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जब प्यार में हुआ लोचा - Hindi Love Story - Hindi Love Stor

संजीव एक कट्टर हिन्दू परिवार में पैदा लिया था,जहाँ उसे बचपन से हिन्दतुव के बारे बताया गया,और साथ ही मुसलमान को खुद से दूर रहने को बताया गया था, बचपन से ही उसे मुसलमान से नफरत हो गयी थी. जिसकी वजह थी उसके दादा और छोटे चाचा एक आतंकवादी हमले में मारे गए थे ,जिसकी वजह से संजीव को मुसलमानो से नफरत हो गयी थी, वो अब सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दे रहा था, पढ़ाई पूरी करने के बाद वो दिल्ली चला गया जहाँ उसे एक अच्छे कम्पनी में जॉब मिल गया,वो बहुत खुश था,और उसकी जिंदगी भी अच्छी कट रही थी, सैलरी भी अच्छी मिल रही थी, वो बहुत मेंहनत कर रहा था.जिससे उसके बॉस बहुत खुश थे. एक दिन कंपनी में और स्टाफ की जरुरत महसूस हुई,इसलिए उसने विज्ञापन दे दिया, बहुत सारे कैंडिडेट आये , जिसमे से सेलेक्ट करने के जिम्मेदारी संजीव को दी गयी,संजीव ने कुछ कैंडिडेट का इंटरव्यू लिया, जिसमे उसे स्वेता पसंद आयी, उसने स्वेता को सेलेक्ट कर लिया और उसे अगले दिन काम पर बुला लिया, या यूँ कहे की उसे स्वेता के बात करने का स्टाइल,उसका लुक संजीव को पसंद आ गया था, कहीं ना कहीं उसे स्वेता से प्यार सा हो गया था, वो कल का बेसब्री से इंतजार करता रहा, लेकिन स्वेता नहीं आयी. उसे समझ में नहीं आ रहा था की स्वेता क्यों नहीं आयी,लेकिन वो क्या कर सकता था? उसे लगता था की स्वेता कल आएगी, लेकिन स्वेता कल भी नहीं आयी, कुछ दिनों तक वो स्वेता का इंतजार करता रहा,लेकिन स्वेता नहीं आयी, कुछ दिनों के बाद कम्पनी ने फिर से इंटरव्यू रखा,लेकिन संजीव को कोई पसंद नहीं आयी,अचानक एक दिन संजीव को कम्पनी में स्वेता नजर आयी जिसे देख कर वो चौंक गया और वो स्वेता के पास गया और बोला तुम इंटरव्यू में सेलेक्ट हो गयी फिर क्यों नहीं काम पर आयी, लड़की को बहुत आस्चर्य हुआ, उसने संजीव से पूछा क्या मैं इंटरव्यू देने के लिए आयी थी, संजीव ने कहा,हाँ तुम ही इंटरव्यू देने आयी थी, भूल गयी क्या? उसने स्वेता का रिज्यूमे दिखाया, लड़की ने रिज्यूमे देखा उसके बाद वो अचानक से बोली हाँ मैं आयी थी मुझे याद आ गया, लेकिन मम्मी का तबियत खराब होने की वजह से ज्वाइन नहीं कर पायी, क्या अब कर सकती हूँ,संजीव ने हाँ में उतार दिया, लड़की ने काम करना शुरू कर दिया, धीरे-धीरे स्वेता और संजीव करीब आने लगे, वो दिन भी आ गया जब संजीव ने अपने प्यार का इजहार स्वेता से कर दिया और उससे शादी करने की बात कह डाली,साथ ही ये भी कह दिया की वो अपना पता दे वो उसके मम्मी-पापा से मिलेगा,ये सब सुन कर स्वेता थोड़ी देर के लिए चुप हो गयी,उसे समझ में नहीं आ रहा था की वो क्या करे? वो अगले दिन उसे ले जाएगी ऐसा बोल कर वो चली गयी,संजीव भी मान गया लेकिन स्वेता फिर नहीं आयी, काफी दिन बीत गए लेकिन स्वेता नहीं आयी,एक बार फिर संजीव का दिल टूट गया,उसे समझ नहीं आ रहा था की आखिर स्वेता उसके साथ ऐसा क्यों कर रही है? काफी दिन गुजर जाने के बाद एक दिन अचानक संजीव को स्वेता बाजार में नजर