Stories लहरें बुलाती हैं प्यारी कहानी

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‘आचरण, सभ्यता, नेक–नियम और मानवता से भरे आदर्शो के उपदेश केवल धार्मिक ग्रंथों में ही पढ़ने को मिला करते हैं, काकेष जी। वस्तविक जीवन में इनका प्रयोग करने वाला मसीहा, येरूशलेम के बैतलहम में दोबारा पैदा होते मैंने आज तक नहीं देखा है।’ ‘जी, सुनिये।’ ?’गुमसुम, खोई–खोई सी, अपने ही ख्यालों में डूबी हुई, सागर की मदमस्त लहराती हुई लहरों को देखती हुई कज़ली के कानों में अनजाना सा स्वर सुनाई पड़ा तो वह सहसा ही चौंक गई। उसने गर्दन घुमा कर पीछे देखा तो किसी लंबे, एकहरे बदन और कंधों तक उसके सागर की ख़ारी ठंडी वायु में झूलते हुये लंबे बालों वाले अनजान आगुन्तक को अपने हाथों में मछली पकड़ने की डोर और छड़ी को लिये हुये देख वह सहसा, सहम सी गई। कज़ली का यूं आश्चर्य करना और चौंकना वहुत स्वभाविक भी था। जिस पुरूष को उसने इससे पहले न देखा और जाना था, वही उससे संबोधित था, यह जानकर वह और भी आश्चर्य से गड़ गई थी। मगर उस अनजान व्यक्ति से वह कुछ कहती, इससे पूर्व ही वह पुरूष बोला, ‘आप यूं घबराइये नहीं। मेरा नाम काकेष है। और मैं यही सवाना में रहता हूं और बैल साउथ फोन कंपनी में काम किया करता हूं। जब भी ‘वीकेंड’ में छुट्टी होती है, या फिर कोई अन्य अवकाश मिल जाता है, तो मछली की डोर उठाकर यहां चला आता हूं। ‘फिशिंग’ करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। जब भी यहां आता हूं तो आपको अक्सर यहां बैठे देखा करता हूं। हांलाकि, मुझे आपके इस तरह अकेले, एकांतमयी तरीके से बैठे देख कोई विशेष परेशानी तो नहीं होती है, लेकिन बड़ा अजीब सा लगता है। क्या मैं जान सकता . . .’ ‘जिस तरह से आपको भोली–भोली, सागर की लहरों में झूमती, लहराती मछालियों को लालच और छोखा देकर अपने कांटे में फांसना अच्छा लगता है, मेरा शौक वैसा तो नहीं है। बस ये सागर, इसकी कल–कल करती हुई अपने शोर से अनजान, इसकी बेफिक्र, दुनियां के हर ग़म से महरूम खेलती हुई लहरें मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। ऐसा लगता है कि ये लहरें मुझे आवाज़ देती हैं.– मुझे पुकार–पुकार कर बुलाती हैं, और मैं यहां इनसे बगैर कोई शिकायत किये हुये चुपचाप चली आती हूं।’ काकेष की अधूरी बात को बीच में ही काट कर, और अपनी बात कहकर कज़ली उठकर जाने लगी तो काकेष ने उसे रोका। बोला, ‘क्या मैं आपका परिचय . . .?’ ‘बुरा मत मानियेगा। सागर की इन लहरों से प्यार करने वाली ये कज़ली केवल अपने नाम के सिवा कोई और परिचय नहीं दे सकेगी।’ कहती हुई कज़ली सचमुच चली गई तो काकेष चुपचाप उसे तब तक जाते हुये निहारता रहा जब तक कि वह उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गई थी। . . .सोचते–सोचते अचानक ही काकेष की स्मृतियों को एक झटका सा लगा। वह यादों के भंवरजाल से निकल कर बाहर आया। अपनी आंखों पर हाथ रखा तो ख़ारे सागर के जल से भी अधिक संवेदनशील अंगुलियों की पोरें पलकों पर बैठे हुये उदास आंसुओं से तर हो गईं। लगा कि इन ठंडे आंसुओं की कोख़ में ठहरी हुई तपन ने उसके मुख पर वह अचानक तमाचा सा जड़ दिया है जो उसके जीवन की एक ला–परवा भूल के समान, उसके बदन से रंज–ओ–ग़म के कोहरे के समान सदैव ही चिपका रहेगा। उसकी ज़िन्दगी की दर्द–भरी स्मृतियों का वह कोहरा जो अब जितना अधिक छंटेगा, उससे कहीं ज्यादा बढ़ता भी जायेगा। काकेष ने नीरस और उदास मन की भावनाओं से अपने आस–पास के वातावरण को देखा। दूर क्षितिज में सूर्य की लाली की अंतिम रशिम भी अपना दम तोड़ रही थी और सागर की शांत होती हुई लहरों में बादलों की छोर से सूर्य की रश्मियों का बदन गल–गल कर किसी पिघले हुये सोने के समान बहता जा रहा था। लहरों के किनारे की बालू में दिन भर से खेलते, लिपटने और विशाल सागर के नीले जल में नहाते हुये अर्धनग्न मानव जिस्मों का प्रदर्शन अब काफी हद तक कम हो चुका था। चीं–चीं करती हुई सागर की लहरों में डॉलफिनों का स्वर यदा–कदा ही सुनाई देते थे। शहर की बत्तियां जगमगा कर रात की रंगीनियों के नाच–गाने और जश्न आदि की पूर्व तैयारियों का संकेत देने लगी थीं। काकेष अभी तक बैठा हुआ था। अमरीका के राज्य जार्जिया के मशहूर शहर सवाना में बसे समुद्री टापू के ठीक उसी स्थान पर जहां पर कभी सागर की ‘लिटिल मरमेड एरियल’ से भी अति सुन्दर कज़ली बेहद ख़ामोशी से बैठी रहती थी। वक्त का तकाज़ा था कि आज काकेष उसी स्थान पर बैठा हुआ था। चुपचाप, अपनी पूर्व मुद्रा में। बिल्कुल ख़ामोश, बहुत चुप, उदास, मूक, अपने सिर पर अपनी ज़िन्दगी का जैसे भरपूर वह भारी भरकम बोझ लादे हुये कि जिसको उठाये हुये वह पिछले कई महिनों से बगैर शिकायत के ढोता चला आ रहा था। यहां बैठा–बैठा कुछेक पलों में ही वह अपने जीवन की उस महत्वपूर्ण घटना को फिर एक बार दोहरा गया था कि, जिसने उसके जीवन के कारवां का रूख ऐसी दिशा की तरफ मोड़ दिया था कि जिसके कारण उसे ना तो मंजिल ही मिली थी और ना ही मार्ग। काकेष के द्वारा बहुत आग्रह करने और अपना विश्वास दिलाने पर उसे याद है कि कज़ली ने कितनी सच और सटीक बात उससे कही थी, ‘आचरण, सभ्यता, नेक–नियम और मानवता से भरे आदर्शो के उपदेश केवल धार्मिक ग्रंथों में ही पढ़ने को मिला करते हैं, काकेष जी। वस्तविक जीवन में इनका प्रयोग करने वाला मसीहा, येरूशलेम के बैतलहम में दोबारा पैदा होते मैंने आज तक नहीं देखा है।’ स्मृतियों की मनमोहक सुगंध बनकर कज़ली जितनी जल्दी उसके जीवन में आई थी, उतना शीघ्र ही वह चली भी गई थी। कज़ली! कुदरती तौर पर काजल की कभी भी न मोहताज रहनेवाली आंखों की मालिक और असाधारण रूप की सुन्दरी, इस बाला का नाम शायद उसकी आंखों की विशेषता के आधार पर ही रखा गया होगा? भारतीय मूल की निवासी ये लड़की यदि अमरीका के सवाना के एक कॉलेज में पढ़ने नहीं आई होती तो काकेष से उसका परिचय शायद कभी भी नहीं हो पाता। कज़ली आई और आकर काकेष के शान्तमय जीवन में वह सवालों की दुनियां दिखाकर लुप्त हो चुकी थी कि जिसके केवल एक प्रश्न को भी शायद वह अब कभी भी हल नहीं कर सकता था? फिर धीरे–धीरे मुलाकातें बढ़ीं, वे दोनों और नज़दीक आये तथा बात–चीत के संदर्भ औपचारिक बातों से आगे निकलने लगे तो एक दिन काकेष ने कज़ली से कहा कि, ‘कज़ली जी, मेरा मन चाहता है कि इस समुद्र की बालू पर आपका नाम लिखूं, और जब उसकी लहरें आकर आपका नाम बिगाड़ दें तो उसके हरेक अक्षर को ढूंढ़ता हुआ मैं भी इस सागर के गर्भ में सदा को खो जाऊं।’ काकेष की बात सुनकर, कज़ली पल भर को गंभीर हो गई। काकेष ने देखा तो उसे लगा कि उसकी आंखों में लगा कुदरती काज़ल अचानक ही फैलने लगा है। इस प्रकार कि जैसे किसी शांत झील के तल में बैठी हुई किसी बड़ी मछली ने अचानक ही करवट ली हो, और फिर उसकी करवट से सारे झील के पानी में हलचल सी मच गई हो। कज़ली की आंखों में आये हुये आंसू देखकर काकेष का भी मन एक बार को सहम सा गया। वह अपनी भूल स्वीकारते हुये बोला, ‘मुझे क्षमा करना कज़ली जी! मेरा आशय आपको नाहक रूलाना नहीं था। आप अपने जीवन में सदैव ही खुश रहें, मुस्कराती रहें, मैं तो बस यही दुआ करता रहूंगा।‘ काकेष की बात में उसके लिये भविष्य के प्यार का निमंत्रण था। एक अनकही मुहब्बतों की दरिया में भीगी हुई उसकी चाहत की आरजू थी। कज़ली को समझते देर भी नहीं लगी। सच ही तो था। युवा लड़की कुछ समझे न समझे लेकिन किसी के द्वारा प्यार के अच्छे और बुरे निमंत्रण को सहज ही भांप जाती है। कज़ली भी समझ चुकी थी, पर ये नहीं जानती थी कि वह उसका रहनुमा बन कर आय था या फिर महज एक पाश्चातीय तरीके का मात्र ‘बॉय फ्रेंड’ बन कर ही। वह अभी तक चुप ही थी। बड़ी ख़ामोशी के साथ सागर की उठती–गिरती लहरों को वह फिर से निहारने लगी थी। ‘आप मुझ पर विश्वास कर सकती हैं। अपने बारे में मैं केवल यही विश्वास दिला सकता हूं।‘ काकेष ने कहा और फिर वह कज़ली के उत्तर की प्रतीक्षा किये बगैर आगे बोला, ‘चलिये, कहीं चलकर कोई शीतल पेय लेते हैं।’ फिर थोड़ी ही देर बाद वे दोनों पास ही में बने एक रेस्टोरेंट में बैठे हुये थे। काकेष काऊंटर पर जाकर दो कप ‘स्ट्राबेरी शेक’ बनवा कर ले आया था। ‘आप सदा सफेद रंग की साड़ी या फिर पंजाबी सूट ही पहना करती हैं?’ काकेष ने कज़ली के बस्त्रों को देखते हुये अचानक ही कहा तो कज़ली के होठों पर पल भर में हल्की सी मुस्कान आई और चली भी गई। वह बोली, ‘आप क्या हर समय मुझको ही परखते रहते हैं?’ ‘नहीं, आपको देखकर यही सोचता रहता हूं कि परमेश्वर ने जब दुनियां बनाई थी तो उसमें कोई न कोई कमी तो रह ही गई थी। और वह कमी ऐसी थी कि जिसको पूरा करने के लिये वह आज भी इस दुनियां को तोड़ता है, बनाता है, बिगाड़ता है, फिर से बनाता है, मगर वह कमी फिर भी पूरी नहीं हो पाई है।’ ‘आप कहना क्या चाहते हैं?’ ‘यही कि, जब परमेश्वर ने आपको बनाया था तब उसने कोई भी कमी नहीं छोड़ी थी।’ ‘?’ काकेष की बात पर कज़ली अचानक ही गंभीर हो गई तो वह बोला कि, ‘आप क्या सोचने लगी यूं अचानक से?’ ‘आप मेरे बारे मैं कुछ नहीं जानते हैं, शायद इसीलिये इतनी बड़ी बात कह बैठे हैं।’ कज़ली बोली। ‘हां, यह तो सच है। मैं आपके बारे में केवल आपकी उपस्थिति के सिवा कुछ भी नहीं जानता हूं, मगर दुख है कि आप बताना भी नहीं चाहती हैं?’ ‘सुन कर क्या करेंगे?’ ‘दुख की बात होगी तो आपका दुख बांटने की कोशिश करूंगा। किसी मुसीबत की बात होगी तो छुटकारा दिलाना चाहूंगा।’ ‘बेहतर होगा कि आप मुझे भूलने की कोशिश करियेगा।’ ‘इतनी बड़ी सजा सुनाने से पहले मेरा अपराध तो बता दिया होता?’ ‘मैं जब सयानी हो गई और जब मैंने इण्टर की परीक्षा पास कर ली तो कॉलेज जाने से पूर्व ही मेरी मां ने मुझे चेतावनी दी थी और कहा था कि, ‘बेटी, इस संसार में सब कुछ करना, लेकिन किसी भी बड़े घर के लड़के से प्रेम–प्रीत मत कर बैठना।‘ ‘आपको कैसे मालुम है कि मैं किसी बड़े घर का हूं?’ ‘क्यों, ये भी कोई पूछने वाली बात है? विदेश में रहने वाले प्रवासी भारतीय किसी नंगी–भूखी झोपड़ी में से तो नहीं आते हैं?’ ‘विदेश में तो आप भी है?’ ‘मेरी तो मजबूरी मुझे यहां तक ले आई है। मैं वहां रहकर नहीं पढ़ सकती थी। पढ़ाई पूरी होते ही मैं वापस चली जाऊंगी।’ ‘यह आपने कैसे सोच लिया? कैसे चली जायेंगी। मैं जाने दूंगा तब न?’ ‘?’ कज़ली के होठो तक स्ट्राबेरी का गिलास जाते–जाते थम गया। उसने आश्चर्य से काकेष को देखा तो वह बोला कि, ‘मेरा मतलब है कि यदि मैंने आपके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और आपने मान लिया तब कैसे जा सकेंगी?’ ‘मैं आपसे शादी नहीं कर सकती हूं।’ ‘हम दोनों मसीही हैं, फिर भी इस अस्वीकृति का कारण जान सकता हूं?’ ‘यदि साहस है तो कारण मेरी मां से जाकर पूछिये।’ ‘विवाह आपको करना है या आपकी मां को?’ ‘?’ ख़ामोशी। कज़ली फिर चुप रह गई तो काकेष ने उससे आगे पूछा, ‘फर्ज करो, तुम्हारी मां ने यदि इस रिश्ते की मंजूरी दे दी तब तो तुम पीछे नहीं हटोगी?’ उत्तर में कज़ली ने अपनी निगाहें झुका लीं तो काकेष को समझते देर नहीं लगी। स्त्री की झुकी निगाहें ही उसकी मौन स्वीकृति हुआ करती है। ‘ठीक है तुम अपनी मां का पता, फोन नंबर आदि दो, तब मैं अपने मां–बाप से कहूंगा कि वे जाकर तुम्हारी मां से मिलें।’ उस दिन की बात इसी स्थान पर आकर ठहर गई तो फिर वे दोनों अपने–अपने निवास स्थानों पर चले गये। साथ ही काकेष ने कज़ली को उसके भीवष्य की मंजिल का सुनहरा सा चित्र दिखाया तो वह भी सपने देखने लगी। इस तरह से दोनों अक्सर मिलते रहे। बात–चीतें होती रही। प्यार के सुन्दर सपनों के मध्य दोनों के कहकहे वायु में गूंजते हुये सागर की लहरों में इस प्रकार से घुलने लगे कि अब दोनों की शामें सवाना के इस ‘टॉयबी आईलेंड’ की जैसे आवश्यकता बन चुकी थीं। हांलाकि सब कुछ वैसा ही था, फर्क था तो केवल इतना ही कि कज़ली को अब सागर की लहरों से पहले काकेष बुलाने लगा था और काकेष के हाथों में भी मछली पकड़ने की डोर नदारद हो चुकी थी –– शायद इसका कारण भी यही था कि अपने जीवन की महत्वपूर्ण और वास्तविक मछली को वह अब पकड़ ही चुका था। कज़ली प्राय: ही संध्या होते ही छुट्टी वाले दिन या फिर कॉलेज समाप्त होते ही सागर के किनारे आकर काकेष की प्रतीक्षा करने लगती। बाद में काकेष भी आ जाता। फिर दोनों सागर की बालू के किनार बैठ जाते। ढेरों–ढेर बात करतें। बातें भी ऐसी कि जो समाप्त होने का नाम ही नहीं लेतीं। दोनों इतनी देर तक बैठे रहते कि शाम भी गहराने लगी। सागर की मचलती हुई लहरें आगे बढ़ कर उनके पैरों को छूने लगतीं। फिर बाद में वे दोनों उठते। मन मार कर। साथ ही जाते और कहीं भी एक साथ बैठ कर शाम का खाना खाते, फिर जुदा होते, दूसरे दिन मिलने की आस लेकर दोनों अपने–अपने ठिकानों पर चले जाते। कज़ली अब प्रतीक्षा करने लगी थी, काकेष के मां–बाप के उत्तर की। उसके मां–बाप उसकी मां के पास गये कि नहीं। हांलाकि कज़ली ने भी अपनी मां को फोन के द्वारा काकेष के बारे में सब बता दिया था। तब फिर एक दिन कज़ली सागर की लहरों को दिखती हुई काकेष को आने की प्रतीक्षा करती रही। उस दिन वह नहीं आया था या नहीं आ सका था, कज़ली कुछ निर्णय नहीं ले पाई थी। फिर जब शाम डूब गई तो वह निराश मन से अपने कॉलेज के कैम्पस में चुपचाप चली आई। हॉस्टल के कमरे की लैंड लाइन के फोन पर किसी का मेसेज़ था, फोन की पल–पल में बुझती और बंद होती बत्ती इस बात का संकेत दे रही थी। उसने मेसेज सुना। काकेष का ही फोन था। वह बोल रहा था कि, ‘कज़ली मेरे मां–बाप टीकटपाड़ा में तुम्हारी मां के घर जाकर उनसे मिले थे। मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ पता चल गया है। मेरे मां–बाप को यह रिश्ता स्वीकार नहीं है। जब से मुझे अपनी मां का मेसेज़ मिला है, मैं बहुत ज्यादा ‘अपसेट’ हूं। समझ में नहीं आता है कि मैं क्या करूं? मैं तुम्हें भी नहीं खोना चाहता हूं और अपने परिवार के विरूद्ध जाकर उन सबको भी नाराज़ नहीं करना चाहता हूं। आज मैं ‘टायबी’ पर सागर के किनारे नहीं आ सकूंगा। हो सका तो जल्दी ही तुमको फिर फोन करूंगा।’ कज़ली ने सुना तो अपना सिर पकड़कर बैठ गई। समझ में नहीं आया कि वह क्या करे? प्यार की डगर पर जबरन घसीटकर लाने वाला ही अब डगर छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था। उसने तो पहले ही आगाह कर देना चाहा था कि उन दोनों का यह रिश्ता कभी भी नहीं हो सकता है। पर क्या करे, जिन मार्गो पर वह चली थी उनका अंजाम कुछ–कुछ ऐसा ही तो होना था। उसकी मां ने उसे जन्म तो दिया है, पर उसके पिता का नाम वह भी नहीं बता सकती है। इतना अवश्य ही है, कि जिस कीचड़ में रहकर उसकी मां ने उसकी परवरिश की, उसे पाला–पोसा और यहां तक पहुंचाया, उस गंदगी से उसे जरूर ही दूर रखा है। लेकिन केवल अलग भर रहने से ही उसके बदन पर लगे हुये काले कलंक के धब्बे तो नहीं मिट जायेंगे। उसकी मां कितने वैभव और ठाठ से अपनी ज़िन्दगी बसर करती है, पर है तो एक काल गर्ल ही। क्या मसीहियत और आज का मसीही समाज इस प्रकार की जन्मी हुई संतानों को सहज ही स्वीकार कर सकता है? इसमें निश्चय ही सन्देह है। उस शाम और सारी रात कज़ली एक मिनट को भी नहीं सो सकी। बार–बार उसे यही लगता कि ऐसा कब तक चलेगा? आज काकेष ने ऐसा किया तो कल को कोई दूसरा काकेष भी ऐसा नहीं करेगा क्या? ऐसा जीवन जीने से फायदा भी क्या? वह जीवन भी क्या जो ना तो खुद के ही काम आ सका है और ना ही कभी दूसरों के आ सकेगा। काकेष का भविष्य का उत्तर उसके प्रति क्या है, यह उसे पता चल ही चुका है। यदि काकेष को उसकी मां के कार्यों तथा उसके पिछले जीवन से कोई सरोकार नहीं होता और वह केवल उससे ही मतलब रखता तो वह कभी इस बात का ज़िक्र ही नहीं करता। फिर बाद में हुआ भी ऐसा ही। काकेष ने ना तो फिर कोई फोन किया, ना ही वह सागर पर आया और न ही कोई सन्देश ही छोड़ा। उसकी चुप्पी कज़ली के जीवन से चुपचाप हुई पलायनता ही है, यह समझते कज़ली को देर भी नहीं लगी। मन की सच्ची भावनाओं से प्यार करने वाले को मिला हुआ जबर्दस्त धोखा उसे कहीं का भी नहीं छोड़ता है। जीवन की ये कठोर ठोकर जब एक बार लग जाती है तो फिर वह हर पल उसे दौंचती रहती है। यही हाल कज़ली का भी हुआ। भावनाओं का तूफान उसके सिर पर उसकी मौत बन कर मंडराने लगा। उसके दिल में बुरे ख्याल आने लगे। इस प्रकार कि वह अपने जीवन का अंत करने के बारे में सोचने लगी। ज़िन्दगी के जब पहले–पहले प्यार ने ही उस पर तरस नहीं खाया तो फिर वह दूसरों पर कैसे उम्मीद कर सकती है? फिर एक दिन वह पुन: सागर पर गई और जाकर वहीं बैठ गई जहां पर वह काकेष से मिलने से पूर्व बैठा करती थी। आज शायद वह सारी तैयारियां करके ही आई थी। सागर की उफ़ान से हर पल भरती हुई लहरें उसे देखते ही जैसे और भी अधिक जोश से भर गईं। शायद कज़ली को देखते ही प्रसन्न हो चुकी थीं। इतनी तीव्रता से वे उछल रही थीं कि उनके एक ही उछाल में कज़ली का सारा मुख तक भीग जाता था। कज़ली लहरों को देखती और सोचती कि ये लहरें उससे कितना अधिक प्यार करती हैं। जब भी वह यहां आकर बैठ जाती है तो ये सदैव ही उछल–उछल कर उसे चूमने की कोशिश करने लगती हैं। किसकदर ये उससे प्यार करने लगी हैं। इसकदर