बेटी, मैं सबकुछ समझती हूं, लेकिन अपने भी कुछ संस्कार होते हैं. तुम्हारे पापा ने तुम्हारे लिए क्या सपने संजो रखे थे लेकिन तुम उन सपनों का इतनी जल्दी गला घोंट दोगी, इस बारे में तो मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था. अपनी जिद छोड़ो और अभी अपने भविष्य को संवारो. प्यार मुहब्बत और शादी के लिए अभी बहुत वक्त पड़ा है.’’ ‘‘मां, आप समझती नहीं हैं, प्यार संस्कार नहीं देखता, यह तो जीवन में देखे गए सपनों का प्रश्न होता है. मैं ने प्रतीक के साथ जीवन के न जाने कितने खूबसूरत सपने देखे हैं, लेकिन मैं यह भूल गई थी कि मेरे इंद्रधनुषी सपनों के पंख इतनी बेरहमी से कुतर दिए जाएंगे. आखिर, तुम्हें मेरे सपनों के टूटने से क्या?’’ ‘‘बेटी, सच पूछो तो प्रतीक के साथ तुम्हारा प्यार केवल तुम्हारे जीवन के लिए नहीं है. जीवन के रंगीन सपनों के दिलकश पंख पर बेतहाशा उड़ने की जिद में अपनों को लगे जख्म और दर्द के बारे में क्या तुम ने कभी सोचा है? प्यार का नाम केवल अपने सपनों को साकार होते देखनाभर नहीं है. वह सपना सपना ही क्या जो अपनों के दर्द की दास्तान की सीढ़ी पर चढ़ कर साकार किया गया हो. ‘‘आज तुम्हें मेरी बातें बचकानी लगती होंगी, लेकिन मेरी मानो जब कल तुम भी मेरी जगह पर आओगी और तुम्हारे अपने ही इस तरह की नासमझी की बातों को मनवाने के लिए तुम से जिद करेंगे तो तुम्हें पता चलेगा कि दिल में कितनी पीड़ा होती है. मन में अपनों द्वारा दिए गए क्लेश का शूल कितना चुभता है.’’ अदिति अपनी मां के मुंह से इस कड़वी सचाई को सुन कर थोड़ी देर के लिए सन्न रह गई. उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर अनजाने ही हाथ रख दिया हो. उस के जेहन में अनायास ही बचपन से ले कर अब तक अपनी मां द्वारा उस के लालनपालन के साथसाथ पढ़ाई के खर्चे के लिए संघर्ष करने की कहानी का हर दृश्य किसी सिनेमा की रील की भांति दौड़ता चला गया. अनायास ही उस की आंखें भर आईं. मन पर भ्रम और दुविधा की लंबे अरसे से पड़ी धूल की परत साफ हो चुकी थी और सबकुछ किसी शीशे की तरह साफसाफ प्रतीत होने लगा था. लेकिन बीते हुए कल के उस दर्र्द के आंसू को अपनी मां से छिपाते हुए वह भाग कर अपने कमरे में चली गई. अपनी मां की दिल को छू लेने वाली बातों ने अदिति को मानो एक गहरी नींद से जगा दिया हो. छुट्टियों के बाद अदिति अपने कालेज वापस आ गई और जीवन फिर परिवर्तन के एक नए दौर से गुजरने लगा. कालेज वापस लौटने के बाद अदिति गुमसुम रहने लगी. प्रतीक से भी वह कम ही बातें करती थी, बल्कि उस ने उसे शादी के बारे में अपनी मां की मरजी से भी अवगत करा दिया और इस तरह मंजिल तक पहुंचने से पहले ही दोनों की राहें अलग अलग हो गईं. कालेज के अंतिम वर्ष में कैंपस सिलैक्शन में प्रतीक को किसी मल्टीनैशनल कंपनी में ट्रेनी मैनेजर के रूप में यूरोप का असाइनमैंट मिला और अदिति ने किसी दूसरी मल्टीनैशनल कंपनी में क्वालिटी कंट्रोल ऐग्जीक्यूटिव के रूप में अपनी प्लेसमैंट की जगह बेंगलुरु को ही चुन लिया. अदिति अपनी मां के साथ इस मैट्रोपोलिटन सिटी में रह कर जीवन गुजारने लगी. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. इसी बीच कंपनी ने अदिति को 1 वर्ष के फौरेन असाइनमैंट पर आस्ट्रेलिया भेजने का निर्णय लिया. अदिति अपनी मां के साथ जब आस्टे्रलिया के सिडनी शहर आई तो संयोग से वहीं पर एक दिन किसी शौपिंग मौल में उस की प्रतीक से मुलाकात हो गई. अदिति के लिए यह एक सुखद लमहा था, जिस की नरम कशिश में वर्षों पूर्व के संबंधों की यादें बड़ी तेजी से ताजी हो गईं. लेकिन भविष्य में इस संबंध के मुकम्मल न होने के भय ने उस के पैर वापस खींच लिए. प्रतीक अपने क्वार्टर में अकेला रहता था और अकसर हर रोज शाम के वक्त वह अदिति के घर पर आ जाया करता था. मां को भी अपने घर में अपने देश के एक परिचित के रूप में प्रतीक का आना जाना अच्छा लगता था, क्योंकि परदेश में उस के अलावा सुख दुख बांटने वाला और कोई भी तो नहीं था. अचानक एक दिन औफिस से घर लौटते वक्त अदिति की औफिस कार की किसी प्राइवेट कार के साथ टक्कर हो गई और अदिति को सिर में काफी चोट आई. महीनेभर तक अदिति हौस्पिटल में ऐडमिट रही और इस दौरान उस का और उस की मां का ध्यान रखने वाला प्रतीक के अलावा और कोई नहीं था. प्रतीक ने मुसीबत की इस घड़ी में अदिति और उस की मां का भरपूर ध्यान रखा और इसी बीच अदिति और प्रतीक फिर से कब एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि उन्हें इस का पता ही नहीं चला. अदिति का यूरोप असाइनमैंट खत्म होने वाला था और उसे अब अपने देश वापस आना था. अदिति और उस की मां को छोड़ने के लिए प्रतीक भी बेंगलुरु आया था. प्रतीक के सेवाभाव से अदिति की मां अभिभूत हो गई थीं. प्रतीक सिडनी वापस जाने की पूर्व संध्या पर अपने मम्मीडैडी के साथ अदिति से मुलाकात करने आया था. अदिति का व्यवहार तथा शालीनता देख कर प्रतीक के पेरैंट्स काफी खुश हुए. प्रतीक की अगले दिन फ्लाइट थी. एयरपोर्ट पर बोर्डिंग के समय जब अदिति का फोन आया तो उस के दिलोदिमाग में एक अजीब हलचल मच गई. पुराने प्यार की सुखद और नरम बयार में प्रतीक के मन का कोनाकोना सिहर उठा. प्रतीक ने अपनी फ्लाइट कैंसिल करवा ली. उस ने अपनी कंपनी को बेंगलुरु में ही उसे शिफ्ट करने के लिए रिक्वैस्ट भेज दी जो कुछ दिनों में अपू्रव भी हो गई. अदिति की मां प्रतीक के इस फैसले से काफी प्रभावित हुईं. अदिति हमेशा के लिए अब प्रतीक की हो गई थी और वह मां के साथ ही बेंगलुरु में रहने लगी थी. प्रतीक अपनी खुली आंखों से अपने सपने को अपनी बांहों में पा कर खुशी से फूले नहीं समा रहा था. अदिति के पांव भी जमीं पर नहीं पड़ रहे थे. उसे आज जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि धरती की तरह सपनों की दुनिया भी गोल होती है और सितारे भले ही टूटते हों, लेकिन यदि विश्वास मजबूत हो तो सपने कभी नहीं टूटते. उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Real Stories भोले भक्त की भक्ति

एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था। एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम में आया और बोला कि बाबा आप सब का ध्यान रखते है, मेरा इस दुनिया मेँ कोई नही है तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम में रह सकता हूँ ? बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है ? उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ। तब संत ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना। रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा। उन संत की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ रुकेगा ? संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे.! क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे। अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था। बालक रामदास संत के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ। संत ने कहा ठीक हैँ पर तुझे काम करना पड़ेगा आश्रम की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा मे कोई कमी मत रखना। रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप बता दिजिये के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है ? फिर मैँ कर दूंगा। संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार की झाँकी थी। श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी थे. संत ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है सब सिखा दिया। रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योँकि अगर रिश्ता पता चल जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा। उन संत ने बालक रामदास कहा की तू कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज से ये राम जी और सीता जी तेरे माता-पिता हैँ। रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है ? संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है। रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये। आज सेवा का पहला दिन था, रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया ,आश्रम की साफ़ सफाई की,और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया। रामदास ने श्री राम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा। रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर खायेंगे. पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी। तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिश्ता बना हैँ तो शरमा रहेँ होँगे। रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था। अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ ! और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और मैँ भूख से मर जाऊँगा..! इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा। रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब भगवान राम जी हनुमान जी को कहते हैँ हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ। हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो? रामदास कहता हैँ आप कौन ? हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ? रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहा बोल रहा था की खाना खा लो तब आये नहीँ अब क्योँ आ गये ? तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे। फिर राम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी , हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैँ। इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता। सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा घर मैँ ५ लोग हैं,सारा काम में ही अकेला करता हुँ ,बाकी लोग तो दिन भर घर में आराम करते है.मेरे माँ, बाप ,चाचा ,भाई तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ. मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा। रामदास मंदिर जाता हैँ ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।राम जी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ ? रामदास कहता हैँ की घर में मैं सबसे छोटा हुँ ,और मैं ही सब काम करता हुँ।अब से मैँ अकेले काम नहीँ करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा,आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा। राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है?रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले. और चाचा जी (लक्ष्मणजी) आप घर की साफ़ सफाई करियेगा. भैय्या जी (हनुमान जी)शरीर से मज़बूत हैं ,जाकर जंगल से लकड़ियाँ लाइयेंगे. पिता जी (रामजी) आप बाज़ार से राशन लाइए और घर पर बैठकर पत्तल बनाओँगे। सबने कहा ठीक हैँ।मैंने बहुत दिन अकेले सब काम किया अब मैं आराम करूँगा. अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ। एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो देखा आश्रम तो शीशे जैसा चमक रहा है, वो बहुत प्रसन्न हुए.मंदिर मेँ गये और देखा की मंदिर से प्रतिमाऐँ गायब हैँ. संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीँ दी ? संत ने रामदास को बुलाया और पूछा भगवान कहा गये रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता हनुमान भैया जंगल लकड़ी लाने गए होंगे,लखन चाचा झाड़ू पोछा कर रहे होंगे,पिताजी राम पत्तल बन रहे होंगे माता सीता रसोई मेँ काम कर रही होंगी. संत बोले ये क्या बोल रहा ? रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जब से आप गये हैँ ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ। वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ राम जी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये। संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तू धन्य हैँ। और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये…! रामदास जैसे भोले,निश्छल भक्तो की भक्ति से विवश होकर भगवान को भी साधारण मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने आना पड़ता है. जय श्री राम उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.