Stories लहरें बुलाती हैं प्यारी कहानी

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‘आचरण, सभ्यता, नेक–नियम और मानवता से भरे आदर्शो के उपदेश केवल धार्मिक ग्रंथों में ही पढ़ने को मिला करते हैं, काकेष जी। वस्तविक जीवन में इनका प्रयोग करने वाला मसीहा, येरूशलेम के बैतलहम में दोबारा पैदा होते मैंने आज तक नहीं देखा है।’ ‘जी, सुनिये।’ ?’गुमसुम, खोई–खोई सी, अपने ही ख्यालों में डूबी हुई, सागर की मदमस्त लहराती हुई लहरों को देखती हुई कज़ली के कानों में अनजाना सा स्वर सुनाई पड़ा तो वह सहसा ही चौंक गई। उसने गर्दन घुमा कर पीछे देखा तो किसी लंबे, एकहरे बदन और कंधों तक उसके सागर की ख़ारी ठंडी वायु में झूलते हुये लंबे बालों वाले अनजान आगुन्तक को अपने हाथों में मछली पकड़ने की डोर और छड़ी को लिये हुये देख वह सहसा, सहम सी गई। कज़ली का यूं आश्चर्य करना और चौंकना वहुत स्वभाविक भी था। जिस पुरूष को उसने इससे पहले न देखा और जाना था, वही उससे संबोधित था, यह जानकर वह और भी आश्चर्य से गड़ गई थी। मगर उस अनजान व्यक्ति से वह कुछ कहती, इससे पूर्व ही वह पुरूष बोला, ‘आप यूं घबराइये नहीं। मेरा नाम काकेष है। और मैं यही सवाना में रहता हूं और बैल साउथ फोन कंपनी में काम किया करता हूं। जब भी ‘वीकेंड’ में छुट्टी होती है, या फिर कोई अन्य अवकाश मिल जाता है, तो मछली की डोर उठाकर यहां चला आता हूं। ‘फिशिंग’ करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। जब भी यहां आता हूं तो आपको अक्सर यहां बैठे देखा करता हूं। हांलाकि, मुझे आपके इस तरह अकेले, एकांतमयी तरीके से बैठे देख कोई विशेष परेशानी तो नहीं होती है, लेकिन बड़ा अजीब सा लगता है। क्या मैं जान सकता . . .’ ‘जिस तरह से आपको भोली–भोली, सागर की लहरों में झूमती, लहराती मछालियों को लालच और छोखा देकर अपने कांटे में फांसना अच्छा लगता है, मेरा शौक वैसा तो नहीं है। बस ये सागर, इसकी कल–कल करती हुई अपने शोर से अनजान, इसकी बेफिक्र, दुनियां के हर ग़म से महरूम खेलती हुई लहरें मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। ऐसा लगता है कि ये लहरें मुझे आवाज़ देती हैं.– मुझे पुकार–पुकार कर बुलाती हैं, और मैं यहां इनसे बगैर कोई शिकायत किये हुये चुपचाप चली आती हूं।’ काकेष की अधूरी बात को बीच में ही काट कर, और अपनी बात कहकर कज़ली उठकर जाने लगी तो काकेष ने उसे रोका। बोला, ‘क्या मैं आपका परिचय . . .?’ ‘बुरा मत मानियेगा। सागर की इन लहरों से प्यार करने वाली ये कज़ली केवल अपने नाम के सिवा कोई और परिचय नहीं दे सकेगी।’ कहती हुई कज़ली सचमुच चली गई तो काकेष चुपचाप उसे तब तक जाते हुये निहारता रहा जब तक कि वह उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गई थी। . . .सोचते–सोचते अचानक ही काकेष की स्मृतियों को एक झटका सा लगा। वह यादों के भंवरजाल से निकल कर बाहर आया। अपनी आंखों पर हाथ रखा तो ख़ारे सागर के जल से भी अधिक संवेदनशील अंगुलियों की पोरें पलकों पर बैठे हुये उदास आंसुओं से तर हो गईं। लगा कि इन ठंडे आंसुओं की कोख़ में ठहरी हुई तपन ने उसके मुख पर वह अचानक तमाचा सा जड़ दिया है जो उसके जीवन की एक ला–परवा भूल के समान, उसके बदन से रंज–ओ–ग़म के कोहरे के समान सदैव ही चिपका रहेगा। उसकी ज़िन्दगी की दर्द–भरी स्मृतियों का वह कोहरा जो अब जितना अधिक छंटेगा, उससे कहीं ज्यादा बढ़ता भी जायेगा। काकेष ने नीरस और उदास मन की भावनाओं से अपने आस–पास के वातावरण को देखा। दूर क्षितिज में सूर्य की लाली की अंतिम रशिम भी अपना दम तोड़ रही थी और सागर की शांत होती हुई लहरों में बादलों की छोर से सूर्य की रश्मियों का बदन गल–गल कर किसी पिघले हुये सोने के समान बहता जा रहा था। लहरों के किनारे की बालू में दिन भर से खेलते, लिपटने और विशाल सागर के नीले जल में नहाते हुये अर्धनग्न मानव जिस्मों का प्रदर्शन अब काफी हद तक कम हो चुका था। चीं–चीं करती हुई सागर की लहरों में डॉलफिनों का स्वर यदा–कदा ही सुनाई देते थे। शहर की बत्तियां जगमगा कर रात की रंगीनियों के नाच–गाने और जश्न आदि की पूर्व तैयारियों का संकेत देने लगी थीं। काकेष अभी तक बैठा हुआ था। अमरीका के राज्य जार्जिया के मशहूर शहर सवाना में बसे समुद्री टापू के ठीक उसी स्थान पर जहां पर कभी सागर की ‘लिटिल मरमेड एरियल’ से भी अति सुन्दर कज़ली बेहद ख़ामोशी से बैठी रहती थी। वक्त का तकाज़ा था कि आज काकेष उसी स्थान पर बैठा हुआ था। चुपचाप, अपनी पूर्व मुद्रा में। बिल्कुल ख़ामोश, बहुत चुप, उदास, मूक, अपने सिर पर अपनी ज़िन्दगी का जैसे भरपूर वह भारी भरकम बोझ लादे हुये कि जिसको उठाये हुये वह पिछले कई महिनों से बगैर शिकायत के ढोता चला आ रहा था। यहां बैठा–बैठा कुछेक पलों में ही वह अपने जीवन की उस महत्वपूर्ण घटना को फिर एक बार दोहरा गया था कि, जिसने उसके जीवन के कारवां का रूख ऐसी दिशा की तरफ मोड़ दिया था कि जिसके कारण उसे ना तो मंजिल ही मिली थी और ना ही मार्ग। काकेष के द्वारा बहुत आग्रह करने और अपना विश्वास दिलाने पर उसे याद है कि कज़ली ने कितनी सच और सटीक बात उससे कही थी, ‘आचरण, सभ्यता, नेक–नियम और मानवता से भरे आदर्शो के उपदेश केवल धार्मिक ग्रंथों में ही पढ़ने को मिला करते हैं, काकेष जी। वस्तविक जीवन में इनका प्रयोग करने वाला मसीहा, येरूशलेम के बैतलहम में दोबारा पैदा होते मैंने आज तक नहीं देखा है।’ स्मृतियों की मनमोहक सुगंध बनकर कज़ली जितनी जल्दी उसके जीवन में आई थी, उतना शीघ्र ही वह चली भी गई थी। कज़ली! कुदरती तौर पर काजल की कभी भी न मोहताज रहनेवाली आंखों की मालिक और असाधारण रूप की सुन्दरी, इस बाला का नाम शायद उसकी आंखों की विशेषता के आधार पर ही रखा गया होगा? भारतीय मूल की निवासी ये लड़की यदि अमरीका के सवाना के एक कॉलेज में पढ़ने नहीं आई होती तो काकेष से उसका परिचय शायद कभी भी नहीं हो पाता। कज़ली आई और आकर काकेष के शान्तमय जीवन में वह सवालों की दुनियां दिखाकर लुप्त हो चुकी थी कि जिसके केवल एक प्रश्न को भी शायद वह अब कभी भी हल नहीं कर सकता था? फिर धीरे–धीरे मुलाकातें बढ़ीं, वे दोनों और नज़दीक आये तथा बात–चीत के संदर्भ औपचारिक बातों से आगे निकलने लगे तो एक दिन काकेष ने कज़ली से कहा कि, ‘कज़ली जी, मेरा मन चाहता है कि इस समुद्र की बालू पर आपका नाम लिखूं, और जब उसकी लहरें आकर आपका नाम बिगाड़ दें तो उसके हरेक अक्षर को ढूंढ़ता हुआ मैं भी इस सागर के गर्भ में सदा को खो जाऊं।’ काकेष की बात सुनकर, कज़ली पल भर को गंभीर हो गई। काकेष ने देखा तो उसे लगा कि उसकी आंखों में लगा कुदरती काज़ल अचानक ही फैलने लगा है। इस प्रकार कि जैसे किसी शांत झील के तल में बैठी हुई किसी बड़ी मछली ने अचानक ही करवट ली हो, और फिर उसकी करवट से सारे झील के पानी में हलचल सी मच गई हो। कज़ली की आंखों में आये हुये आंसू देखकर काकेष का भी मन एक बार को सहम सा गया। वह अपनी भूल स्वीकारते हुये बोला, ‘मुझे क्षमा करना कज़ली जी! मेरा आशय आपको नाहक रूलाना नहीं था। आप अपने जीवन में सदैव ही खुश रहें, मुस्कराती रहें, मैं तो बस यही दुआ करता रहूंगा।‘ काकेष की बात में उसके लिये भविष्य के प्यार का निमंत्रण था। एक अनकही मुहब्बतों की दरिया में भीगी हुई उसकी चाहत की आरजू थी। कज़ली को समझते देर भी नहीं लगी। सच ही तो था। युवा लड़की कुछ समझे न समझे लेकिन किसी के द्वारा प्यार के अच्छे और बुरे निमंत्रण को सहज ही भांप जाती है। कज़ली भी समझ चुकी थी, पर ये नहीं जानती थी कि वह उसका रहनुमा बन कर आय था या फिर महज एक पाश्चातीय तरीके का मात्र ‘बॉय फ्रेंड’ बन कर ही। वह अभी तक चुप ही थी। बड़ी ख़ामोशी के साथ सागर की उठती–गिरती लहरों को वह फिर से निहारने लगी थी। ‘आप मुझ पर विश्वास कर सकती हैं। अपने बारे में मैं केवल यही विश्वास दिला सकता हूं।‘ काकेष ने कहा और फिर वह कज़ली के उत्तर की प्रतीक्षा किये बगैर आगे बोला, ‘चलिये, कहीं चलकर कोई शीतल पेय लेते हैं।’ फिर थोड़ी ही देर बाद वे दोनों पास ही में बने एक रेस्टोरेंट में बैठे हुये थे। काकेष काऊंटर पर जाकर दो कप ‘स्ट्राबेरी शेक’ बनवा कर ले आया था। ‘आप सदा सफेद रंग की साड़ी या फिर पंजाबी सूट ही पहना करती हैं?’ काकेष ने कज़ली के बस्त्रों को देखते हुये अचानक ही कहा तो कज़ली के होठों पर पल भर में हल्की सी मुस्कान आई और चली भी गई। वह बोली, ‘आप क्या हर समय मुझको ही परखते रहते हैं?’ ‘नहीं, आपको देखकर यही सोचता रहता हूं कि परमेश्वर ने जब दुनियां बनाई थी तो उसमें कोई न कोई कमी तो रह ही गई थी। और वह कमी ऐसी थी कि जिसको पूरा करने के लिये वह आज भी इस दुनियां को तोड़ता है, बनाता है, बिगाड़ता है, फिर से बनाता है, मगर वह कमी फिर भी पूरी नहीं हो पाई है।’ ‘आप कहना क्या चाहते हैं?’ ‘यही कि, जब परमेश्वर ने आपको बनाया था तब उसने कोई भी कमी नहीं छोड़ी थी।’ ‘?’ काकेष की बात पर कज़ली अचानक ही गंभीर हो गई तो वह बोला कि, ‘आप क्या सोचने लगी यूं अचानक से?’ ‘आप मेरे बारे मैं कुछ नहीं जानते हैं, शायद इसीलिये इतनी बड़ी बात कह बैठे हैं।’ कज़ली बोली। ‘हां, यह तो सच है। मैं आपके बारे में केवल आपकी उपस्थिति के सिवा कुछ भी नहीं जानता हूं, मगर दुख है कि आप बताना भी नहीं चाहती हैं?’ ‘सुन कर क्या करेंगे?’ ‘दुख की बात होगी तो आपका दुख बांटने की कोशिश करूंगा। किसी मुसीबत की बात होगी तो छुटकारा दिलाना चाहूंगा।’ ‘बेहतर होगा कि आप मुझे भूलने की कोशिश करियेगा।’ ‘इतनी बड़ी सजा सुनाने से पहले मेरा अपराध तो बता दिया होता?’ ‘मैं जब सयानी हो गई और जब मैंने इण्टर की परीक्षा पास कर ली तो कॉलेज जाने से पूर्व ही मेरी मां ने मुझे चेतावनी दी थी और कहा था कि, ‘बेटी, इस संसार में सब कुछ करना, लेकिन किसी भी बड़े घर के लड़के से प्रेम–प्रीत मत कर बैठना।‘ ‘आपको कैसे मालुम है कि मैं किसी बड़े घर का हूं?’ ‘क्यों, ये भी कोई पूछने वाली बात है? विदेश में रहने वाले प्रवासी भारतीय किसी नंगी–भूखी झोपड़ी में से तो नहीं आते हैं?’ ‘विदेश में तो आप भी है?’ ‘मेरी तो मजबूरी मुझे यहां तक ले आई है। मैं वहां रहकर नहीं पढ़ सकती थी। पढ़ाई पूरी होते ही मैं वापस चली जाऊंगी।’ ‘यह आपने कैसे सोच लिया? कैसे चली जायेंगी। मैं जाने दूंगा तब न?’ ‘?’ कज़ली के होठो तक स्ट्राबेरी का गिलास जाते–जाते थम गया। उसने आश्चर्य से काकेष को देखा तो वह बोला कि, ‘मेरा मतलब है कि यदि मैंने आपके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और आपने मान लिया तब कैसे जा सकेंगी?’ ‘मैं आपसे शादी नहीं कर सकती हूं।’ ‘हम दोनों मसीही हैं, फिर भी इस अस्वीकृति का कारण जान सकता हूं?’ ‘यदि साहस है तो कारण मेरी मां से जाकर पूछिये।’ ‘विवाह आपको करना है या आपकी मां को?’ ‘?’ ख़ामोशी। कज़ली फिर चुप रह गई तो काकेष ने उससे आगे पूछा, ‘फर्ज करो, तुम्हारी मां ने यदि इस रिश्ते की मंजूरी दे दी तब तो तुम पीछे नहीं हटोगी?’ उत्तर में कज़ली ने अपनी निगाहें झुका लीं तो काकेष को समझते देर नहीं लगी। स्त्री की झुकी निगाहें ही उसकी मौन स्वीकृति हुआ करती है। ‘ठीक है तुम अपनी मां का पता, फोन नंबर आदि दो, तब मैं अपने मां–बाप से कहूंगा कि वे जाकर तुम्हारी मां से मिलें।’ उस दिन की बात इसी स्थान पर आकर ठहर गई तो फिर वे दोनों अपने–अपने निवास स्थानों पर चले गये। साथ ही काकेष ने कज़ली को उसके भीवष्य की मंजिल का सुनहरा सा चित्र दिखाया तो वह भी सपने देखने लगी। इस तरह से दोनों अक्सर मिलते रहे। बात–चीतें होती रही। प्यार के सुन्दर सपनों के मध्य दोनों के कहकहे वायु में गूंजते हुये सागर की लहरों में इस प्रकार से घुलने लगे कि अब दोनों की शामें सवाना के इस ‘टॉयबी आईलेंड’ की जैसे आवश्यकता बन चुकी थीं। हांलाकि सब कुछ वैसा ही था, फर्क था तो केवल इतना ही कि कज़ली को अब सागर की लहरों से पहले काकेष बुलाने लगा था और काकेष के हाथों में भी मछली पकड़ने की डोर नदारद हो चुकी थी –– शायद इसका कारण भी यही था कि अपने जीवन की महत्वपूर्ण और वास्तविक मछली को वह अब पकड़ ही चुका था। कज़ली प्राय: ही संध्या होते ही छुट्टी वाले दिन या फिर कॉलेज समाप्त होते ही सागर के किनारे आकर काकेष की प्रतीक्षा करने लगती। बाद में काकेष भी आ जाता। फिर दोनों सागर की बालू के किनार बैठ जाते। ढेरों–ढेर बात करतें। बातें भी ऐसी कि जो समाप्त होने का नाम ही नहीं लेतीं। दोनों इतनी देर तक बैठे रहते कि शाम भी गहराने लगी। सागर की मचलती हुई लहरें आगे बढ़ कर उनके पैरों को छूने लगतीं। फिर बाद में वे दोनों उठते। मन मार कर। साथ ही जाते और कहीं भी एक साथ बैठ कर शाम का खाना खाते, फिर जुदा होते, दूसरे दिन मिलने की आस लेकर दोनों अपने–अपने ठिकानों पर चले जाते। कज़ली अब प्रतीक्षा करने लगी थी, काकेष के मां–बाप के उत्तर की। उसके मां–बाप उसकी मां के पास गये कि नहीं। हांलाकि कज़ली ने भी अपनी मां को फोन के द्वारा काकेष के बारे में सब बता दिया था। तब फिर एक दिन कज़ली सागर की लहरों को दिखती हुई काकेष को आने की प्रतीक्षा करती रही। उस दिन वह नहीं आया था या नहीं आ सका था, कज़ली कुछ निर्णय नहीं ले पाई थी। फिर जब शाम डूब गई तो वह निराश मन से अपने कॉलेज के कैम्पस में चुपचाप चली आई। हॉस्टल के कमरे की लैंड लाइन के फोन पर किसी का मेसेज़ था, फोन की पल–पल में बुझती और बंद होती बत्ती इस बात का संकेत दे रही थी। उसने मेसेज सुना। काकेष का ही फोन था। वह बोल रहा था कि, ‘कज़ली मेरे मां–बाप टीकटपाड़ा में तुम्हारी मां के घर जाकर उनसे मिले थे। मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ पता चल गया है। मेरे मां–बाप को यह रिश्ता स्वीकार नहीं है। जब से मुझे अपनी मां का मेसेज़ मिला है, मैं बहुत ज्यादा ‘अपसेट’ हूं। समझ में नहीं आता है कि मैं क्या करूं? मैं तुम्हें भी नहीं खोना चाहता हूं और अपने परिवार के विरूद्ध जाकर उन सबको भी नाराज़ नहीं करना चाहता हूं। आज मैं ‘टायबी’ पर सागर के किनारे नहीं आ सकूंगा। हो सका तो जल्दी ही तुमको फिर फोन करूंगा।’ कज़ली ने सुना तो अपना सिर पकड़कर बैठ गई। समझ में नहीं आया कि वह क्या करे? प्यार की डगर पर जबरन घसीटकर लाने वाला ही अब डगर छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था। उसने तो पहले ही आगाह कर देना चाहा था कि उन दोनों का यह रिश्ता कभी भी नहीं हो सकता है। पर क्या करे, जिन मार्गो पर वह चली थी उनका अंजाम कुछ–कुछ ऐसा ही तो होना था। उसकी मां ने उसे जन्म तो दिया है, पर उसके पिता का नाम वह भी नहीं बता सकती है। इतना अवश्य ही है, कि जिस कीचड़ में रहकर उसकी मां ने उसकी परवरिश की, उसे पाला–पोसा और यहां तक पहुंचाया, उस गंदगी से उसे जरूर ही दूर रखा है। लेकिन केवल अलग भर रहने से ही उसके बदन पर लगे हुये काले कलंक के धब्बे तो नहीं मिट जायेंगे। उसकी मां कितने वैभव और ठाठ से अपनी ज़िन्दगी बसर करती है, पर है तो एक काल गर्ल ही। क्या मसीहियत और आज का मसीही समाज इस प्रकार की जन्मी हुई संतानों को सहज ही स्वीकार कर सकता है? इसमें निश्चय ही सन्देह है। उस शाम और सारी रात कज़ली एक मिनट को भी नहीं सो सकी। बार–बार उसे यही लगता कि ऐसा कब तक चलेगा? आज काकेष ने ऐसा किया तो कल को कोई दूसरा काकेष भी ऐसा नहीं करेगा क्या? ऐसा जीवन जीने से फायदा भी क्या? वह जीवन भी क्या जो ना तो खुद के ही काम आ सका है और ना ही कभी दूसरों के आ सकेगा। काकेष का भविष्य का उत्तर उसके प्रति क्या है, यह उसे पता चल ही चुका है। यदि काकेष को उसकी मां के कार्यों तथा उसके पिछले जीवन से कोई सरोकार नहीं होता और वह केवल उससे ही मतलब रखता तो वह कभी इस बात का ज़िक्र ही नहीं करता। फिर बाद में हुआ भी ऐसा ही। काकेष ने ना तो फिर कोई फोन किया, ना ही वह सागर पर आया और न ही कोई सन्देश ही छोड़ा। उसकी चुप्पी कज़ली के जीवन से चुपचाप हुई पलायनता ही है, यह समझते कज़ली को देर भी नहीं लगी। मन की सच्ची भावनाओं से प्यार करने वाले को मिला हुआ जबर्दस्त धोखा उसे कहीं का भी नहीं छोड़ता है। जीवन की ये कठोर ठोकर जब एक बार लग जाती है तो फिर वह हर पल उसे दौंचती रहती है। यही हाल कज़ली का भी हुआ। भावनाओं का तूफान उसके सिर पर उसकी मौत बन कर मंडराने लगा। उसके दिल में बुरे ख्याल आने लगे। इस प्रकार कि वह अपने जीवन का अंत करने के बारे में सोचने लगी। ज़िन्दगी के जब पहले–पहले प्यार ने ही उस पर तरस नहीं खाया तो फिर वह दूसरों पर कैसे उम्मीद कर सकती है? फिर एक दिन वह पुन: सागर पर गई और जाकर वहीं बैठ गई जहां पर वह काकेष से मिलने से पूर्व बैठा करती थी। आज शायद वह सारी तैयारियां करके ही आई थी। सागर की उफ़ान से हर पल भरती हुई लहरें उसे देखते ही जैसे और भी अधिक जोश से भर गईं। शायद कज़ली को देखते ही प्रसन्न हो चुकी थीं। इतनी तीव्रता से वे उछल रही थीं कि उनके एक ही उछाल में कज़ली का सारा मुख तक भीग जाता था। कज़ली लहरों को देखती और सोचती कि ये लहरें उससे कितना अधिक प्यार करती हैं। जब भी वह यहां आकर बैठ जाती है तो ये सदैव ही उछल–उछल कर उसे चूमने की कोशिश करने लगती हैं। किसकदर ये उससे प्यार करने लगी हैं। इसकदर कि जैसे उसे अपने आगोश में समा लेना चाहती हैं। ये तो उसे सदा से बुलाती आई हैं, पर वही उनसे दूर भागती रही है। क्यों न वह इन्हीं के गर्भ में समा जाये? कज़ली सोचती रही। विचारती रही। रोती रही। अपनी किस्मत पर आंसू बहाती रही। भावनाओं का सिर चढ़ा हुआ तूफान उसके मस्तिष्क को हर पल कुरेदता ही रहा। फिर जब शाम ढल गई। सागर के किनारे लहरों से खेलनेवाले अपने बदनों से तौलिया आदि लपेटकर चले गये। बालू के किनारे इक्का–दुक्का लोग ही दिखने लगे तथा दूर शहर की जलती हुई विद्युत बत्तिंयों के प्रतिबिंब सागर की लहरों में डोलने लगे, तभी उवसर देखते ही कज़ली ने सागर की लहरों में छलांग लगा दी। आवाज़ आई तो किसी ने उसे कूदते हुये देख लिया। तट रक्षकों को सूचित किया। गोताख़ोर सागर में कूदे। कज़ली को जब तक बाहर निकाला गया, तब तक वह इस दुनियां से बहुत दूर उस स्थान पर जा चुकी थी, जहां पर उसकी पिछली ज़िन्दगी से नफ़रत करने वाला संसारिक मनुष्य नहीं बल्कि अथाह प्यार करने वाला नाज़रत गांव का बढ़ई रहता है। सच ही तो है कि यह संसार सब लोगों को शांति से जीने की हांमी कभी नहीं भरता है। मनुष्य का जीवन किसी को भी खैरात में नहीं मिला करता है –– हां, खैरात में लुटाया जरूर जा सकता है। मरने से पूर्व कज़ली कोई भी सूचना अपने बारे में देकर नहीं गई थी। सवाना नगर की पुलिस ने छानबीन आरंभ कर दी थी। वह कज़ली के कॉलेज के कैम्पस में उसके कमरे में गई। वहां खोज की गई। वहां पर काकेष के द्वारा उसका अंतिम फोन का सन्देश अभी भी सुरक्षित था। कज़ली ने उसे मिटाया नहीं था। साफ जाहिर था कि वह उसे अक्सर सुनती होगी और अपनी किस्मत पर रोती होगी। इसी फोन के सन्देश के द्वारा पुलिस काकेष तक जा पहुंची। उसे खबर दी गई तो वह भी सकते में आ गया। तब उसने सारी कहानी पुलिस को बतायी। फिर जब पुलिस को यह ज्ञात हुआ कि कज़ली की केवल मां के बुरे कामों के कारण ही वह उससे विवाह नहीं कर सकता था तो पुलिस भी आश्चर्य किये बगैर नहीं रह सकी। सब जानते हैं कि विदेश में इस प्रकार की बातों को कोई भी ध्यान नहीं दिया करता है और ना ही गंभीरता से लिया करता है। ऐसी घटनाएं विदेशी भूमि पर बहुत ही सामान्य मानी जाती हैं. यही सोचकर तब एक पुलिस अफसर ने काकेष से तो यहां तक कह दिया। वह काकेष को मूर्ख समझते हुये बोला, ‘You crazy man, you do not understand that man gives birth to man? How can you question the birth of man? You marry to Kaazalee or your mom and dad? You have lost the most beautiful partner in your life.’ ( ‘अरे मूर्ख आदमी, तुमने कभी समझा है कि मनुष्य ही मनुष्य को जन्म दिया करता है। लेकिन तुम्हें एतराज़ है कि मनुष्य का जन्म किन हालातों में हुआ है? तुम कजली से शादी कर रहे थे या तुम्हारे मां-बाप से ? तुमने अपने जीवन का एक सुन्दर साथी खो दिया है।’) सचमुच काकेष ने कज़ली को खो दिया था। चाहे मूर्खता में और चाहे अपने परिवार की दकियानूसी विचार धाराओं का मान रखने के कारण। उस कज़ली को उसने जान बूझकर मौत के मुंह में धकेला था जिसकी आंखें कभी काजल की मोहताज नहीं थीं और जिसने कभी अपने जीवन में किसी मनुष्य को छुआ भी नहीं था। जिसकी पाकीज़गी की गवाही तो शायद आसमान के फ़रिश्ते भी दे सकते हैं? सांझ कभी की डूब कर रात्रि में परिणित हो चुकी थी। आज आकाश में चन्द्रमा भी नहीं उगा था। केवल दूर शहर की विद्युत बत्तियों का हल्का–मन्द प्रकाश ही कभी–कभार सागर की लहरों में हिचकोलें खाता सा प्रतीत हो जाता था, नहीं तो समूचा सागर का जल किसी काले पसरे हुये दैत्य के समान भांय–भांय कर रहा था। काकेष चुपचाप अपने स्थान से उठा। सोचा कि वह भी छंलाग लगा दे, मगर उसे देखते ही सागर की नाराज़ लहरों ने अपना मुंह हिकारत से बिचका कर उसे अपने पास आने की अनुमति नहीं दी। उसने एक बार फिर से लहरों को देखा और फिर मुंह फेर कर चल दिया। वह जानता था कि सागर की मूक लहरें केवल बुलाने वाले को ही बुलाया करती हैं –– हरेक ऐरे–गैरे को नहीं। उसका ऐसा नसीब कहां जो वह भी प्यारी और पुष्पों से भी अति नाजुक कज़ली के समान समुद्री लहरों की बाहों में समा जाये? मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

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Hindi Info भारत के 5 सबसे अनूठे गांव ये है