कि जैसे उसे अपने आगोश में समा लेना चाहती हैं। ये तो उसे सदा से बुलाती आई हैं, पर वही उनसे दूर भागती रही है। क्यों न वह इन्हीं के गर्भ में समा जाये? कज़ली सोचती रही। विचारती रही। रोती रही। अपनी किस्मत पर आंसू बहाती रही। भावनाओं का सिर चढ़ा हुआ तूफान उसके मस्तिष्क को हर पल कुरेदता ही रहा। फिर जब शाम ढल गई। सागर के किनारे लहरों से खेलनेवाले अपने बदनों से तौलिया आदि लपेटकर चले गये। बालू के किनारे इक्का–दुक्का लोग ही दिखने लगे तथा दूर शहर की जलती हुई विद्युत बत्तिंयों के प्रतिबिंब सागर की लहरों में डोलने लगे, तभी उवसर देखते ही कज़ली ने सागर की लहरों में छलांग लगा दी। आवाज़ आई तो किसी ने उसे कूदते हुये देख लिया। तट रक्षकों को सूचित किया। गोताख़ोर सागर में कूदे। कज़ली को जब तक बाहर निकाला गया, तब तक वह इस दुनियां से बहुत दूर उस स्थान पर जा चुकी थी, जहां पर उसकी पिछली ज़िन्दगी से नफ़रत करने वाला संसारिक मनुष्य नहीं बल्कि अथाह प्यार करने वाला नाज़रत गांव का बढ़ई रहता है। सच ही तो है कि यह संसार सब लोगों को शांति से जीने की हांमी कभी नहीं भरता है। मनुष्य का जीवन किसी को भी खैरात में नहीं मिला करता है –– हां, खैरात में लुटाया जरूर जा सकता है। मरने से पूर्व कज़ली कोई भी सूचना अपने बारे में देकर नहीं गई थी। सवाना नगर की पुलिस ने छानबीन आरंभ कर दी थी। वह कज़ली के कॉलेज के कैम्पस में उसके कमरे में गई। वहां खोज की गई। वहां पर काकेष के द्वारा उसका अंतिम फोन का सन्देश अभी भी सुरक्षित था। कज़ली ने उसे मिटाया नहीं था। साफ जाहिर था कि वह उसे अक्सर सुनती होगी और अपनी किस्मत पर रोती होगी। इसी फोन के सन्देश के द्वारा पुलिस काकेष तक जा पहुंची। उसे खबर दी गई तो वह भी सकते में आ गया। तब उसने सारी कहानी पुलिस को बतायी। फिर जब पुलिस को यह ज्ञात हुआ कि कज़ली की केवल मां के बुरे कामों के कारण ही वह उससे विवाह नहीं कर सकता था तो पुलिस भी आश्चर्य किये बगैर नहीं रह सकी। सब जानते हैं कि विदेश में इस प्रकार की बातों को कोई भी ध्यान नहीं दिया करता है और ना ही गंभीरता से लिया करता है। ऐसी घटनाएं विदेशी भूमि पर बहुत ही सामान्य मानी जाती हैं. यही सोचकर तब एक पुलिस अफसर ने काकेष से तो यहां तक कह दिया। वह काकेष को मूर्ख समझते हुये बोला, ‘You crazy man, you do not understand that man gives birth to man? How can you question the birth of man? You marry to Kaazalee or your mom and dad? You have lost the most beautiful partner in your life.’ ( ‘अरे मूर्ख आदमी, तुमने कभी समझा है कि मनुष्य ही मनुष्य को जन्म दिया करता है। लेकिन तुम्हें एतराज़ है कि मनुष्य का जन्म किन हालातों में हुआ है? तुम कजली से शादी कर रहे थे या तुम्हारे मां-बाप से ? तुमने अपने जीवन का एक सुन्दर साथी खो दिया है।’) सचमुच काकेष ने कज़ली को खो दिया था। चाहे मूर्खता में और चाहे अपने परिवार की दकियानूसी विचार धाराओं का मान रखने के कारण। उस कज़ली को उसने जान बूझकर मौत के मुंह में धकेला था जिसकी आंखें कभी काजल की मोहताज नहीं थीं और जिसने कभी अपने जीवन में किसी मनुष्य को छुआ भी नहीं था। जिसकी पाकीज़गी की गवाही तो शायद आसमान के फ़रिश्ते भी दे सकते हैं? सांझ कभी की डूब कर रात्रि में परिणित हो चुकी थी। आज आकाश में चन्द्रमा भी नहीं उगा था। केवल दूर शहर की विद्युत बत्तियों का हल्का–मन्द प्रकाश ही कभी–कभार सागर की लहरों में हिचकोलें खाता सा प्रतीत हो जाता था, नहीं तो समूचा सागर का जल किसी काले पसरे हुये दैत्य के समान भांय–भांय कर रहा था। काकेष चुपचाप अपने स्थान से उठा। सोचा कि वह भी छंलाग लगा दे, मगर उसे देखते ही सागर की नाराज़ लहरों ने अपना मुंह हिकारत से बिचका कर उसे अपने पास आने की अनुमति नहीं दी। उसने एक बार फिर से लहरों को देखा और फिर मुंह फेर कर चल दिया। वह जानता था कि सागर की मूक लहरें केवल बुलाने वाले को ही बुलाया करती हैं –– हरेक ऐरे–गैरे को नहीं। उसका ऐसा नसीब कहां जो वह भी प्यारी और पुष्पों से भी अति नाजुक कज़ली के समान समुद्री लहरों की बाहों में समा जाये? मैं आशा करता हूँ की आपको ये ” Hp Video Status Ki Story” कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्।

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महाबलीपुरम की कहानी - Hp Video Status

१- परिचय नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे,ऐसा माना जाता है कि महाबलीपुरम ( जो वर्तमान में अपनी नक्काशियों के लिए जाना जाता है ) नामक राज्य में राजा सत्यसेन का शासन था। हालांकि उनका राज्य देश के अन्य राज्यों के मुकाबले उतना विशाल नहीं था लेकिन यह एक समृद्ध और सुखी राज्य था। राजा सत्यसेन दयालु व न्यायप्रिय थे। वह राज्य को प्रजा का राज्य व स्वयं को राज्य का सेवक कहलाना पसंद करते थे। उनके राज्य में मानो हरियाली व सुख की वर्षा होती हो। पुत्र सत्यव्रत व पुत्री अंबा के प्रति स्नेह व प्रजा के लिए अपने कर्तव्य के कारण ही वह अपनी अर्धांगिनी की यादों से बाहर आ पाए थे। हालांकि महारानी की अकाल मृत्यु का दुख तो मन में था ही लेकिन संतान, प्रजा का ख्याल व अपने कर्तव्य के चलते यह दुःख थोड़ा कम हो गया था। या फिर यह भी कहा जा सकता है की स्वय को महारानी की यादों से दूर रखने के लिए हर समय व्यस्त रहने का प्रयत्न करते। जहा एक ओर राज्य को सत्यसेन के रूप में दयालु व न्यायप्रिय राजा मिले वहीं दूसरी ओर महाबली के रूप में कुशल, पराक्रमी, निडर व वीर सेनापति भी मिले। महाबली के नेतृत्व में आज तक राज्य किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुआ था। इसीलिए सेनापति महाबली महाराज के सबसे प्रिय व विशेष सलाहकार भी थे। २- ईर्ष्या लेकिन यह भी सत्य है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जब राज्य में सत्यसेन के पिता महाराज कर्णसेन का शासन था तब महाराज के दोनों पुत्र सत्यसेन व धीरसेन में बहुत प्रेम था। दोनों ही युवराज बहुत कुशल योद्धा होने के साथ ही चतुर, पराक्रमी व राजनीति का अच्छा ज्ञान रखने वाले थे। अगर देखा जाए तो दोनों हर पहलू में एक से थे। कोई भी व्यक्ति दोनों युवराज में अंतर नहीं कर सकता था। लेकिन जब महाराज समाधि में विलीन हुए और उनकी इच्छानुसार सत्यसेन को राजा घोषित किया गया तो धीरसेन को यह बात अनुचित लगी। उसे लगा यह उसके साथ अन्याय है। वह भी किसी से कम नहीं है, फिर सत्यसेन को ही राजा क्यों??? दोनों की परीक्षा लेकर, सफल होने वाले को भी राज्य दिया जा सकता था। लेकिन पिता के निर्णय के आगे वह कुछ नहीं कर सकता था। इसलिए उसने यह बात स्वीकार ली। धीरे-धीरे सत्यसेन का राज्य समृद्ध होता गया। अब तक आस - पास के कुछ राज्य उनके अधीन हो चुके थे और वह प्रजा के प्रिय हो चुके थे। शायद इसी बात से धीरसेन को ईर्ष्या होने लगी थी। उसे स्वयं का अस्तित्व भंग होता नजर आने लगा। इसी द्वेष के चलते उसने कई बार महाराज के प्राण हरने के प्रयत्न किए लेकिन हर बार वह विफल ही रहा। शायद कुल देवता की कृपा या प्रजा का प्रेम ही रहा होगा, नहीं तो धीरसेन जैसे कुशल योद्धा का प्रहार कभी खाली नहीं जाता। अब शायद वह भी जान गया था कि वह अकेले सत्यसेन को नहीं मार सकता। अब उसे स्वप्न भी आते तो यही की किस तरह महाराज के प्राण लिए जाए। उसकी ईर्ष्या ने महाभयंकर रूप लेे लिया था। वह वीर, साहसी व कुशल योद्धा अब एक कायर, अपराधी की भांति सोचने लगा था। ३- मृत्यु एक दिन महाराज, सेनापति महाबली के साथ महल से बाहर प्रजा की सुरक्षा, पानी की व्यवस्था और किसानों की दशा का ब्यौरा लेने गए और वापस लौटकर वह सत्यव्रत और अंबा से भेंट करने गए। जैसे ही दोनों पिता को गले लगाने दौड़े, सत्यव्रत "पिता जी" कहते ही धरा पर गिर पड़ा। महाराज को समझ नहीं आया कि यह क्या हुआ? अंबा भी सहम गई। तुरंत वैद्य बुलाए गए और शीघ्र अतिशीघ्र उपचार आरंभ कर दिया गया। वैद्य ने औषधि तो दे दी लेकिन युवराज पर उसका कोई असर नहीं हुआ। " ऐसा विष युवराज को दिया गया है, जिसका प्रभाव धीरे-धीरे होता है। इसका कोई तोड़ हमारे पास नहीं है।" वैद्य आपस में कह रहे थे। परन्तु हम प्रयत्न तो कर ही सकते है, कदाचित कोई हल निकल ही जाए। हा ! आप सही कह रहे है, ऐसा कहते हुए प्रयत्न फिर से आरंभ कर दिए जाते है। परंतु युवराज का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन बिगड़ता ही जा रहा था। कोई औषधि, कोई उपचार काम नहीं कर रहा था। किसी भी वेद्य के पास इसका हल नहीं था। महाराज अपने सभी कार्य, राजपाठ छोड़कर युवराज के कक्ष के बाहर चक्कर लगाते रहते और आकाश की ओर देखते हुए हाथ जोड़कर प्रभु से सत्यव्रत के कुशल मंगल की कामना करते। जो राजमहल सत्यव्रत ओर अंबा की मुस्कुराहट से भौर से संध्या तक महकता और खिलखिलाता रहता था अब कई दिनों से महल में एक हंसी का स्वर भी ना सुनाई दिया था। मानो पूरे महल में दुःख ने घर कर लिया था। अमावस की वह रात अत्यंत भयानक व रूदनभरी रही जब नन्हे राजकुमार की मृत्यु हुई। इस घटना से एक बार फिर राजमहल में अंधकार छा गया। ४- अपराधी कौन? कई महीनों तक महल ने पूर्णिमा का चांद ना देखा। महाराज ने अपनी आंखो के सामने पहले अपनी पत्नी और फिर पुत्र को मरते देखा। उनकी आंखे नम थी लेकिन आंखो से एक भी आंसू ना बहने दिया। वह ऐसा दुष्कर्म करने वाले को अपने हांथो से सजा देना चाहते थे। लेकिन समस्या यह थी कि यह काम किसका हो सकता है, उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था। उनकी तो जैसे सोचने कि शक्ति ही क्षीण हो गई थी। महाराज को सेनापति महाबली पर पूर्ण विश्वास था इसीलिए उन्होंने सेनापति को बुलवाकर अपराधी का पता लगाने का आदेश दिया। महाराज की आज्ञा पाकर सेनापति बहुत ही गुप्त तरीके से खोज करने लगे। किन्तु अपराधी इतना चतुर था कि कोई भी निशान नहीं छोड़ा था। लेकिन महाबली ने हार नहीं मानी और अपराधी का पता लगाने में जुटे रहे की एक दिन उन्हें ज्ञात हुआ कि जिस दिन महाराज महल से बाहर गए थे उसी दिन महाराज के भाई बहुत समय तक राजकुमार के साथ ही थे। वह इस विषय में कोई भूल नहीं करना चाहते थे। उन्हें पूर्ण रूप से तो पता नहीं चल पाया था लेकिन उन्होंने एक युक्ति बना ली थी। महाबली महाराज के पास गए और महाराज से कहा - हे महाराज ! आप कल प्रातः महल से संबंधित प्रत्येक व्यक्ति को सभागार में उपस्थित होने का आदेश दे। कल आपको युवराज का हत्यारा मिल जाएगा। यह सुन महाराज ने आशा पूर्ण दृष्टि से देखते हुए पूछा - क्या तुम्हे अपराधी का पता चल गया है? कौन है वो? किसने मेरे पुत्र की हत्या की है? बताओ महाबली...... महाराज! आप कृपया धैर्य रखें और शांत हो जाए। कल प्रातः आपको अपने सभी प्रश्नों के उत्तर प्राप्त होंगे। अब आप विश्राम कीजिए। महाराज की आज्ञा पाकर सेनापति कक्ष से बाहर आए और विचार करने लगे " यदि महाराज के भाई ही युवराज के हत्यारे हुए तो महाराज कैसे यह सब सह पाएंगे।" ५- बहिष्कार अंधेरा छटा और पंछियों का कलरव चारो ओर फैलने लगा। अब समय आ गया था अपराधी को सजा देने का। सेनापति अपने एक हाथ में तलवार और दूसरे में कांच का एक प्याला लिए हुए कहने लगे - " युवराज का हत्यारा कौन है? महाराज जान गए है।" जिसने भी युवराज की हत्या कि है वह स्वयं सबके सामने आ जाए अन्यथा महाराज की आज्ञानुसार उसे भी यह विष पिला दिया जाएगा यदि