आयी संजीव ने स्वेता को देखा तो वो बहुत खुश हुआ,लेकिन उसके साथ एक और लड़का था और पास जाने पर उसे पता चला की स्वेता ने शादी कर लिया है, अब तो उसे बहुत गुस्सा आया,वो स्वेता को बुरा भला कहने लगा, उसने कहा की प्यार मुझसे और शादी किसी और से ऐसा उसने क्यों किया? स्वेता सुन कर चौंक गयी उसने कहा की वो उसे जानती भी नहीं, उसने बोला वो उसके साथ कम्पनी में काम करती थी उसने उसके साथ प्यार भी किया था, वो सब भूल गयी,लेकिन स्वेता ने बताया की वो किसी कम्पनी में काम ही नहीं की, संजीव ने जब कंपनी का नाम बताया तो स्वेता ने कहा की वो उस कम्पनी में इंटरव्यू दी थी लेकिन उसकी शादी ठीक हो गयी इसलिए वो काम नहीं की, उसके पति ने भी कहा, ये बात तो सच है उसकी शादी हो गयी थी और स्वेता उसके साथ रहती थी फिर वो कम्पनी में कब काम की? ये सुन कर तो संजीव चकित हो गया की अगर वो स्वेता नहीं थी तो वो लड़की कौन थी, संजीव को कुछ समझ नहीं आ रहा था, तभी एक दिन मॉल में उसे फिर से स्वेता नजर आयी पहले तो उसे लगा की कहीं वो ही ना हो? ; लेकिन स्वेता ने जब नजरे चुराई तो वो उसके पास पहुंच गया और पास जाने के बाद पाया की वो शादी शुदा नहीं है, उसने जब पूछा तो लड़की ने बताया की वो स्वेता नहीं है वो जॉब की तलाश में आयी थी, लेकिन जब उसे पता चला की स्वेत जो बिलकुल मेरी तरह दिखती है और उसे जॉब मिल चूका है इसलिए उसने बिना कुछ बोले जॉब करने लगी, लेकिन जब तुम मेरे करीब आये तो वो दूर हो गयी क्योंकि तुम जिससे सबसे ज्यादा नफरत करते हो मैं वहीँ हूँ? संजीव नहीं समझ पाया, उसने कहा ऐसा क्या है, जिसकी वजह से मैं तुमसे नफरत करूँगा,इस पर लड़की ने बताया की उसका नाम स्वेता नहीं हिना है,और वो हिन्दू नहीं मुस्लिम है जिसे सुन कर संजीव के पैरो तले जमीन खिसक गयी, वो अब क्या बोलता? बात तो सही थी, एक तरफ उसका प्यार था जिसे वो जानो से ज्यादा चाहता था,दूसरी तरफ वो मुस्लिम थी जिससे वो सबसे ज्यादा नफरत करता था, वो कुछ देर यूँ ही खड़ा रहा, लेकिन उसका प्यार उसके नफरत को हरा दिया और उसने हिना को गले लगा कर बोला वो उससे ही शादी करेगा, ये सुन कर हिना को हैरानी हुई, लेकिन संजीव ने कहा की कल वो तैयार रहे अब वो उसी से शादी करेगा और संजीव ने ऐसा ही किया वो हिना से शादी कर लिया इस तरह नफरत पर प्यार की जीत हुई. मैं आशा करता हूँ की आपको ये “Hp Video Status Ki Kahani” प्रेरक कहानी आपको अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
 

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रुहानी प्रेम - एक शानदार कहानी - Hindi Love

मंयक, तुम सुन रहे हो ना। आज फिर से शुचि ने मेरे जख्मों को अपनी जुबां के तीर से कुरेद दिया है। इन बीस सालों में गमों की तपिश से मैं कैसे झुलसती रही हूँ वह तुम भी जानते हो। क्या मैंने अकेले ही तुम से प्यार किया था? तुम्हारा प्यार क्या महज़ छलावा था? तुमने जो सुनहरे रंग मेरे जीवन में भरे थे, क्या वे सब मन बहलाने का साधन मात्र थे। नहीं ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा कहकर मैं, हमारे अद्भुत प्रेम को मलिन नहीं