ये है भारत के 5 सबसे अनूठे गांव, नंबर 1 में तो है अपना संविधान. नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, आज हम आपको भारत के 5 सबसे अनोखे गांव के बारे में बताने वाले हैं जो अपने आप में अलग ही देश-विदेश में पहचान रखते हैं, तो चलिए आज की चर्चा शुरू करते हैं। 5. पिपलांत्री यह भारत का सबसे विकसित गांव के तौर पर जाना जाता है। इस गांव के विकास को डेनमार्क देश की किताबों में भी पढ़ाया जाता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारत के अधिकतर लोग इस गांव के बारे में नहीं जानते हैं। यह गांव राजस्थान के उदयपुर से 50 किलोमीटर दूर है और इस गांव की जनसंख्या करीब 1500 लोगों की है। इस गांव में पानी, पेड़ और बेटी बचाने के लिए देशभर में सबसे शानदार उदाहरण पेश किया है। इस गांव में इजरायल तकनीक पर आधारित कई प्रकार हाईटेक खेती की जाती है। लड़कियों के जन्म पर इस गांव में 111 पेड़ लगाने होते हैं और इनकी शादी का सारा खर्च पूरा गांव मिलकर उठाता है। 4. मावल्यान्नॉंग इस गांव को एशिया का सबसे स्वच्छ गांव की उपाधि मिली हुई है। यह गांव स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने से कई सालों पहले स्वच्छता के मामले में अव्वल रहा है। यह गांव भगवान का बगीचे के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह गांव भारत-बांग्लादेश के बॉर्डर पर मेघालय राज्य में स्थित है। आपको अपनी जिंदगी में एक बार इस गांव में जरूर जाकर आना चाहिए। 3. कोडिन्ही केरल में स्थित यह गांव जुड़वाँ बच्चों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। आपको यहां पर हर घर में एक जुड़वाँ बच्चा जरूर मिल जाएगा। यहां जुड़वाँ बच्चा पैदा होने की क्या वजह है, अभी तक कोई भी असली कारण नहीं खोज पाया है। आपको यहां पर नवजात शिशु लेकर 60 साल के बुड्ढे तक का डबल रोल मिल जाएगा। यह गांव वाले इन जुड़वाँ बच्चों की वजह से कितने कंफ्यूज होते होंगे यह तो अब बस ऊपरवाला ही जाने। 2. करचोंड आज भी भारत में अंतरजातीय विवाह या फिर शादी से पहले लड़की से मिलने की वजह कितनी ही समस्या और लड़ाई दंगे हो जाते हैं। भारतीय न्यायालय ने हाल ही में लोगों को लव इन रिलेशनशिप में रहने के अधिकार प्रदान किए हैं लेकिन यह गांव इस मामले में हजारों साल पहले से ही आगे हैं। गुजरात के सेलवास से 30 किलोमीटर दूर स्थित 3 हजार आदिवासी लोगों के इस गांव में आप बेरोकटोक किसी भी लड़की के साथ लव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं। अक्सर लोगों की गांव के प्रति गलत धारणाएं ही रहती है लेकिन यह गांव शहर से भी आगे है। 1. मलाणा हिमाचल प्रदेश के मनाली शहर से 70 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव अपने आप में कई खूबियों से भरा हुआ है। अगर आपको इस गांव की पहली खूबी बताई जाए तो इस गांव में कनाशी भाषा बोली जाती है जो केवल विश्व में केवल इसी गांव के लोग जानते हैं और यह इसे ना ही किसी बाहरी लोगों को सिखाते हैं। दूसरी बात इस गांव में मलाणा क्रीम मिलती है जिसे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भांग के तौर पर जानी जाती है। इस गांव के लोग खुद को सिकंदर का वंशज मानते हैं और यह दुनिया का सबसे पुरानी लोकशाही गांव है। इस गांव में खुद का संविधान और संसद है जिसमें ये निचले सदन को कनिष्थाँग और उच्च सदन को जयेशथाँग कहते है। गांव में साल भर भीड़ रहती है लेकिन यहां के लोग अपने ही मस्ती में रहते हैं। खैर, यह थे भारत के कुछ अनूठे गांव, अगर आपके गांव या आसपास गांव में भी कुछ अनूठी बात है उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Story क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी

क्या आपने देखी है रानी की बावड़ी? नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, गुजरात में कई ऐसे खूबसूरत पर्यटक स्थल हैं, जिसे देखने का मोह लोग छोड़ नहीं पाते। इन्हीं पर्यटक स्थलों में एक बेहद दिलचस्प जगह है, रानी की बावड़ी, जिसे रानी की वाव का नाम भी दिया गया है। इतिहास में पानी के कुंड को बावली कहा जाता था, इसीलिए इसका नाम रानी की बावड़ी रखा गया। सरस्वती नदी के मुहाने पर बसे पाटन में यह खूबसूरत कला का नमूना कई सदियों से खड़ा हुआ है। गुजरात के पाटन को इतिहास में अन्हिलपुर के नाम से जाना जाता था जो गुजरात की राजधानी हुआ करती थी। यही मौजूद है वास्तुकला और ऐतिहासिक सुंदरता का खूबसूरत नमूना। आइये जानते हैं इस बावड़ी के बारे में दिलचस्प बातें। क्यों कहा जाता है इसे रानी की बावड़ी? यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है जैसा कि आप सभी जानते हैं भारत में कई ऐतिहासिक स्थल पुराने राजाओं द्वारा बनवाए गए हैं। असल में रानी की बावड़ी सोलंकी राज के राजा भीमदेव की पहली पत्नी रानी उदयामति ने सन 1063 में बनवाई थी। यह बावड़ी बेहद अलग और अद्वितीय है। क्योंकि इसका निर्माण रानी ने करवाया था, इसीलिए इसे रानी की बावड़ी का नाम दिया गया है। आम तौर पर बावड़ियां एक ही तरह से बनाई जाती है, लेकिन इस कुंड को मंदिर का रूप दिया गया, जिसमें सात अलग-अलग मंज़िलें बनी हुई है। इसके चारों ओर खूबसूरत नक्काशी और पौराणिक और धार्मिक चित्रों को उकेरा गया है। इन शैलियों में सोलंकी वंश की कला को दर्शाया गया है, जो दिखने में बेहद खूबसूरत दिखाई देती है। लंबी लंबी सीढ़ियां और बीच में पानी का कुंड बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। चमत्कारी पानी की बावड़ी सुरंग के साथ बावड़ी आपको जानकर हैरानी होगी कि हर ऐतिहासिक स्मारक का एक रहस्य भी होता है। ऐसा ही रानी की वाव के साथ भी है। इसकी अंतिम सीढ़ी पर बना हुआ है एक ख़ास दरवाज़ा, जहां से 30 मीटर लंबी सुरंग बनाई गई है, जो यहां से सीधी सिद्धपुर गांव में जाकर खुलती है। यह गांव पाटन के पास ही बसा हुआ है। इस पानी को पीने से मौसमी बुखार और कई बीमारियां ठीक हो जाया करती थी उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Info अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया

अकबर की मृत्यु के बाद अकबर के शव के साथ ऐसा किया गया जिसे आप नही जानते, जानकर होगी हैरानी नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, दोस्तों राजा अकबर को भारतीय इतिहास का एक महान राजा माना जाता है राजा अकबर ने अपने शासनकाल में काफी ज्यादा सामाजिक कार्य किया था जिसके कारण राजा अकबर को एक अच्छा शासक माना जाता है राजा अकबर के शासन काल में प्रजा काफी ज्यादा सुखी हुआ करती थी। अकबर ने अपने शासनकाल में सभी धर्मों का सम्मान किया था इसके अलावा अकबर के शासनकाल में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रहता था। अकबर ने अपने शासनकाल में कई बड़े-बड़े कार्य करवाए थे। अकबर के शासनकाल में भारत ने काफी ज्यादा तरक्की की थी लेकिन दोस्तों क्या आप लोगों को मालूम है कि जब राजा अकबर इतना बड़ा महान व्यक्ति था तो उसकी जब मृत्यु हुई तब उसके सब को राजकीय सम्मान के साथ क्यों नहीं जलाया गया। आज हम आप लोगों को बताने वाले हैं कि आखिर राजा अकबर की मृत्यु के बाद उसके शव के साथ क्या किया गया था। दोस्तों जब राजा अकबर की मृत्यु हुई थी उनके शव को बिना किसी राजकीय सम्मान और बिना अंतिम संस्कार के दुर्ग के पीछे दीवार तोड़कर सिकंदरा में दफना दिया। इसका कारण यह था कि उस समय अफगान के लोग मुगल साम्राज्य पर हावी हो रहे थे जिसके कारण मुगल साम्राज्य के लोग चाहते थे कि राजा अकबर की मृत्यु के बारे में अफगान लोगों को मालूम ना हो। उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Real Hindi Stories प्यार या संस्कार

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, अदिति ने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद बेंगलुरु महानगर के एक नामीगिरमी कालेज में मैनेजमैंट कोर्स में ऐडमिशन लिया तो मानो उस के सपनों को पंख लग गए. उस के जीवन की सोच से ले कर संस्कार तथा सपनो से ले कर लाइफस्टाइल सभी तेजी से बदल गए. अदिति के जीवन में कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीकठाक चलता रहा, लेकिन अचानक उस के जीवन में उस के ही कालेज के एक छात्र प्रतीक की दस्तक के कारण जो मोड़ आया वह उस पहले प्यार के बवंडर से खुद को सुरक्षित नहीं रख पाई. अदिति बहुत जल्दी प्रतीक के प्यार के मोहपाश में इस तरह जकड़ गई मानो वह पहले कभी उस से अलग और अनजान नहीं थी. जवानी की दहलीज पर पहले प्यार की अनूठी कशिश में अदिति अपने जीवन के बीते दिनों तथा परिवार की चाहतों को पूरी तरह से विस्मृत कर चुकी थी. प्रतीक के प्यार में सुधबुध खो बैठी अदिति अपने सब से खूबसूरत ख्वाब के जिस रास्ते पर चल पड़ी वहां से पीछे मुड़ने का कोईर् रास्ता न तो उसे सूझा और न ही वह उस के लिए तैयार थी. गरमी की छुट्टी में जब अदिति अपने घर वापस आई तो उस के बदले हावभाव देख कर उस की अनुभवी मां को बेटी के बहके पांवों की चाल समझते देर नहीं लगी. जल्दी ही छिपे प्यार की कहानी किसी आईने की तरह बिलकुल साफ हो गई और मां को पहली बार अपनी गुडि़या सरीखी मासूम बेटी अचानक ही बहुत बड़ी लगने लगी. अदिति ने अपनी मां से प्रतीक से शादी के लिए शुरू में तो काफी विनती की, लेकिन मां के इनकार को देखते हुए वह जिद पर अड़ गई. अदिति के पिता तो उसी वक्त गुजर गए थे जब अदिति ठीक से चलना भी नहीं सीख पाई थी. मां और बेटी के अलावा उस छोटे से संसार में प्रतीक के प्रवेश की तैयारी के लिए एक बड़ा द्वंद्व और दुविधा का जो माहौल तैयार हो गया था वह सब के लिए दुखदायी था, जिस की मद्घिम लौ में मां को अपनी बेटी के चिरपोषित सपनों की दुनिया जल जाने का मंजर साफ नजर आ रहा था. ‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो? मैं प्रतीक से सच्चा प्यार करती हूं. वह ऐसावैसा लड़का नहीं है. वह अच्छे घर से है और निहायत शरीफ है. क्या बुरा है, यदि मैं उस से शादी करना चाहती हूं,’’ अदिति ने बड़े साफ लहजे में अपनी मां को अपने विचारों से अवगत कराया. मां अपनी बेटी के इस कठोर निर्णय से काफी आहत हुईं लेकिन खुद को संयमित करते हुए अदिति को अपने सांस्कारिक मूल्यों तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों का एहसास कराने की काफी कोशिश करती हुई बोलीं, ‘‘बेटी, मैं सबकुछ समझती हूं, लेकिन अपने भी कुछ संस्कार होते हैं. तुम्हारे पापा ने तुम्हारे लिए क्या सपने संजो रखे थे लेकिन तुम उन सपनों का इतनी जल्दी गला घोंट दोगी, इस बारे में तो मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था. अपनी जिद छोड़ो और अभी अपने भविष्य को संवारो. प्यार मुहब्बत और शादी के लिए अभी बहुत वक्त पड़ा है.’’ ‘‘मां, आप समझती नहीं हैं, प्यार संस्कार नहीं देखता, यह तो जीवन में देखे गए सपनों का प्रश्न होता है. मैं ने प्रतीक के साथ जीवन के न जाने कितने खूबसूरत सपने देखे हैं, लेकिन मैं यह भूल गई थी कि मेरे इंद्रधनुषी सपनों के पंख इतनी बेरहमी से कुतर दिए जाएंगे. आखिर, तुम्हें मेरे सपनों के टूटने से क्या?’’ ‘‘बेटी, सच पूछो तो प्रतीक के साथ तुम्हारा प्यार केवल तुम्हारे जीवन के लिए नहीं है. जीवन के रंगीन सपनों के दिलकश पंख पर बेतहाशा उड़ने की जिद में अपनों को लगे जख्म और दर्द के बारे में क्या तुम ने कभी सोचा है? प्यार का नाम केवल अपने सपनों को साकार होते देखनाभर नहीं है. वह सपना सपना ही क्या जो अपनों के दर्द की दास्तान की सीढ़ी पर चढ़ कर साकार किया गया हो. ‘‘आज तुम्हें मेरी बातें बचकानी लगती होंगी, लेकिन मेरी मानो जब कल तुम भी मेरी जगह पर आओगी और तुम्हारे अपने ही इस तरह की नासमझी की बातों को मनवाने के लिए तुम से जिद करेंगे तो तुम्हें पता चलेगा कि दिल में कितनी पीड़ा होती है. मन में अपनों द्वारा दिए गए क्लेश का शूल कितना चुभता है.’’ अदिति अपनी मां के मुंह से इस कड़वी सचाई को सुन कर थोड़ी देर के लिए सन्न रह गई. उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर अनजाने ही हाथ रख दिया हो. उस के जेहन में अनायास ही बचपन से ले कर अब तक अपनी मां द्वारा उस के लालनपालन के साथसाथ पढ़ाई के खर्चे के लिए संघर्ष करने की कहानी का हर दृश्य किसी सिनेमा की रील की भांति दौड़ता चला गया. अनायास ही उस की आंखें भर आईं. मन पर भ्रम और दुविधा की लंबे अरसे से पड़ी धूल की परत साफ हो चुकी थी और सबकुछ किसी शीशे की तरह साफसाफ प्रतीत होने लगा था. लेकिन बीते हुए कल के उस दर्र्द के आंसू को अपनी मां से छिपाते हुए वह भाग कर अपने कमरे में चली गई. अपनी मां की दिल को छू लेने वाली बातों ने अदिति को मानो एक गहरी नींद से जगा दिया हो. छुट्टियों के बाद अदिति अपने कालेज वापस आ गई और जीवन फिर परिवर्तन के एक नए दौर से गुजरने लगा. कालेज वापस लौटने के बाद अदिति गुमसुम रहने लगी. प्रतीक से भी वह कम ही बातें करती थी, बल्कि उस ने उसे शादी के बारे में अपनी मां की मरजी से भी अवगत करा दिया और इस तरह मंजिल तक पहुंचने से पहले ही दोनों की राहें अलग अलग हो गईं. कालेज के अंतिम वर्ष में कैंपस सिलैक्शन में प्रतीक को किसी मल्टीनैशनल कंपनी में ट्रेनी मैनेजर के रूप में यूरोप का असाइनमैंट मिला और अदिति ने किसी दूसरी मल्टीनैशनल कंपनी में क्वालिटी कंट्रोल ऐग्जीक्यूटिव के रूप में अपनी प्लेसमैंट की जगह बेंगलुरु को ही चुन लिया. अदिति अपनी मां के साथ इस मैट्रोपोलिटन सिटी में रह कर जीवन गुजारने लगी. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. इसी बीच कंपनी ने अदिति को 1 वर्ष के फौरेन असाइनमैंट पर आस्ट्रेलिया भेजने का निर्णय लिया. अदिति अपनी मां के साथ जब आस्टे्रलिया के सिडनी शहर आई तो संयोग से वहीं पर एक दिन किसी शौपिंग मौल में उस की प्रतीक से मुलाकात हो गई. अदिति के लिए यह एक सुखद लमहा था, जिस की नरम कशिश में वर्षों पूर्व के संबंधों की यादें बड़ी तेजी से ताजी हो गईं. लेकिन भविष्य में इस संबंध के मुकम्मल न होने के भय ने उस के पैर वापस खींच लिए. प्रतीक अपने क्वार्टर में अकेला रहता था और अकसर हर रोज शाम के वक्त वह अदिति के घर पर आ जाया करता था. मां को भी अपने घर में अपने देश के एक परिचित के रूप में प्रतीक का आना जाना अच्छा लगता था, क्योंकि परदेश में उस के अलावा सुख दुख बांटने वाला और कोई भी तो नहीं था. अचानक एक दिन औफिस से घर लौटते वक्त अदिति की औफिस कार की किसी प्राइवेट कार के साथ टक्कर हो गई और अदिति को सिर में काफी चोट आई. महीनेभर तक अदिति हौस्पिटल में ऐडमिट रही और इस दौरान उस का और उस की मां का ध्यान रखने वाला प्रतीक के अलावा और कोई नहीं था. प्रतीक ने मुसीबत की इस घड़ी में अदिति और उस की मां का भरपूर ध्यान रखा और इसी बीच अदिति और प्रतीक फिर से कब एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि उन्हें इस का पता ही नहीं चला. अदिति का यूरोप असाइनमैंट खत्म होने वाला था और उसे अब अपने देश वापस आना था. अदिति और उस की मां को छोड़ने के लिए प्रतीक भी बेंगलुरु आया था. प्रतीक के सेवाभाव से अदिति की मां अभिभूत हो गई थीं. प्रतीक सिडनी वापस जाने की पूर्व संध्या पर अपने मम्मीडैडी के साथ अदिति से मुलाकात करने आया था. अदिति का व्यवहार तथा शालीनता देख कर प्रतीक के पेरैंट्स काफी खुश हुए. प्रतीक की अगले दिन फ्लाइट थी. एयरपोर्ट पर बोर्डिंग के समय जब अदिति का फोन आया तो उस के दिलोदिमाग में एक अजीब हलचल मच गई. पुराने प्यार की सुखद और नरम बयार में प्रतीक के मन का कोनाकोना सिहर उठा. प्रतीक ने अपनी फ्लाइट कैंसिल करवा ली. उस ने अपनी कंपनी को बेंगलुरु में ही उसे शिफ्ट करने के लिए रिक्वैस्ट भेज दी जो कुछ दिनों में अपू्रव भी हो गई. अदिति की मां प्रतीक के इस फैसले से काफी प्रभावित हुईं. अदिति हमेशा के लिए अब प्रतीक की हो गई थी और वह मां के साथ ही बेंगलुरु में रहने लगी थी. प्रतीक अपनी खुली आंखों से अपने सपने को अपनी बांहों में पा कर खुशी से फूले नहीं समा रहा था. अदिति के पांव भी जमीं पर नहीं पड़ रहे थे. उसे आज जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि धरती की तरह सपनों की दुनिया भी गोल होती है और सितारे भले ही टूटते हों, लेकिन यदि विश्वास मजबूत हो तो सपने कभी नहीं टूटते. उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Real Stories भोले भक्त की भक्ति

एक गरीब बालक था जो कि अनाथ था। एक दिन वो बालक एक संत के आश्रम में आया और बोला कि बाबा आप सब का ध्यान रखते है, मेरा इस दुनिया मेँ कोई नही है तो क्या मैँ यहाँ आपके आश्रम में रह सकता हूँ ? बालक की बात सुनकर संत बोले बेटा तेरा नाम क्या है ? उस बालक ने कहा मेरा कोई नाम नहीँ हैँ। तब संत ने उस बालक का नाम रामदास रखा और बोले की अब तुम यहीँ आश्रम मेँ रहना। रामदास वही रहने लगा और आश्रम के सारे काम भी करने लगा। उन संत की आयु 80 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन वो अपने शिष्यो से बोले की मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना हैँ तुम मेँ से कौन कौन मेरे मेरे साथ चलेगा और कौन कौन आश्रम मेँ रुकेगा ? संत की बात सुनकर सारे शिष्य बोले की हम आपके साथ चलेंगे.! क्योँकि उनको पता था की यहाँ आश्रम मेँ रुकेंगे तो सारा काम करना पड़ेगा इसलिये सभी बोले की हम तो आपके