तब भी उसी क्षण उसकी मृत्यु ना हुई तो इसी तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। महाराज की नजर सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति पर थी। अपराधी चाहे कितना भी चालाक क्यों ना हो, मौत का भय तो चेहरे पर झलक ही आता है। महाराज तुरंत सिंहासन से उठे और सेनापति के हाथ से तलवार लेकर क्रोध में आगे बढ़ते हुए बोले - " नीच, पापी तूने ऐसा क्यों किया? इस सिंहासन को पाने के लालच में? " अब महाराज की तलवार और धीरसेन का सिर... लेकिन वह था तो महाराज का भाई ही। महाराज अपने है भाई के प्राण कैसे लेे सकते थे। धीरसेन ने पहली बार अपने भाई की आंखो में अपने लिए घृणा महसूस की। महाराज ने उसकी तरफ से नज़रे हटाते हुए कहा - " दूर हो जाओ मेरी नज़रों से,  मै महाराज सत्यसेन.. अभी तुम्हारा महाबलीपुरम राज्य से बहिष्कार करता हू।" धीरसेन बिना कुछ कहे तुरंत सिर झुकाए राज्य की सीमा से बाहर चला गया।                                 ६- परीक्षा महाराज ने अंबा को युद्धनीति सिखाने का उत्तरदायित्व सेनापति महाबली को सौप दिया। वह स्वयं भी अंबा को तलवारबाज़ी सिखाया करते व अंबा के साथ इसका अभ्यास भी किया करते। प्रजा के प्रति अपना कर्तव्य, एक राजा होने के साथ ही एक पिता होने का कर्तव्य भी वह बहुत अच्छे से निभा रहे थे। वह कितने भी व्यस्त क्यों ना हो लेकिन अंबा के लिए समय निकाल ही लेते थे। कब इतना समय बीत गया पता ही नहीं चला। खिलौनों से खेलने वाली अंबा अब तलवारबाज़ी, तीरंदाजी, घुड़सवारी करने लगी थी और राज्य के कई कार्यों में पिता जी की सहायता भी करती थी। अब समय आ गया था अंबा कि परीक्षा का...... पड़ोसी राज्य के साथ युद्ध छिड़ चुका था। इस बार स्वयं अंबा ने पिता के स्थान पर युद्ध में जाने की आज्ञा मांगी। पिता ने मुस्कुराते हुए, अंबा के सिर पर हाथ रखा व पुत्री को मंजूरी दे दी। कई दिनों तक युद्ध चलता रहा। अंबा स्वयं सेनापति महाबली के साथ युद्ध का नेतृत्व कर रही थी। उसकी युद्ध नीति बहुत ही कुशल व थोड़ी अलग थी। सेनापति हैरान थे लेकिन खुश भी थे। काफी लंबे युद्ध के बाद महाबलीपुरम राज्य विजयी हुआ.... राज्य के अभी लोग अंबा व सेनापति की प्रसंशा व जय जयकार कर रहे थे। पहली बार एक महिला युद्ध क्षेत्र में युद्ध कर रही थी। अंबा के महल वापस लौटने पर महाराज अपनी पुत्री को गले लगा लेते है और खुशी से भावविभोर होकर कहते है - " पुत्री! मुझे तुम पर गर्व है। आज तुम परीक्षा में सफल रही।" * महल में शांतिपूर्ण मुस्कान फैल जाती है।* ७- राज्याभिषेक समय व्यतीत होने के साथ-साथ अंबा नई कलाए सीखती रही व पिता का मान बढ़ाती रही।अब राजा वृद्ध हो चले थे और अब उन्हें आभास हो गया था कि अब वह सभी कार्यों के लिए सक्षम नहीं है। उन्होंने एक सभा बिठाई और अंबा को राजगद्दी देने की बात रखी। सभी इस बात से सहमत हुए क्योंकि सभी अंबा के शौर्य से परिचित थे और सिर्फ एक युवक ही राजगद्दी पर बैठ सकता है, यह राज्य इस नियम से सहमत नहीं था। एक शुभ मुहूर्त निकलवाया गया और बहुत ही हर्षोल्लास के साथ अंबा का राज्याभिषेक किया गया। प्रजा अंबा को शासक के रूप में पाकर बहुत ही खुश थी। सभी अंबा को बधाई देते व बधाई गीत गाते जैसे आज ही होली और आज ही दीवाली हो। महाराज ने महाबली से कहा - " महाबली! जैसे आज तक आप मेरे और इस राज्य के रक्षक रहे है वैसे ही अब आपको पुत्री अंबा की रक्षा करनी है।" जी महाराज! जैसी आपकी आज्ञा..... उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

दो दोस्तों की कहानी – Small Story in Hindi About 2 Friends - Hp Video Status

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे कहानियां हम सभी को एक अलग दुनिया में ले जाती है। और कहानी जितनी छोटी होती है उतनी ही मजेदार और प्रेरणादायक भी । इसलिए  हम आपके लिए ऐसी ही एक शोर्ट हिंदी स्टोरी लाये है जो आप बस 1 मिनट में पढ़ सकते है। ये कहानी छोटी भी है और प्रेर्नादायक्त भी। एक बार दो दोस्त रेगिस्तान पार कर रहे थे। रास्ते में उनका किसी बात पर झगड़ा हो गया और एक दोस्त ने दूसरे दोस्त को गुस्से में आकर थप्पड़ मार दिया। दूसरे दोस्त को इस बात से दिल पर बहुत ठेस पहुंची, और उसने रेत पर एक लकड़ी से लिखा -“आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने छोटा सा झगड़ा होने पर थप्पड़ मार दिया “रेगिस्तान में वे एक दुसरे को छोड़कर नहीं जा सकते थे, इसलिए उन्होंने सफर जारी रखा और सोचा मंज़िल पर पहुँचकर इस झगडे को सुलझाया जायेगा। वे आपस में बिना बात किये, साथ साथ चलते रहे, आगे उन्हें एक बड़ी झील मिली। उन्होंने इस झील में नहाकर तरोताज़ा होने का फैसला किया। झील के दुसरे किनारे पर एक बहुत खतरनाक दलदल था, वह दोस्त जिसे चांटा मारा गया था, तैरते – तैरते झील के दूसरे किनारे पर इस दलदल में जा फंसा, और डूबने लगा। उसके दोस्त ने जब यह देखा, तो वह भी तुरंत उस तरफ तैर कर आया और अपने दोस्त को बड़ी मशक्क़त के बाद बाहर निकल लिया. जिस दोस्त को दलदल से बचाया गया था उसने झील के किनारे एक बड़े पत्थर पर लिखा “आज मेरे दोस्त ने मेरी जान बचाई” दूसरे दोस्त ने यह देखकर पूछा “जब मैंने तुम्हे थप्पड़ मारा था तो तुमने उसे रेत पर लिखा ! लेकिन जब मैंने तुम्हारी जान बचाई तो तुमने पत्थर पर लिखा, ऐसा क्यों, दूसरे दोस्त ने जवाब दिया “जब हमें कोई दुःख पहुंचाता है तो हमें इसे रेत पर लिखना चाहिए, जहाँ वक़्त और माफ़ी की हवाएँ उसे मिटा दें” लेकिन जब कोई हमारे साथ अच्छा बर्ताव करे, तो हमें उसे पत्थर पर लिखना चाहिए, जहाँ उसे कोई मिटा ना सके। उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.  