कर सकती। तुम्हारे भीतर उमड़ते इश्क़ के अथाह सागर की हमेशा साक्षी रही हूँ मैं। तुम्हें याद तो जरूर होगा जब यौवन की दहलीज़ पर तुम्हारे अव्यक्त प्रेम को तुम्हारी आंखो से सैलाब बनकर बहते देखा था। मेरी धड़कनों ने तुम्हारी रुह की जमीन पर कदम रख कर हसीं धुनों को सुन लिया था। याद तो होगा जब तुम अपनी भावनाओं को काबू नहीं कर पाए थे और प्रेम-इत्र से सुंगधित खत तुमने चुपके से मेरी किताब में रख दिया था। इस खत ने मेरे अनुशासित दिल में प्रेम धुन छेड़ दी थी जिसे तुम हर क्षण गुनगुनाते थे। मैंने तुमसे कभी नहीं जानना चाहा कि तुम समाज के किस वर्ग से संबंध रखते हो। हां इतना अवश्य जानती थी कि तुम भी मेरी तरह क्षत्रिय समुदाय से हो। मेरा तुम्हारा इतना ही परिचय था कि हम दोनों आवासीय विद्यालय की शान थे। सबके चहेते। सबके प्रिय। सभी की आंख के तारे। 1970 के दशक में प्रेम करना ऐसे था जैसे आग के दरिया को पार करना। इसलिए हम दोनों केवल आंखों की भाषा में ही संवाद करते थे और तुम्हारा प्यार हमेशा प्रतीकों में व्यक्त होता रहा था। आवासीय परिसर में हमारे इश्क़ की खुशबूएं खामोशी की चादर ओढ़े फैलती रही थीं। तुम्हें याद तो होगा जब स्कूल में होली के रंगों से पूरा परिसर रंगा था। सभी तरफ उल्लास ही उल्लास। याद है तुम्हारे हाथ में लाल गुलाल था जो तुमने रंग लगाने के बहाने से मेरी मांग में भर दिया था और मेरा रोम रोम सिहर उठा था। लेकिन ये बात तो तुम्हारे हमारे तक ही सीमित थी। पता है उस रात बिस्तर पर लेटे हुए कितने हसीं ख्वाब मेरे मानस पटल पर तैर गए थे और उस दिन से मैंने जीवनसाथी के रूप में तुम्हें मन ही मन में वर लिया था। मंयक, तुम सुन रहे हो ना। बारहवीं की परीक्षा के बाद कैसे हम दोनों कक्षा के बाहर बरामदे में बैठ जाया करते थे और मृदुला मैम हमें इकट्ठा देखकर मुस्कुरा कर आशिर्वाद देती प्रतीत होती थी। हम दोनों यूं ही घंटों बैठे रहते थे। मैं खामोशी से कहती थी और तुम चुपके से सुनते थे। इस खामोशी में हमारे दिलों में उमड़ता सागर एक दूसरे की प्रेम में आकंठ लहरों से आलिंगनबद्व होकर इश्क़ की पराकाष्ठा तक हिलौरे लेता था। तुम्हें याद है ना मयंक, जब तुम अपने जज्बात पर काबू नहीं रख पाये थे तो लड़कियों के छात्रावास तक तुम्हारे कदम तुम्हें खींच लाए थे और होस्टल वार्डन से इज्जात लेकर तुमने मुझे छात्रावास के मेहमान कक्ष में बुलाया था। उस वक्त मैं ख्यालों के इत्र से भीगी हुई बैठी थी तुम्हारे सामने, नज़रें झुकाए और तुमने एक चुम्बन मेरी होठों पर रख दिया था। ये चुंबन तुम्हारा पहला स्पर्श था जो मुझे दिल की गहराई तक झंकृत कर गया था। फिर हम दोनों बस एक दूसरे की आंखों की भाषा पढ़ते रहे थे क्योंकि प्रेम की गहराई को व्यक्त करने के लिए सही शब्दकोश था ही नहीं हमारे पास। धीरे धीरे हमारे प्रेम की सुगबुगाहट छात्र छात्राओं में हो रही थी। याद है तुम्हें जब मैं छात्राओं की उपस्थिति रिपोर्ट दर्ज़ करने तुम्हारे पास विद्यालय की सभा में आती थी, तब कुछ शरारती छात्र मुझे देखते ही, मयंक, मयंक कहकर पुकारते थे"। मुझे तब बहुत गुस्सा आता था और फिर अगले दिन