साथ तीर्थ यात्रा पर चलेंगे। अब संत सोच मेँ पड़ गये की किसे साथ ले जाये और किसे नहीँ क्योँकि आश्रम पर किसी का रुकना भी जरुरी था। बालक रामदास संत के पास आया और बोला बाबा अगर आपको ठीक लगे तो मैँ यहीँ आश्रम पर रुक जाता हूँ। संत ने कहा ठीक हैँ पर तुझे काम करना पड़ेगा आश्रम की साफ सफाई मे भले ही कमी रह जाये पर ठाकुर जी की सेवा मे कोई कमी मत रखना। रामदास ने संत से कहा की बाबा मुझे तो ठाकुर जी की सेवा करनी नहीँ आती आप बता दिजिये के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है ? फिर मैँ कर दूंगा। संत रामदास को अपने साथ मंदिर ले गये वहाँ उस मंदिर मे राम दरबार की झाँकी थी। श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी थे. संत ने बालक रामदास को ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है सब सिखा दिया। रामदास ने गुरु जी से कहा की बाबा मेरा इनसे रिश्ता क्या होगा ये भी बता दो क्योँकि अगर रिश्ता पता चल जाये तो सेवा करने मेँ आनंद आयेगा। उन संत ने बालक रामदास कहा की तू कहता था ना की मेरा कोई नहीँ हैँ तो आज से ये राम जी और सीता जी तेरे माता-पिता हैँ। रामदास ने साथ मेँ खड़े लक्ष्मण जी को देखकर कहा अच्छा बाबा और ये जो पास मेँ खड़े है वो कौन है ? संत ने कहा ये तेरे चाचा जी है और हनुमान जी के लिये कहा की ये तेरे बड़े भैय्या है। रामदास सब समझ गया और फिर उनकी सेवा करने लगा। संत शिष्योँ के साथ यात्रा पर चले गये। आज सेवा का पहला दिन था, रामदास ने सुबह उठकर स्नान किया ,आश्रम की साफ़ सफाई की,और भिक्षा माँगकर लाया और फिर भोजन तैयार किया फिर भगवान को भोग लगाने के लिये मंदिर आया। रामदास ने श्री राम सीता लक्ष्मण और हनुमान जी आगे एक-एक थाली रख दी और बोला अब पहले आप खाओ फिर मैँ भी खाऊँगा। रामदास को लगा की सच मेँ भगवान बैठकर खायेंगे. पर बहुत देर हो गई रोटी तो वैसी की वैसी थी। तब बालक रामदास ने सोचा नया नया रिश्ता बना हैँ तो शरमा रहेँ होँगे। रामदास ने पर्दा लगा दिया बाद मेँ खोलकर देखा तब भी खाना वैसे का वैसा पडा था। अब तो रामदास रोने लगा की मुझसे सेवा मे कोई गलती हो गई इसलिये खाना नहीँ खा रहेँ हैँ ! और ये नहीँ खायेंगे तो मैँ भी नहीँ खाऊँगा और मैँ भूख से मर जाऊँगा..! इसलिये मैँ तो अब पहाड़ से कूदकर ही मर जाऊँगा। रामदास मरने के लिये निकल जाता है तब भगवान राम जी हनुमान जी को कहते हैँ हनुमान जाओ उस बालक को लेकर आओ और बालक से कहो की हम खाना खाने के लिये तैयार हैँ। हनुमान जी जाते हैँ और रामदास कूदने ही वाला होता हैँ की हनुमान जी पीछे से पकड़ लेते हैँ और बोलते हैँ क्याँ कर रहे हो? रामदास कहता हैँ आप कौन ? हनुमान जी कहते है मैँ तेरा भैय्या हूँ इतनी जल्दी भूल गये ? रामदास कहता है अब आये हो इतनी देर से वहा बोल रहा था की खाना खा लो तब आये नहीँ अब क्योँ आ गये ? तब हनुमान जी बोले पिता श्री का आदेश हैँ अब हम सब साथ बैठकर खाना खायेँगे। फिर राम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी , हनुमान जी साक्षात बैठकर भोजन करते हैँ। इसी तरह रामदास रोज उनकी सेवा करता और भोजन करता। सेवा करते 15 दिन हो गये एक दिन रामदास ने सोचा घर मैँ ५ लोग हैं,सारा काम में ही अकेला करता हुँ ,बाकी लोग तो दिन भर घर में आराम करते है.मेरे माँ, बाप ,चाचा ,भाई तो कोई काम नहीँ करते सारे दिन खाते रहते हैँ. मैँ ऐसा नहीँ चलने दूँगा। रामदास मंदिर जाता हैँ ओर कहता हैँ पिता जी कुछ बात करनी हैँ आपसे।राम जी कहते हैँ बोल बेटा क्या बात हैँ ? रामदास कहता हैँ की घर में मैं सबसे छोटा हुँ ,और मैं ही सब काम करता हुँ।अब से मैँ अकेले काम नहीँ करुंगा आप सबको भी काम करना पड़ेगा,आप तो बस सारा दिन खाते रहते हो और मैँ काम करता रहता हूँ अब से ऐसा नहीँ होगा। राम जी कहते हैँ तो फिर बताओ बेटा हमेँ क्या काम करना है?रामदास ने कहा माता जी (सीताजी) अब से रसोई आपके हवाले. और चाचा जी (लक्ष्मणजी) आप घर की साफ़ सफाई करियेगा. भैय्या जी (हनुमान जी)शरीर से मज़बूत हैं ,जाकर जंगल से लकड़ियाँ लाइयेंगे. पिता जी (रामजी) आप बाज़ार से राशन लाइए और घर पर बैठकर पत्तल बनाओँगे। सबने कहा ठीक हैँ।मैंने बहुत दिन अकेले सब काम किया अब मैं आराम करूँगा. अब सभी साथ मिलकर काम करते हुऐँ एक परिवार की तरह सब साथ रहने लगेँ। एक दिन वो संत तीर्थ यात्रा से लौटे तो देखा आश्रम तो शीशे जैसा चमक रहा है, वो बहुत प्रसन्न हुए.मंदिर मेँ गये और देखा की मंदिर से प्रतिमाऐँ गायब हैँ. संत ने सोचा कहीँ रामदास ने प्रतिमा बेच तो नहीँ दी ? संत ने रामदास को बुलाया और पूछा भगवान कहा गये रामदास भी अकड़कर बोला की मुझे क्या पता हनुमान भैया जंगल लकड़ी लाने गए होंगे,लखन चाचा झाड़ू पोछा कर रहे होंगे,पिताजी राम पत्तल बन रहे होंगे माता सीता रसोई मेँ काम कर रही होंगी. संत बोले ये क्या बोल रहा ? रामदास ने कहा बाबा मैँ सच बोल रहा हूँ जब से आप गये हैँ ये चारोँ काम मेँ लगे हुऐँ हैँ। वो संत भागकर रसोई मेँ गये और सिर्फ एक झलक देखी की सीता जी भोजन बना रही हैँ राम जी पत्तल बना रहे है और फिर वो गायब हो गये और मंदिर मेँ विराजमान हो गये। संत रामदास के पास गये और बोले आज तुमने मुझे मेरे ठाकुर का दर्शन कराया तू धन्य हैँ। और संत ने रो रो कर रामदास के पैर पकड़ लिये…! रामदास जैसे भोले,निश्छल भक्तो की भक्ति से विवश होकर भगवान को भी साधारण मनुष्य की तरह जीवन व्यतीत करने आना पड़ता है. जय श्री राम उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.