Beautiful Story of Life in Hindi – आपकी ज़िन्दगी बदल देगी ये कहानी

नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे अक्सर हम अपनी तुलना दूसरों से करते हैं, और उन्हें देखकर हमें ऐसा लगता है कि उनके पास सबकुछ है और हमारे पास कुछ भी नहीं। यही देखकर हम दुखी हो जाते हैं। लेकिन इस Beautiful Story of Life in Hindi को पढ़कर आप शायद ऐसा नहीं सोचेगें। इस कहानी को पढ़ने के बाद जिंदगी को देखने का आपका नजरिया यकीनन बदल जाएगा। तो चलिए शुरू करते हैं Nice Story about Life in Hindi   एक कौआ था, वो अपनी जिंदगी से बहुत ही संतुष्ट और खुश था, हमेशा अपनी ही मस्ती में रहता था । वो हमेशा अपने पंखों को फैला ऊंचे आसमान में उड़ता था जिसपर की उसे बहुत गर्व था । एक दिन कौए को बहुत तेज प्यास लगी और वो एक तालाब के पास रुका, वहां उसकी नजर हंस पर पड़ी। हंस को देख कौआ मन ही मन ये सोचने लगा कि ये हंस कितना खूबसूरत है। इसका सफेद रंग, इसके शरीर की बनावट कितनी सुंदर है, यकीनन ये अपनी सुंदरता से बहुत खुश होगा । मैं तो कितना काला हूं। कौए ने मन ही मन ये सोचा कि ये अपनी सुंदरता से बहुत खुश होगा और यही सोचते- सोचते हंस के पास गया।   कौए ने हंस से कहा “तुम कितने सुंदर हो, यकीनन तुम्हे अपनी सुंदरता पर बहुत गर्व महसूस होता होगा और दूसरे पक्षियों को तुमसे जलन होती होगी?” कौए की ये बात सुन हंस ने कहा “मित्र मैं भी पहले यही सोचता था, लेकिन जब मैंने तोते को देखा, तब मुझे लगा कि मैं गलत था। क्योंकि तोता बहुत सुंदर होता है और उसके पास दो प्यारे- प्यारे रंग होते हैं, इसलिए मुझे लगता है कि तोता ही सबसे सुंदर पक्षी है, मैं तो उसके सामने कुछ भी नहीं”.   हंस की ये बात सुन कर कौआ तोते के पास पहुंचा। तोते की ख़ूबसूरती देखकर कौआ स्तब्ध रह गया और तोते को जा कर कहा “तुम कितने सुंदर हो, हंस बिल्कुल सही कह रहा था, तुम तो हंस से भी ज्यादा खूबसूरत हो, यकीनन तुम्हे अपनी ख़ूबसूरती पर नाज़ होगा और तुम हमेशा खुश रहते होंगे”. कौए की बात सुनकर तोते ने कहा “नहीं ……. ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। मुझे भी पहले ऐसा ही लगता था, जबतक मैंने मोर को नहीं देखा था। मोर के पास बहुत सारे रंग हैं और वो बहुत ही ज्यादा खूबसूरत है, इसलिए मोर ही दुनिया का सबसे सुंदर और खुशहाल पक्षी है।” फिर क्या था तोते की बात सुन कौआ चिड़ियाघर पहुंच गया मोर के पास।   चिड़ियाघर पहुंच कर कौए ने देखा कि मोर पिंजरे में बंद है और हजारों लोग उसे देखने के लिए आ रहे हैं। कुछ पल के लिए तो कौआ मोर की सुंदरता देखकर हैरान ही रह गया और कुछ देर बाद मोर के पास गया और उससे कहा “मित्र मोर, तुम तो वाकई में बहुत ही ज्यादा सुंदर हो। तुम्हारी सुंदरता अद्भूत है। तुम्हें देखने के लिए तो हजारों लोग भी आते हैं। इसलिए सच में तुम ही दुनिया के सबसे सुंदर और खूबसूरत पक्षी हो।”   Inspirational Story about Life in Hindi   कौए की ये बात सुनकर मोर बोला “मैं भी यही सोचा करता था कि मैं दुनिया का सबसे सुंदर और खुश पक्षी हूं। लेकिन देखो मेरी सुंदरता की वजह से मुझे यहां पिंजरे में कैद कर लिया गया है। मित्र मैं खुश नहीं हूं। मैं तो अब बस यही सोचता हूं कि काश मैं कौआ होता तो आजाद आसामान में उड़ रहा होता।”   मोर की कथनी सुन कौए को सब कुछ समझ आ गया। अब उसे दोबारा से अपने पर गर्व महसूस होने लगा और अब वो पहले से भी ज़्यादा खुश रहने लगा।   दोस्तों, बिलकुल यही कहानी आजकल हम सब की है। हम दुसरो की दौलत, बड़ा घरबार, गाड़ियां देखकर सोचते है कि ये लोग कितने खुश होंगे लेकिन ऐसा सबके साथ नहीं होता। हमारे पास जो कुछ भी है हमें उससे संतुष्ट रहना चाहिए वरना हम कभी खुश नहीं रह पाएंगे। अक्सर हम उन्हीं चीजों के पीछे भागते हैं, जो हमारे पास नहीं है और ऐसे ही हमारा बहुमूल्य समय निकलता जाता है। हमेशा याद रखिये कि हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती!   उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.  