से मैंने उप कप्तान दीपिका को भेजा था रिपोर्ट देने। शायद मैंने पहले कभी नहीं बताया तुम्हें। पता है जब भी मैं दोपहर की प्रेप के लिए लड़कों के छात्रावास के सामने से गुजरती थी ना, तब कुछ शरारती छात्र फिर से " मयंक, मयंक" की आवाज़ लगाते थे और मेरे मुख की मुद्रा और गंभीर हो जाती थी। तुम्हें याद तो होगा, जब हम कक्षा के बाद सबसे आखिर में उठते थे और मैस तक साथ साथ जाते थे बगैर कोई बात किए। हमें बातें करनी ही नहीं होती थी। बस चार कदम का साथ ही प्रेम को पुष्पित पल्लवित करने के लिए काफी था। फिर तुम इशारा कर देते थे कि मुझे मुख्य कक्ष से जाना है और तुम मैस की किचन से होकर जाते थे ताकी सब की निगाहों से बच सकें क्योंकि तुम समझते थे मुझे लाइमलाइट में आना पंसद नहीं था। मयंक, तुम मुझे कितना समझते थे ना। तुम्हें याद है बारहवीं कक्षा की परीक्षा के बाद छात्रावास छोड़ने में अभी एक महीना था और हर पल को साथ जीने को हम बेकरार थे लेकिन मर्यादा में तो हम रहे थे। सभी छात्र छात्राओं का अब एक दूसरे से विदा लेने का समय आ गया था और हम सभी एक दूसरे के ऑटोग्राफ ले रहे थे। मेरी ऑटोग्राफ बुक में कितनी शालीनता से तुमने अच्छे जीवन की कामना की थी। तुमने वह बुक भी मेरे मेज़ की दराज़ में रख दी थी। पता है उसे खोलते हुए मेरे दिल में खुशबुओं की घटाएं उमड़ घुमड़ रही थीं। तुमने कभी भी मुझे किसी भी निर्णय के लिए मजबूर नहीं किया था। तुम्हारी इसी खूबी ने मेरे दिल में तुम्हारे लिए एक विशेष स्थान बना लिया था। कितनी नसीहतें दी थी तुमने। कभी प्रेम पर हक नहीं जताया था। बस पूर्ण निश्छल प्रेम। पूर्ण समर्पण। कोई बंधन नहीं। एक दिन फिर तुम्हारी यादों को समेटे मैं लौट गई थी अपने घर नयी राह पर।अपनी मंजिल को प्राप्त करने। तुम भी तो लौट गए थे अपने सपने पूरे करने। तुम्हें याद तो होगा दूर जाने के बाद पहला खत मैंने ही लिखा था तुम्हें। तुम्हारा जवाबी खत पाकर मेरे रोम रोम में इश्क का सागर हिलोरे ले रहा था। शाम को फिर मेरे पिताजी ने मुझे बैठाकर समझाया था। जमाना ही ऐसा था जब मोहब्बत भरे दिलों के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींच दी जाती थी जिसे पार करना, धड़कते दिलों के लिए मुश्किल ही नहीं असम्भव होता था। हर पिता को एक डर होता था कहीं बेटी के कदम ना लड़खड़ाएं। हमने एक पिता का सम्मान करते हुए अपने प्रेम को उनके चरणों में अर्पित कर दिया था। तुम्हें याद है ना वह खत जब मैंने तुम से हमारे प्रेम का वास्ता देकर कहा था कि तुम अब मुझे कभी खत नहीं लिखोगे। प्रेम की परीक्षा में तुम सफल हुए थे और मुझे हिदायत दी थी कि मुझे अपने पिता की आज्ञा शिरोधार्य करनी है। तुमने भी तो हमारे प्रेम की कसम दी थी मुझे। पता है उस दिन मेरा दिल के आंसू सावन की बदली बन बरस रहे थे। फर्ज़ और प्रेम के बीच पैंडुलम की तरह झूल रही थी मैं और फर्ज़ आखिर जीत ही गया था। मेरे पास कितने जूनियर, सीनियर, संगी साथी सब के खत आते थे लेकिन तुम्हें खोने के बाद, किसी के भी पत्र का जवाब नहीं दिया था। मेरी दुनिया में तुम नहीं थे तो और कोई भी नहीं रह सकता था। मैंनें अपने दायरे को समेट लिया था। लेकिन तुम्हारी याद मेरे दिल में उसी तरहं रच बस गई थी जैसे दुल्हन के हाथों में मेंहदी। मेरा मानना है कि, कुछ फसाने अधूरे होते हुए भी ताउम्र साथ रहते हैं और हमारा प्रेम भी कुछ इसी तरह हमारी अलग अलग जिंदगी में भी साथ कदम मिलाकर इश्क के सागर की थाती नापता रहा था।दो साल बाद मेरी शादी तय हो गई थी। मेरे जीवनसाथी बहुत खुशमिजाज़ व्यक्ति थे। मेरा गांम्भरीय उनकी समझ से परे था। मैंनें अपने दिल की गिरह को कभी खोला ही नहीं उनके सामने। सतर के दशक में यह जोखिम नहीं उठा सकती थी। धीरे धीरे मैं परिवार के प्रति समर्पित होती चली गई लेकिन तुम्हें भूल ही नहीं पाई कभी। मेरे पति ने भी कभी भूलने ही नहीं दिया। पता है वो मुझे मयंती कहकर बुलाते थे। इस तरह अनजाने में ही सही उन्होंने तुम्हारी याद को हर क्षण जिंदा ही नहीं रखा बल्कि सिंचित भी किया। पता है ये सब मेरे लिए कितना कठिन था लेकिन तुम तो जानते ही हो भावनाओं पर मैंने हमेशा काबू ही रखा है चाहे अंदर प्रेम सागर की लहरें तट से मिलने को कितनी ही आतुर क्यों ना हों। जीवनसाथी के साथ धीरे धीरे मेरी अच्छी समझ बन गई थी। झगड़े भी खूब हुए लेकिन डोर मजबूत होती चली गई और शादी के सोलह साल बाद हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे। सब कुछ था लेकिन पता नहीं हमेशा एक कशिश बनी रहती थी तुमसे मिलने की। जब भी मुझे एंकात मिलता मैं खामोशी से तुमसे बातें करती रहती। तुम्हें याद है ना मेरी छोटी बहन, शुभा, जो हमारे से जूनियर थी। भी तुम उससे मिलते थे मेरे बारे में पूछते थे। तुम्हें याद तो होगा, जब मैं एम। फिल। कर रही थी तुम्हें कविता ने बताया था कि मैं यूनिवर्सिटी के छात्रावास में रह रही हूं। पता है मुझे तुम्हारा वह खाली खत मिला था जो तुमने कविता को दिया था। संबोधन के बाद, पूरा पत्र खाली था। नहीं, खाली नहीं था। तुम्हारी आत्मा उसमें रची बसी थी। तुम आर्मी में लेफ्टिनेंट भर्ती हो गए थे और तुमने अपना पता लिखा था। जानते हो मेरे लिए कितनी कठिन परीक्षा की घड़ी थी वह, जहां तराजू के एक पलड़े में पति के लिए समर्पण था तो दूसरी तरफ तुम्हारे प्रेम की महक। उस वक्त मेरी शादी को तीन साल भी नहीं हुए थे। मुझे समझ थी कि यदि मेरे कदम अब इस दोराहे पर लड़खड़ाए तो इसका परिणाम खतरनाक हो सकता है। मेरे पति का स्वभाव भी कठोर था उनको अभी ठीक से समझा भी नहीं था। मुझे मालूम है तुम्हें बहुत बुरा लगा होगा लेकिन जवाबी खत लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी। हम फिर एक दूसरे के लिए खो गए थे। शादी के बीस साल बाद शुभा से तुम्हारा पता मिला था। मैंने अपने पति से परमिशन लेकर तुम्हें खत लिखा था क्योंकि वे इश्क की गहराई को समझते थे। उन्होंने मुझसे वायदा किया था कि तुम से जरुर मिलवायेगें। क्योंकि तब तक हम हमसफर ही नहीं बल्कि अच्छे दोस्त बन गए थे। पत्र का जवाब मुझे जल्द ही मिल गया था। तुम्हें याद है तुम्हारी पहली पंक्ति क्या थी? मुझे आज इतने साल बाद भी एक एक पंक्ति याद है। तुमने लिखा था, " It was pain and pleasure at the same time..."