Real Story एक महान योद्धा जिसका महाराणा प्रताप ने अपमान किया था

इतिहास का एक महान योद्धा जिसका महाराणा प्रताप ने अपमान किया था नाम जरूर जाने नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, इतिहास में कई बड़े-बड़े और शक्तिशाली योद्धा में जन्म लिया था, इनकी वीरता के गुणगान आज भी गाए जाते हैं लेकिन आज हम आप लोगों को इतिहास के एक ऐसे शक्तिशाली योद्धा के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका अपमान महाराणा प्रताप ने किया था। महाराणा प्रताप इतिहास की एक शक्तिशाली और बहादुर योद्धा माने जाते हैं जो अपने जीवन काल में हमेशा अपनों के खिलाफ युद्ध किये थे। दोस्तों महाराणा प्रताप ने इतनी शक्तिशाली योद्धा का अपमान किया था वह कोई और नहीं बल्कि मान सिंह है जिसे इतिहास का एक महान योद्धा के रूप में जाना जाता है। मानसिंह ने अपने जीवन काल में अकबर जैसे राजा के साथ मिलकर का युद्ध लड़े थे। दोस्तों बता दे मानसिंह ने असम, केरल जैसे राज्य को देखकर सम्राट अकबर को दे दिया था, इसलिए सम्राट अकबर ने मानसिंह की बहादुरी को देख कर उसे प्रधान सेनापति नियुक्त कर दिया था। दोस्तों बात उस समय की है जब राजा अकबर चित्तौड़ को अपने राज्य में मिलाने के लिए चित्तौड़ पर बार बार आक्रमण कर रहा था, लेकिन हमेशा उसे महाराणा प्रताप के हाथों से हार का सामना करना पड़ रहा था, जिसके कारण राजा अकबर ने मानसिंह को महाराणा प्रताप से बात करने के लिए चित्तौड़ भेजा। उसके बाद जब मान सिंह चित्तौड़ पहुंचा तब वहां पर महाराणा प्रताप के मंत्रियों ने मानसिंह का अच्छे से स्वागत किया लेकिन महाराणा प्रताप स्वागत करने के लिए नहीं आए। उसके बाद जब खाना खाने का समय आया तब भी महाराणा प्रताप पेट दर्द का बहाना बनाकर मानसिंह के साथ खाना खाने से इंकार कर दिया। उसके बाद मानसिंह को बहुत ज्यादा गुस्सा आया और उन्होंने महाराणा प्रताप के पास जाकर उनसे साथ में खाना न खाने का कारण पूछा। उसके बाद महाराणा प्रताप ने मानसिंह से कहा कि जो व्यक्ति मातृभूमि की इज्जत दुश्मनों के साथ मिलकर लूटता है हम उस व्यक्ति से बात करना भी पसंद नहीं करते हैं। उसके बाद मानसिंह वहां से चला जाता है। मान सिंह के जाने के बाद महाराणा प्रताप ने सभी बर्तनों का शुद्धिकरण करवाया था। उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

Hindi Info भारत के 5 सबसे अनूठे गांव ये है

ये है भारत के 5 सबसे अनूठे गांव, नंबर 1 में तो है अपना संविधान. नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, आज हम आपको भारत के 5 सबसे अनोखे गांव के बारे में बताने वाले हैं जो अपने आप में अलग ही देश-विदेश में पहचान रखते हैं, तो चलिए आज की चर्चा शुरू करते हैं। 5. पिपलांत्री यह भारत का सबसे विकसित गांव के तौर पर जाना जाता है। इस गांव के विकास को डेनमार्क देश की किताबों में भी पढ़ाया जाता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारत के अधिकतर लोग इस गांव के बारे में नहीं जानते हैं। यह गांव राजस्थान के उदयपुर से 50 किलोमीटर दूर है और इस गांव की जनसंख्या करीब 1500 लोगों की है। इस गांव में पानी, पेड़ और बेटी बचाने के लिए देशभर में सबसे शानदार उदाहरण पेश किया है। इस गांव में इजरायल तकनीक पर आधारित कई प्रकार हाईटेक खेती की जाती है। लड़कियों के जन्म पर इस गांव में 111 पेड़ लगाने होते हैं और इनकी शादी का सारा खर्च पूरा गांव मिलकर उठाता है। 4. मावल्यान्नॉंग इस गांव को एशिया का सबसे स्वच्छ गांव की उपाधि मिली हुई है। यह गांव स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने से कई सालों पहले स्वच्छता के मामले में अव्वल रहा है। यह गांव भगवान का बगीचे के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह गांव भारत-बांग्लादेश के बॉर्डर पर मेघालय राज्य में स्थित है। आपको अपनी जिंदगी में एक बार इस गांव में जरूर जाकर आना चाहिए। 3. कोडिन्ही केरल में स्थित यह गांव जुड़वाँ बच्चों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। आपको यहां पर हर घर में एक जुड़वाँ बच्चा जरूर मिल जाएगा। यहां जुड़वाँ बच्चा पैदा होने की क्या वजह है, अभी तक कोई भी असली कारण नहीं खोज पाया है। आपको यहां पर नवजात शिशु लेकर 60 साल के बुड्ढे तक का डबल रोल मिल जाएगा। यह गांव वाले इन जुड़वाँ बच्चों की वजह से कितने कंफ्यूज होते होंगे यह तो अब बस ऊपरवाला ही जाने। 2. करचोंड आज भी भारत में अंतरजातीय विवाह या फिर शादी से पहले लड़की से मिलने की वजह कितनी ही समस्या और लड़ाई दंगे हो जाते हैं। भारतीय न्यायालय ने हाल ही में लोगों को लव इन रिलेशनशिप में रहने के अधिकार प्रदान किए हैं लेकिन यह गांव इस मामले में हजारों साल पहले से ही आगे हैं। गुजरात के सेलवास से 30 किलोमीटर दूर स्थित 3 हजार आदिवासी लोगों के इस गांव में आप बेरोकटोक किसी भी लड़की के साथ लव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं। अक्सर लोगों की गांव के प्रति गलत धारणाएं ही रहती है लेकिन यह गांव शहर से भी आगे है। 1. मलाणा हिमाचल प्रदेश के मनाली शहर से 70 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव अपने आप में कई खूबियों से भरा हुआ है। अगर आपको इस गांव की पहली खूबी बताई जाए तो इस गांव में कनाशी भाषा बोली जाती है जो केवल विश्व में केवल इसी गांव के लोग जानते हैं और यह इसे ना ही किसी बाहरी लोगों को सिखाते हैं। दूसरी बात इस गांव में मलाणा क्रीम मिलती है जिसे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भांग के तौर पर जानी जाती है। इस गांव के लोग खुद को सिकंदर का वंशज मानते हैं और यह दुनिया का सबसे पुरानी लोकशाही गांव है। इस गांव में खुद का संविधान और संसद है जिसमें ये निचले सदन को कनिष्थाँग और उच्च सदन को जयेशथाँग कहते है। गांव में साल भर भीड़ रहती है लेकिन यहां के लोग अपने ही मस्ती में रहते हैं। खैर, यह थे भारत के कुछ अनूठे गांव, अगर आपके गांव या आसपास गांव में भी कुछ अनूठी बात है उम्मीद है दोस्तो आपको Hp Video Status की यह जानकारी अच्छी लगी होगी. अच्छी लगी तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें. और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करना ना भुले.

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