। तुमने भी अपनी पत्नी को पत्र दिया था पढ़ने के लिए और धीरे धीरे हमारे इश्क़ की कहानी पारिवारिक दोस्ती के रंग में रंगने लगी थी। तुम तो समझते ही हो कि, प्रेम और दोस्ती में महीन सी रेखा होती है। अपने परिवारों से बंधे हम दोस्ती और प्रेम के बीच उलझ कर रह गए थे। कभी प्रेम हावी हो जाता तो कभी अपनी सीमा जानकर हम फिर दोस्ती तक सिमट जाते। लेकिन हम दोनों ही जानते थे प्रेम की ज्वाला दोनों ओर धधक रही है। तुम्हें याद है ना जब सप्ताह में एक बार तो तुम अवश्य दूरभाष से संपर्क करते थे और मुझ पर वह सारा प्रेम न्यौछावर कर देते थे जो सीने में कहीं वक्त की तिजोरी में महफूज़ रखा था। मुझे याद है एक बार फोन पर कैसे तुम्हारी भावनाओं ने तुम्हारे दिमाग की नहीं सुनी थी। तुम्हारे सब्र का बांध टूटा था और तुमने अपने दिल की गिरह को खोलकर रख दिया था और तुम्हारी आंखो से सावन की झड़ी लग गई थी। उस वक्त दोनों तरफ से हृदय में दफन घुटन आंसुओं के साथ बह गई थी। हम दोनों ये समझ रखते थे कि कुछ राहें मंजिल तक नहीं पहुंचती पर कदमों के निसां समेटे रहती हैं। तब हम फिर हकीकत की दुनिया में लौट आते थे। मयंक, तुम्हें याद है ना जब तुमने मुझे अपनी पोस्टिंग के स्थान पर आमंत्रित किया था और मैं सपरिवार तुमसे मिलने दो दिन का सफ़र तय कर के आयी थी। तुम हमें लिवाने गाड़ी लेकर पहुंचे थे। मेरे पति ने तुम्हें अपने आंलिगन में ले लिया था। तुम उनके व्यक्तित्व और उनकी विशालहृदयता के मुरीद़ हो गए थे। हम दोनों तो फिर खामोश थे। इतने भाव उमड़ घुमड़ रहे थे कि शब्द मिल ही नहीं रहे थे व्यक्त करने के लिए। प्रेम के पुष्प की पंखुड़ियां खिलने को आतुर थी। जब प्रेम शब्द धारण कर लेता है ना तो उसकी सुवास मंद होने लगती है और हम अपने प्रेम की सुंगध बरकरार रखना चाहते थे। बच्चों को प्यार करने के बाद तुम मेरी तरफ़ बढ़े थे। हैंडशेक करते हुए अंतर्मन की अनगिनत खुशियां घटाएं बनकर हाथों के स्पर्श मात्र से एक दूसरे के दिल की धड़कनों तक जा पहुंची थी। समय पंख लगा कर उड़ने लगा और हम दोनों पारिवारिक दोस्ती को मजबूत करने की दिशा में बढ़ चले। दो साल तो सब कुछ सही दिशा में आगे बढ़ रहा था लेकिन कहते हैं ना कि जब मनुष्य अत्यधिक खुश होता है तो दुख अपने अस्त्र शस्त्र के साथ पीछा करने लगता है। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही तो हुआ था। आज से तेइस साल पहले जब मेरी एक अंतरंग सहेली के कटाक्ष ने मुझे अवसाद की गहरी खाई में धेकल दिया था। तुम्हें तो सब पता है क्या क्या घटित हुआ था। अवसादग्रस्त अवस्था में एक पत्र तुम्हें लिख गई थी जिसमें जिंदगी की उठा पटक लिख दी थी। तुम पढ़कर इतना परेशान हो गए थे कि वह पत्र तुमने अपनी पत्नी को दिखा दिया, जबकि पत्र में मैंने स्पष्ट रूप से मना किया था कि ये पत्र तुम पढ़कर फाड़ देना। उसमें मेरे जीवन के वो दुख के कंकर थे जिसे मैं तुम्हारे अलावा किसी से साझां नहीं करना चाहती थी। लेकिन तुमने मेरी बात को पहली बार नहीं माना था। तुम्हें अपनी पत्नी पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था। तुम्हें तो याद होगा कि एक पंक्ति में मैंने लिख दिया था हमारे बचपन के इश्क़ को लेकर। तुम्हारी पत्नी ने इस एक पंक्ति को लेकर हंगामा खड़ा कर दिया था। तुमने मुझे ये सब फोन पर बताया था। हमारे रास्ते फिर अलग हो गए। अवसादग्रस्त अवस्था में यह मेरे लिए दूसरा झटका था जिसने मुझे अंदर तक हिला दिया। तुम मुझ से एक बार मिलने जरूर आए लेकिन तुम अंदर से भयभीत थे। तुम्हें अपनी दुनिया को संजोकर रखना था। कहीं कोई मजबूरी थी। कुछ सालों की मुलाक़ातों में मेरे पति भी तुमसे बहुत अधिक लगाव रखने लग गए थे। तुम्हें उन्होंने अपना छोटा भाई माना था। तुम्हें तो याद होगा उन्होंने कहा था कि, " एक घंटा मयंती के साथ बिता लो। शायद इसके टूटे दिल पर मरहम लग जाए"। लेकिन तुम संकोच कर रहे थे या तुम बहुत खौफज़दा थे। तुम तो चले गए लेकिन मेरी बीमारी बढ़ती चली गई। जिस समय मुझे तुम्हारे संबल की सबसे ज्यादा जरुरत थी तुम मेरे साथ नहीं थे। एक आलिंगन, एक प्रेमपूर्ण आगोश की उस वक्त की दरकार थी। मेरे पति जानते थे मेरे मर्ज़ का क्या इलाज है लेकिन तुम दुनिया से खौफज़दा या पत्नी की धमकी से परेशान थे। आगे की कहानी तो तुम्हें सब याद होनी ही चाहिए क्योंकि कविता से तुम्हें पता चलता रहता था। तेइस साल से अपनी गृहस्थी का भार अकेले अपने कंधों पर ढ़ोती हुई मैं नयी राह चल पड़ी थी जहां फर्ज़ के सिवाय कुछ नहीं था। शुचि से तुम्हारी मुलाकात दो साल पहले ही तो हुई है जब वह विदेश से लौटी है। पता है तुम तो उसे याद ही नहीं थे, मेरे से बातचीत करते हुए उसने कहा था, " कौन मयंक,?"। लेकिन चालीस साल विदेश में रह रही थी और अब फेसबुक से सबको खोज़कर, सबसे संपर्क कर रही है। कल जब वटसप समूह पर तुम्हारे लिए मुझ से झगड़ रही थी तो दिल बहुत आहत हो रहा था। इसलिए मैं समहू से बाहर हो गई। तुमने एक बार भी उसे रोकने की कोशिश नहीं की। तुम्हारी पत्नी से भी काफी हिल मिल गई है। ये सब तो मैं भी वटसप समूह पर फोटोज देखकर समझ जाती हूं। कभी कभी सोचती हूं अब तुम्हारी बीबी को लड़कियों से दोस्ती पर कोई परेशानी नहीं होती? कक्षा की सारी लड़कियां ही तो दोस्त हैं तुम्हारी। तुम्हें याद है एक सवाल के जवाब में तुमने एक बार मुझे आश्वस्त करते हुए कहा था कि, " इश्क़ एक बार ही होता है। बार बार नहीं"। हमारे इश्क़ के फ़साने पर मुहर फिर लग गई थी। खैर , कल वटसप समूह में जो भी हुआ उसको मैंने चुनौती के रुप में स्वीकारा है। एक बात का श्रेय तो अभी भी तुम्हें दूंगी की तुम्हारे से इश्क़ करने और बार बार हमारी राह अलग होने से मेरे अंदर के लेखक ने जन्म लिया है। इसलिए जब भी शब्दों की कलमकारी से कहानी की माला पिरोती हूं तो अनायास तुम्हारी याद आ जाती है। पत्र यहां समाप्त करती हूं, शायद तुम्हें वे बातें भी याद हो आई होंगी जिनका जिक्र मैंने यहां नहीं किया। शुचि से बात हो तो सच बताने का साहस जुटा लेना। तुम ऐसा नहीं करोगे तो दुनिया का प्रेम से विश्वास उठ जाएगा और प्रेमी युगलों के अफ़सानों पर गीत लिखने बंद हो जाएंगे। तुम्हारीमानसीइसी नाम से ही तो तुम प्यार से बुलाते थे। याद है ना।
 

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